अगस्त 2026 के अंत में भारत का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर और बेतरतीब पैटर्न दिखा रहा है. यूरोप में असामान्य बारिश जारी रहने का अनुमान है, लेकिन भारत में बार-बार होने वाले इंट्रासीजनल ब्रेक (मॉनसून के अंदर के ब्रेक) पश्चिमी भारत सहित कई क्षेत्रों में बारिश को दबा रहे थे. सबसे बड़ी उम्मीद भारतीय महासागर डाइपोल (IOD) के पॉजिटिव फेज में जाने की थी, लेकिन यह अब भी न्यूट्रल बना हुआ है.
अगर यह आने वाले हफ्तों में पॉजिटिव होता भी है तो शायद बहुत देर हो चुकी होगी. ये सही से मॉनसून को सपोर्ट नहीं कर पाएगा. सितंबर अब खरीफ फसलों के लिए निर्णायक महीना बन गया है. मौसम विभाग (IMD) के अनुसार पूरे देश में अगले दो हफ्तों (सितंबर 2 तक) सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है.
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शनिवार तक भारत में हुई 14 फीसदी कम बारिश हुई है. आगे यह और बढ़ सकता है. मॉनसून ट्रफ हिमालय की तलहटी में फंसी हुई है. मध्य भारत और दक्षिण की तरफ नहीं जा रही है. इससे मध्य और पश्चिमी क्षेत्रों में बारिश कम हो रही है जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर बारिश हो रही है.
क्षेत्रीय बेतरतीब बारिश के इंटरनेशनल संकेत
ECMWF जैसे मॉडल बताते हैं कि मध्य-सितंबर तक बेतरतीब पैटर्न जारी रह सकता है. पश्चिमी और मध्य भारत में सामान्य से कम बारिश की प्रवृत्ति है, जबकि पूर्व और पूर्वोत्तर में बेहतर संभावना है. जम्मू-कश्मीर में स्थानीय और रुक-रुक कर बौछारें संभव हैं लेकिन व्यापक बारिश की उम्मीद कम है.
मुख्य बात यह है कि मॉनसून कमजोर होने से ज्यादा बेतरतीब वितरण का शिकार हो रहा है. कुछ इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति और दूसरे में सूखा दोनों एक साथ दिख रहे हैं. निजी पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट ने सीजनल पूर्वानुमान को घटाकर LPA का 85 प्रतिशत कर दिया है. सूखे की संभावना 70 प्रतिशत बताई है.
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पहले अप्रैल में यह 94 प्रतिशत था. IMD का अप्रैल का 92 प्रतिशत का अनुमान जून में 90 प्रतिशत हो गया था. वर्तमान घाटा और पूर्वानुमान देखते हुए यह आंकड़ा और गिर सकता है. क्षेत्रवार देखें तो पूर्व और पूर्वोत्तर में 26%, दक्षिण प्रायद्वीप में 23 फीसदी, उत्तर-पश्चिम में 11 प्रतिशत और मध्य भारत में सिर्फ 3 फीसदी का घाटा है.
अल-नीनो और IOD की भूमिका
इस कमजोरी के पीछे मजबूत होता अल-नीनो मुख्य कारण है. ब्रिटेन के मेट ऑफिस के अनुसार यह सदी के सबसे शक्तिशाली अल-नीनो में से एक बनने की राह पर है. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है. अल-नीनो भारतीय मॉनसून को आमतौर पर कमजोर करता है. IOD अगर पॉजिटिव होता तो आंशिक राहत दे सकता था, लेकिन अभी न्यूट्रल होने और देर से बदलाव की संभावना के कारण मदद सीमित रहेगी.
खरीफ फसलों खासकर तूर, सोयाबीन, मक्का जैसी बारिश पर निर्भर फसलों के लिए स्थिति चिंताजनक है. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और गुजरात जैसे क्षेत्रों में अनियमित बारिश हो रही है. विशेषज्ञों के अनुसार घाटा 15 प्रतिशत से ऊपर जा सकता है. इससे पैदावार प्रभावित होगी और खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा है.
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वैश्विक सप्लाई चेन की समस्याएं (जैसे रूस-यूक्रेन मुद्दे) इसे और जटिल बना सकती हैं. सरकार को फसल निगरानी, पैदावार आकलन और सप्लाई चेन प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है.
मॉनसून की कहानी अब 'कमजोर' होने से ज्यादा 'बेतरतीब वितरण' की है. सितंबर में सुधार की उम्मीदें सीमित हैं. किसानों, नीति निर्माताओं और बाजार को इस बेतरतीबता के हिसाब से तैयार रहना होगा. आगामी अपडेट्स में बदलाव संभव है, लेकिन मौजूदा संकेत सतर्कता बरतने की मांग करते हैं. पानी प्रबंधन, वैकल्पिक सिंचाई और फसल बीमा जैसे उपाय इस चुनौती से निपटने में मददगार साबित हो सकते हैं.
आजतक साइंस डेस्क