दुनिया भर में जंगली जानवरों की संख्या लगातार कम हो रही है. WWF की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026 के मुताबिक 1970 से 2022 के बीच जिन वन्यजीवों की निगरानी की गई, उनकी आबादी के औसत आकार में 73 फीसदी की गिरावट आई है. यह रिपोर्ट जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (ZSL) के साथ मिलकर तैयार की गई है.
इसमें 5,790 वर्टिब्रेट प्रजातियों की आबादी के आंकड़े शामिल किए गए हैं. हालांकि, इस चिंता के बीच भारत से अच्छी खबर भी सामने आई है. देश में बाघ, एशियाटिक शेर, एक सींग वाले गैंडे और स्नो लेपर्ड जैसी कई प्रजातियों की संख्या बढ़ी है.
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रिपोर्ट के मुताबिक जानवरों के लिए सबसे बड़ा खतरा उनके रहने की जगह का कम होना और खराब होना है. इसके अलावा जरूरत से ज्यादा शिकार, क्लाइमेट चेंज, पॉल्यूशन, दूसरी जगह से आई नुकसान पहुंचाने वाली प्रजातियां और बीमारियां भी जानवरों को नुकसान पहुंचा रही हैं. रिपोर्ट यह भी बताती है कि सही तरीके से संरक्षण किया जाए तो जानवरों की संख्या दोबारा बढ़ सकती है. भारत में बाघों की बढ़ती संख्या इसका एक उदाहरण है.
रिपोर्ट के मुताबिक नदियों, झीलों और दूसरे मीठे पानी के इलाकों में रहने वाले जानवरों की आबादी में सबसे ज्यादा गिरावट आई है. 1970 से 2022 के बीच इन जानवरों की आबादी के औसत आकार में 85 फीसदी की कमी आई. जमीन पर रहने वाले जानवरों की आबादी में 69 फीसदी और समुद्र में रहने वाले जीवों की आबादी में 59 फीसदी की गिरावट आई है.
यहां यह समझना जरूरी है कि 73 फीसदी गिरावट का मतलब यह नहीं है कि दुनिया के 73 फीसदी जानवर खत्म हो गए. यह उन वन्यजीवों की मॉनिटर की गई आबादी के औसत आकार में आई कमी है, जिनका डेटा रिपोर्ट में शामिल किया गया है.
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भारत में बढ़े बाघ और शेर
भारत में कई बड़ी वन्यजीव प्रजातियों की संख्या बढ़ी है. 2022 की ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन के मुताबिक देश में 3,682 बाघ थे. भारत में एक सींग वाले गैंडे की संख्या 3,300 से ज्यादा है. वहीं कॉमन लेपर्ड की अनुमानित संख्या 13,874 है. एशियाटिक शेरों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है. 2020 में देश में 674 शेर थे, जबकि 2025 में इनकी संख्या बढ़कर 891 हो गई. भारत में पहली बार किए गए स्नो लेपर्ड के पूरे देश के सर्वे में इनकी संख्या 718 बताई गई. वहीं भारत में दोबारा लाए गए चीतों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ रही है और वे यहां के माहौल में खुद को ढाल रहे हैं.
गंगा डॉल्फिन का भी हुआ सर्वे
भारत में नदियों में रहने वाले जीवों को लेकर भी काम किया गया है. 2021 से 2023 के बीच पहली बार देश में रिवर डॉल्फिन की बड़े स्तर पर गिनती की गई. इस सर्वे में 28 नदियों और करीब 8,507 किलोमीटर के इलाके को शामिल किया गया. इसमें गंगा रिवर डॉल्फिन की संख्या 6,324 बताई गई. यह पहली बार है जब देश में इस तरह बड़े स्तर पर गंगा रिवर डॉल्फिन की संख्या का आंकड़ा सामने आया है.
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सिर्फ जंगलों में संरक्षण काफी नहीं
एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत ने बाघ और दूसरी बड़ी प्रजातियों को जंगलों और प्रोटेक्टेड एरिया में बचाने के लिए अच्छा काम किया है. लेकिन कई जानवर ऐसे हैं जो इन इलाकों के बाहर भी रहते हैं. इनके लिए भी अलग और मजबूत प्लान की जरूरत है. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, इंडियन वुल्फ और फॉक्स जैसी प्रजातियों के लिए यह चुनौती ज्यादा है. इन जानवरों का बड़ा हिस्सा प्रोटेक्टेड एरिया के बाहर रहता है.
इसके अलावा बड़ी प्रजातियों की संख्या बढ़ने से ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट भी बढ़ रहा है. जब बाघ, तेंदुए या दूसरे जानवर भोजन की तलाश में जंगल से बाहर आते हैं तो उनका सामना इंसानों से हो सकता है. इससे लोगों और जानवरों दोनों के लिए खतरा पैदा होता है.
WWF की रिपोर्ट के मुताबिक केवल जानवरों को बचाने के लिए चलाए जा रहे प्रोजेक्ट काफी नहीं होंगे. जंगलों और दूसरे प्राकृतिक इलाकों को बचाना भी जरूरी है. खेती, शहरों के फैलाव, सड़क और दूसरे निर्माण कामों के कारण जानवरों की रहने की जगह कम हो रही है.
भारत में बाघ, शेर, गैंडे और गंगा डॉल्फिन जैसी प्रजातियों की बढ़ती संख्या बताती है कि सही प्लान और लगातार काम से वन्यजीवों को बचाया जा सकता है. लेकिन इस काम को आगे भी जारी रखना होगा, ताकि इन जानवरों की संख्या आने वाले समय में भी बनी रहे.
आजतक साइंस डेस्क