चांद को देखकर लगता है कि वहां लंबे समय से सब कुछ शांत है. लेकिन वैज्ञानिकों को मिले नए सबूत बताते हैं कि अरबों साल पहले चंद्रमा पर काफी हलचल थी. वैज्ञानिकों ने चांद की सतह पर करीब 80 किलोमीटर चौड़े दो बड़े ज्वालामुखीय ढांचे खोजे हैं. इनकी पहचान चांद की तस्वीरों और उसकी सतह की ऊंचाई से जुड़े आंकड़ों की मदद से की गई है. माना जा रहा है कि ये दोनों शील्ड ज्वालामुखी हैं, जो कभी चांद के अंदर से निकले गर्म और पिघले पत्थर यानी मैग्मा से बने होंगे.
इनमें से एक ढांचा Prinz-Harbinger इलाके में मिला है. यह करीब 78 से 80 किलोमीटर चौड़ा है और आसपास की जमीन से करीब 239 मीटर ऊंचा है. इसके बीच में करीब 4 किलोमीटर चौड़ा एक गड्ढा भी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह किसी समय ज्वालामुखी का मुंह रहा होगा.
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तस्वीरों और ऊंचाई के आंकड़ों से हुई पहचान
वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की सतह की तस्वीरों के साथ उसकी ऊंचाई का डेटा भी देखा. किसी जगह को ज्वालामुखी मानने के लिए सिर्फ उसका पहाड़ जैसा दिखना काफी नहीं है. वैज्ञानिक उसकी ढलान, आकार और आसपास मौजूद लावा के निशानों को भी देखते हैं.
Prinz-Harbinger इलाके में कई घुमावदार नालियां भी दिखाई देती हैं. माना जाता है कि ये पुराने समय में बहने वाले लावा से बनी होंगी. 2025 की एक स्टडी में इस ढांचे की चौड़ाई करीब 78 किलोमीटर और ऊंचाई 239 मीटर बताई गई थी. इसका कुल आकार करीब 898 घन किलोमीटर माना गया था.
क्या होता है शील्ड ज्वालामुखी?
शील्ड ज्वालामुखी दूसरे ज्वालामुखियों से थोड़ा अलग होते हैं. ये बहुत ऊंचे और नुकीले नहीं होते, बल्कि काफी चौड़े होते हैं और इनकी ढलान कम होती है.
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इनसे निकलने वाला पतला लावा दूर तक फैल जाता है. धीरे-धीरे यही लावा एक बड़े और चौड़े ढांचे का रूप ले लेता है. चांद पर पहले भी ऐसे ज्वालामुखीय ढांचे देखे जा चुके हैं.
चांद पर कभी होती थी ज्वालामुखीय गतिविधि
चांद पर ज्वालामुखी होने की बात नई नहीं है. उसकी सतह पर कई बड़े काले इलाके दिखाई देते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इनमें से कई इलाके अरबों साल पहले बहने वाले लावा के ठंडा होकर जमने से बने हैं.
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Prinz-Harbinger इलाके में भी पुराने लावा और ज्वालामुखीय गतिविधि के कई निशान मिले हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन ढांचों का अध्ययन करने से चांद के अंदर क्या चल रहा था, यह समझने में मदद मिलेगी. इससे यह भी पता चल सकता है कि वहां मैग्मा कैसे बना और किस तरह सतह तक पहुंचा.
अरबों साल पुराना है ये इतिहास
वैज्ञानिकों के मुताबिक, Prinz-Harbinger इलाके में ज्वालामुखीय गतिविधि करीब 3.4 अरब साल पहले हुई हो सकती है. आसपास के लावा मैदान की उम्र करीब 3.5 अरब साल बताई गई है.
इस खोज से साफ होता है कि आज शांत दिखने वाला चांद अपने शुरुआती दौर में काफी एक्टिव था. वहां ज्वालामुखी फटते थे, लावा बहता था और धीरे-धीरे उसकी सतह का बड़ा हिस्सा बनता गया. इन पुराने ज्वालामुखियों की जानकारी वैज्ञानिकों को चांद के इतिहास को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगी.
आजतक साइंस डेस्क