बारिश पड़ते ही सफेद फूल की पंखुड़ियां कांच जैसी ट्रांसपेरेंट हो जाएं, तो यह किसी कैमरा इफेक्ट का कमाल नहीं है. जापान के पहाड़ी जंगलों में मिलने वाला डिफाइलीया ग्रेयी ऐसा ही अनोखा फूल है. इसे ‘स्केलेटन फ्लावर’ भी कहा जाता है. सूखे मौसम में इसकी पंखुड़ियां सफेद दिखती हैं, लेकिन बारिश के बाद यही पंखुड़ियां लगभग ट्रांसपेरेंट नजर आने लगती हैं.
इस फूल की पंखुड़ियों में बहुत छोटी-छोटी खाली जगहें होती हैं. सामान्य हालत में इन जगहों में हवा रहती है. इससे लाइट पंखुड़ियों से टकराकर फैल जाती है और फूल सफेद दिखाई देता है. बारिश होने पर इन खाली जगहों में पानी भर जाता है. इसके बाद लाइट पंखुड़ी से आसानी से गुजरने लगती है और पंखुड़ियां ट्रांसपेरेंट दिखने लगती हैं. फूल सूखने के बाद यह बदलाव फिर वापस हो जाता है और पंखुड़ियां सफेद दिखने लगती हैं.
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इसका सीधा कारण फूल की पंखुड़ियों की बनावट है. सूखी पंखुड़ी के अंदर हवा वाली छोटी-छोटी जगहें होती हैं. हवा और पंखुड़ी के बाकी हिस्से में अंतर होने की वजह से लाइट कई दिशाओं में फैलती है. इसी वजह से पंखुड़ी सफेद दिखती है.
जब बारिश का पानी इन जगहों में भर जाता है, तो यह अंतर कम हो जाता है. इससे लाइट पंखुड़ी के अंदर से ज्यादा आसानी से निकल जाती है. नतीजा यह होता है कि सफेद पंखुड़ी कांच जैसी ट्रांसपेरेंट दिखाई देने लगती है. यानी इस फूल का सफेद रंग अचानक गायब नहीं होता. बारिश सिर्फ यह बदलती है कि पंखुड़ी के अंदर से लाइट कैसे गुजर रही है.
पहली बूंद के साथ नहीं होता बदलाव
इस फूल की पंखुड़ियां बारिश की पहली बूंद पड़ते ही ट्रांसपेरेंट नहीं हो जातीं. 2023 में पब्लिश एक साइंटिफिक आर्टिकल के मुताबिक, हल्की बारिश करीब एक दिन तक होने के बाद पंखुड़ियां ट्रांसपेरेंट हो सकती हैं. बारिश रुकने के बाद भी कुछ समय तक पंखुड़ियां ऐसी ही रह सकती हैं. जब वे पूरी तरह सूख जाती हैं, तो फिर से सफेद हो जाती हैं. इसलिए यह कहना सही होगा कि बारिश में फूल का रंग नहीं बदलता. उसकी पंखुड़ियों की ट्रांसपेरेंसी बदलती है.
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जापान के जंगलों में पाया जाता है
होक्काइडो यूनिवर्सिटी के मुताबिक, डिफाइलीया ग्रेयी एक बारहमासी पौधा है. यह करीब 30 से 50 सेंटीमीटर तक ऊंचा हो सकता है. यह जापान के होन्शू और होक्काइडो से लेकर सखालिन तक पाया जाता है. यह पौधा आमतौर पर जंगलों और जंगल के किनारे वाले इलाकों में उगता है. इसके फूल जून और जुलाई के आसपास दिखाई देते हैं. इसके बड़े पत्ते भी होते हैं, जो करीब 37 सेंटीमीटर तक चौड़े हो सकते हैं. इसके फूल सफेद होते हैं और आमतौर पर इनमें छह पंखुड़ियां होती हैं. फूल आने के बाद इसमें फल भी बनते हैं, जो पकने पर बैंगनी रंग के हो जाते हैं.
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क्यों कहते हैं इसे स्केलेटन फ्लावर?
बारिश के बाद जब पंखुड़ियां ट्रांसपेरेंट हो जाती हैं, तो उनके अंदर की नसें साफ दिखाई देने लगती हैं. इससे फूल किसी कंकाल जैसा दिखता है. इसी वजह से इसे ‘स्केलेटन फ्लावर’ कहा जाता है. इसके साइंटिफिक नाम को लेकर भी एक बात जानना जरूरी है. केव साइंस के मौजूदा वर्गीकरण में इसका स्वीकार किया गया नाम पोडोफिलम ग्रेयी है. वहीं डिफाइलीया ग्रेयी इसका दूसरा नाम यानी समानार्थी नाम है. इसलिए दोनों नाम अलग-अलग जगहों पर मिल सकते हैं.
इस फूल की खासियत पूरी तरह इसकी पंखुड़ियों की बनावट से जुड़ी है. बारिश का पानी पंखुड़ियों के अंदर की खाली जगहों में जाता है और लाइट के गुजरने का तरीका बदल देता है. इसी वजह से सफेद पंखुड़ियां ट्रांसपेरेंट दिखाई देती हैं. जैसे ही फूल दोबारा सूखता है, अंदर की जगहों में पानी की जगह हवा आ जाती है और पंखुड़ियां फिर सफेद दिखने लगती हैं. यानी बारिश इस फूल का रंग नहीं बदलती, बल्कि कुछ समय के लिए उसकी पंखुड़ियों को कांच जैसा बना देती है.
आजतक साइंस डेस्क