झारखंड की 'फैक्ट्री' से निकल रहे धुरंधर, दलीप ट्रॉफी में लहराया परचम

झारखंड की क्रिकेट पहचान अब सिर्फ महेंद्र सिंह धोनी तक सीमित नहीं है. दलीप ट्रॉफी में ईस्ट जोन की टीम में राज्य के पांच खिलाड़ियों का शामिल होना नई क्रिकेट पौध की मजबूती दिखाता है. ईशान किशन, कुमार कुशाग्र, शिखर मोहन, अनुकूल रॉय जैसे खिलाड़ियों के साथ घरेलू क्रिकेट के ढांचे में बदलाव ने झारखंड में बल्लेबाजी प्रतिभा को नई दिशा दी है.

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झारखंड की नई क्रिकेट फैक्ट्री में धुरंधरों की खेप तैयार. (Photo: PTI) झारखंड की नई क्रिकेट फैक्ट्री में धुरंधरों की खेप तैयार. (Photo: PTI)

आजतक स्पोर्ट्स डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 10 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:48 PM IST

एक दौर था जब झारखंड की क्रिकेट की बात होते ही सबसे पहले महेंद्र सिंह धोनी का नाम आता था. राज्य की क्रिकेट पहचान लगभग धोनी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थी. लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है. इस साल ईस्ट जोन की दलीप ट्रॉफी टीम में झारखंड के 6 खिलाड़ियों का शामिल होना सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि राज्य में बदलते क्रिकेट सिस्टम की बड़ी तस्वीर है.

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दलीप ट्रॉफी फाइनल में साउथ जोन के खिलाफ उतरने वाली ईस्ट जोन टीम में झारखंड के ईशान किशन, विराट सिंह, कुमार कुशाग्र, शिखर मोहन,कोनैन कुरैशी और अनुकूल रॉय शामिल हैं. इनमें ईशान-विराट जाने-पहचाने है... जबकि कुशाग्र, कुरैशी और शिखर जैसे खिलाड़ी अब झारखंड की अगली पीढ़ी की उम्मीद बनकर उभर रहे हैं.

पूर्व भारतीय चयनकर्ता और तमिलनाडु के पूर्व बल्लेबाज श्रीधरन शरत ने भी झारखंड के इस बदलाव को महसूस किया है. उन्होंने कहा, “झारखंड से कुछ बहुत अच्छे युवा क्रिकेटर आ रहे हैं.”

धोनी की छाया से बाहर निकल रहा झारखंड

झारखंड क्रिकेट के लिए सबसे खास बात यह है कि अब प्रतिभा सिर्फ एक-दो बड़े नामों तक सीमित नहीं है. राज्य के पास अलग-अलग फॉर्मेट में प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों की पूरी खेप तैयार हो रही है.

जेएससीए के सचिव और पूर्व भारतीय बल्लेबाज सौरभ तिवारी भी इसे झारखंड क्रिकेट में आए बदलाव की सटीक तस्वीर मानते हैं. उनके मुताबिक ईस्ट जोन टीम में शामिल पांचों खिलाड़ी इसके हकदार हैं. इतना ही नहीं, एक और प्रतिभाशाली खिलाड़ी शारंदीप का दलीप ट्रॉफी टीम में चयन नहीं हो सका.

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तिवारी खास तौर पर कुमार कुशाग्र और शिखर मोहन को लेकर बेहद उत्साहित हैं. कुशाग्र ने 18 साल की उम्र में 2022 में फर्स्ट क्लास क्रिकेट में कदम रखा था और अब तक रेड-बॉल क्रिकेट में 2000 से ज्यादा रन बना चुके हैं, जिसमें छह शतक शामिल हैं.

दूसरी ओर 2025-26 सीजन में फर्स्ट क्लास डेब्यू करने वाले शिखर मोहन ने अपने पहले ही घरेलू सीजन में 55 के आसपास की औसत से रन बनाकर संकेत दे दिया कि वह लंबी रेस के खिलाड़ी हैं. उनके नाम दो शतक भी हैं.

सिर्फ टेस्ट के खिलाड़ी नहीं, सफेद गेंद में भी दम

इन दोनों की खासियत सिर्फ रेड-बॉल क्रिकेट तक सीमित नहीं है. सफेद गेंद में भी इनके आंकड़े बताते हैं कि झारखंड की नई बल्लेबाजी पौध कितनी तैयार है.

कुमार कुशाग्र ने पिछले सीजन झारखंड को पहली बार सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी जिताने में बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने 10 पारियों में 60.28 की औसत से 422 रन बनाए और टीम के तीसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज रहे.

23 साल के कोनैन कुरैशी के लिए दलीप ट्रॉफी का फाइनल उनके लिए महज दूसरा फर्स्ट क्लास क्रिकेट मैच रहा. उन्होंने सेमीफाइनल के दौरान डेब्यू किया था. 

सौरभ तिवारी के मुताबिक इन खिलाड़ियों की असली खूबी सिर्फ बड़ी पारियां खेलना नहीं, बल्कि मैच की जरूरत के हिसाब से 40-50 रन की अहम पारियां खेलना भी है. यही छोटी-छोटी पारियां कई बार मैच का रुख बदल देती हैं.

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सिस्टम बदला तो सोच भी बदलने लगी

इस बदलाव के पीछे सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि घरेलू क्रिकेट के ढांचे में किया गया बदलाव भी है.

सौरभ तिवारी ने बताया कि उन्होंने पूर्व साथी शाहबाज नदीम के साथ मिलकर झारखंड के घरेलू क्रिकेट ढांचे में बदलाव शुरू किया. पहले जूनियर क्रिकेट में खिलाड़ी वनडे मैच खेलते थे. अब लीग स्टेज में दो दिन के मैच, नॉकआउट में तीन दिन के मैच और फाइनल में चार दिन के मुकाबले कराए जा रहे हैं.

मकसद साफ है- खिलाड़ियों को सिर्फ नतीजे के लिए नहीं, बल्कि कौशल और तकनीक के लिए तैयार करना.

तिवारी कहते हैं कि अगर जूनियर स्तर पर तकनीक मजबूत होगी तो आगे चलकर खिलाड़ी शतक, दोहरे शतक और तिहरे शतक तक पहुंच सकते हैं. अच्छी तकनीक किसी एक फॉर्मेट की मोहताज नहीं होती.

दलीप ट्रॉफी फाइनल में शिखर मोहन की 120 गेंदों पर 85 रनों की पारी इस सोच का उदाहरण भी दिखी. उन्होंने ऑफ स्टंप के बाहर की गेंदों को जिस धैर्य और समझ के साथ छोड़ा, उससे साफ था कि बल्लेबाजी सिर्फ शॉट लगाने का खेल नहीं है.

ईशान किशन ने भी पकड़ी यही कमी

ईशान किशन भी मानते हैं कि ईस्ट जोन और झारखंड के युवा बल्लेबाजों को एक आदत बदलने की जरूरत है- शुरुआत को बड़ी पारी में बदलने की.

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उनका कहना है कि पहले खिलाड़ी 70-80 तक पहुंचकर संतुष्ट हो जाते थे, जबकि विपक्षी टीमों के सेट बल्लेबाज उन्हीं परिस्थितियों में बड़ी पारियां खेल जाते थे. किशन ने युवा बल्लेबाजों को यही समझाने की कोशिश की कि बड़ा स्कोर बनाना भी एक आदत है. जब आप सेट हो जाएं तो मैच को अपने नाम करने वाली पारी खेलकर ही लौटें.

झारखंड अंडर-23 के कोच और पूर्व राज्य खिलाड़ी ईशान जग्गी भी इसी सोच पर जोर देते हैं. उनका कहना है कि युवा खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच खेलने चाहिए. क्योंकि मैचों की संख्या बढ़ने के साथ अलग-अलग परिस्थितियों का सामना करने और उनसे सामंजस्य बैठाने की क्षमता भी बढ़ती है.

लंबे समय तक बल्लेबाजी करने की आदत ही शतक बनाने की आदत में बदलती है. यही अंतर रेड-बॉल और टी20 क्रिकेट के बीच भी है.

अगली जरूरत- मैदान और बेहतर ट्रेनिंग सेंटर

हालांकि झारखंड क्रिकेट के सामने चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं. सबसे बड़ी समस्या जमीनी स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर की है.

राज्य में फिलहाल जेएससीए इंटरनेशनल स्टेडियम ही प्रमुख क्रिकेट सेंटर है, जबकि कीनन स्टेडियम टाटा समूह के अधीन है. ऐसे में जेएससीए अब राज्य के चारों जोन में एक-एक अकादमी विकसित करने की कोशिश कर रहा है.

मकसद यह है कि युवा खिलाड़ियों और महिला क्रिकेटरों को ट्रेनिंग के लिए हर बार रांची न आना पड़े और उन्हें अपने ही इलाके में बेहतर सुविधाएं मिल सकें.

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यानी झारखंड की क्रिकेट कहानी अब सिर्फ धोनी के शहर की कहानी नहीं रह गई है. एक पूरी नई पीढ़ी सामने है. अगर घरेलू सिस्टम, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर का यह बदलाव इसी रफ्तार से आगे बढ़ा, तो आने वाले वर्षों में झारखंड की पहचान किसी एक सुपरस्टार से नहीं, बल्कि एक पूरी क्रिकेट फैक्ट्री से होगी.

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