हर साल पर्यावरण दिवस पर रस्मी तौर पर कुछ पौधे लगा दिए जाते है. बड़े-बड़े भाषण होते हैं. सस्टेनेबल डेवलपमेंट के नारे गूंजते हैं. लेकिन धरातल की हकीकत इसके उलट है. हमारा पर्यावरण- जो जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश जैसे पंचमहाभूतों से मिलकर बना है, आज कराह रहा है.
पिछले एक दशक (2016-2026) में भारत ने आर्थिक प्रगति और बुनियादी ढांचे के विकास में अभूतपूर्व तेजी दिखाई है. सड़कें चौड़ी हुईं. टनल बने. बांध खड़े किए गए और पहाड़ों पर कंक्रीट के जंगल उगाए गए. लेकिन इस तथाकथित विकास के बदले हमने जो कीमत चुकाई है, उसने भारत के भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. लोग, इंडस्ट्री और सरकार भूल गई कि पर्यावरण के बिना विकास टिकाऊ नहीं हो सकता.
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यदि पिछले 10 वर्षों का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो भारत सरकार और नीति निर्माताओं द्वारा की गई सबसे बड़ी रणनीतिक भूल हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर वहां अंधाधुंध भारी निर्माण कार्य करना है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तर-पूर्व के राज्य जो कभी देश के 'इकोलॉजिकल गार्ड' माने जाते थे, आज आपदाओं के हॉटस्पॉट बन चुके हैं.
विकास के नाम पर पहाड़ों के सीने को जिस तरह मशीनों से छलनी किया जा रहा है. वह किसी सुसाइड नोट से कम नहीं है. इसका सबसे ज्वलंत और चिंताजनक उदाहरण उत्तराखंड में देखने को मिला है.
चार धाम ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट: वरदान या अभिशाप?
लगभग 900 किलोमीटर लंबी सड़कों को चौड़ा करने की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य चार पवित्र धामों (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करना था. धार्मिक पर्यटन और सामरिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण लग सकता है, लेकिन इसके लिए जिस वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता थी, उसे पूरी तरह ताक पर रख दिया गया. लोग लाखों में पहुंच रहे हैं. पहाड़ों की सहने की क्षमता खत्म हो रही है.
पहाड़ों को सड़क चौड़ी करने के लिए ढलान के अनुसार धीरे-धीरे काटने के बजाय, वर्टिकल काटा गया. इसके कारण पहाड़ों की कमान कमजोर हो गई और वे भरभरा कर गिरने लगे. आज उत्तराखंड में मामूली बारिश में भी भयावह भूस्खलन एक आम बात हो गई है.
इस प्रोजेक्ट के लिए लाखों सदाबहार और देवदार के पेड़ों को काट दिया गया, जो अपनी जड़ों से मिट्टी को बांधकर रखते थे. पेड़ गिरने से पहाड़ों की वाटर स्टोरेज क्षमता समाप्त हो गई, जिससे जलस्रोत सूख रहे हैं और फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ गया है.
टनल खोदने और पहाड़ काटने से निकले मलबे को वैज्ञानिक तरीके से ठिकाने लगाने के बजाय सीधे अलकनंदा और भागीरथी जैसी नदियों में बहा दिया गया. इससे नदियों का तल ऊपर उठ गया और वे असमय विकराल रूप धारण करने लगीं.
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विकास या पर्यावरण- दोनों चाहिए या कुछ नहीं
यह तर्क बार-बार दिया जाता है कि देश की सुरक्षा, पर्यटन और आर्थिक समृद्धि के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है. बेशक जरूरी है! लेकिन क्या विनाशकारी निर्माण ही विकास का एकमात्र रास्ता है? पर्यावरण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं. पर्यावरण के बिना विकास शून्य है.
जब आप किसी संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्र में टनल बनाने के लिए डायनामाइट से ब्लास्ट करते हैं, तो आप केवल एक सुरंग नहीं बना रहे होते, बल्कि आप वहां के पूरे इकोसिस्टम को हमेशा के लिए अस्थिर कर रहे होते हैं. 2023 की उत्तरकाशी की सिल्कयारा टनल दुर्घटना (जहां 41 मजदूर फंस गए थे) इसी अंधाधुंध और बिना पुख्ता भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के किए गए निर्माण का परिणाम थी.
नदियों पर बांध बनाकर बिजली पैदा करना प्रगति का सूचक हो सकता है, लेकिन जब वही बांध केदारनाथ (2013) या ऋषिगंगा (2021) जैसी त्रासदियों में तब्दील हो जाते हैं, तो पल भर में अरबों रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर और हजारों मासूम जानें स्वाहा हो जाती हैं. तब उस 'आर्थिक लाभ' का हिसाब कौन देगा?
मैदानी इलाकों पर भी नीतिगत स्तर पर विफलताएं
र्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) नियमों को लगातार कमजोर किया गया है ताकि उद्योगों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को जल्दी मंजूरी मिल सके. स्थानीय समुदायों और पर्यावरणविदों की आवाज को 'विकास विरोधी' कहकर दबाने की कोशिश की गई.
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में झीलों, तालाबों और वेटलैंड्स को पाटकर मॉल और सोसायटियां बना दी गईं. नतीजा? आज बेंगलुरु पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहा है. मुंबई-चेन्नई जरा सी बारिश में डूब जाते हैं. भारत के दर्जनों शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शीर्ष पर बने हुए हैं. हर साल सर्दियों में उत्तर भारत में स्मॉग के कारण सांस लेना दूभर हो जाता है.
क्या अब भी सुधरने का समय है?
गलतियों को गिनाने का मकसद हताशा फैलाना नहीं, बल्कि सुधारात्मक कदम उठाने के लिए मजबूर करना है. भारत अभी भी एक सही और संतुलित रास्ता चुन सकता है.
किसी भी बड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले केवल उसका आर्थिक लाभ न देखा जाए, बल्कि उसकी पर्यावरणीय लागत (Environmental Cost) का भी आकलन हो. यदि किसी सड़क को चौड़ा करने से कोई पूरा पहाड़ गिरने की कगार पर आ जाता है, तो उस सड़क का विकल्प ढूंढा जाना चाहिए.
मैदानी इलाकों के नियमों को पहाड़ों पर लागू करना बंद करना होगा. पहाड़ी क्षेत्रों में भारी मशीनों, डायनामाइट ब्लास्टिंग और चौड़ी फोर-लेन सड़कों के बजाय 'इको-सेंसिटिव' और कम चौड़ाई वाली सुरक्षित सड़कों तथा रोपवे जैसी तकनीकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
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पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और वन्यजीव संरक्षण कानूनों को राजनीतिक या कॉरपोरेट दबाव से मुक्त कर कड़ाई से लागू करना होगा. पहाड़ी और संवेदनशील क्षेत्रों में जाने वाले वाहनों और पर्यटकों की संख्या की एक सीमा यानी कैरींग कैपेसिटी तय होनी चाहिए. प्रकृति को 'मनोरंजन पार्क' समझने की मानसिकता बदलनी होगी.
विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें यह कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि प्रकृति हमारे बिना जीवित रह सकती है, लेकिन हम प्रकृति के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकते. पिछले 10 वर्षों में विकास की जो रूपरेखा भारत ने खींची है, उसमें कार्बन फुटप्रिंट तो कम करने की बातें की गईं- जैसे सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना, जो एक सराहनीय कदम है. लेकिन दूसरी तरफ हमारे सबसे बड़े प्राकृतिक सुरक्षा कवच 'हिमालय' को गंभीर चोट पहुंचाई गई.
पर्यावरण को नष्ट करके किया गया विकास वास्तव में विकास नहीं, बल्कि 'प्रायोजित विनाश' है. समय तेजी से निकल रहा है; यदि हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां हमें एक समृद्ध भारत के लिए नहीं, बल्कि एक बंजर और आपदाग्रस्त भारत छोड़ने के लिए याद करेंगी. पृथ्वी हमें लगातार सिग्नल दे रही है. अब यह हमारे ऊपर है कि हम उसकी पुकार सुनते हैं या विनाश की खाई में कूदना चुनते हैं.
ऋचीक मिश्रा