ब्राजील में पाया जाने वाला ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन दुनिया के दुर्लभ बंदरों में शामिल है. इसके चेहरे का रंग काला और शरीर पर सुनहरे-नारंगी बाल होते हैं. सिर और गर्दन के आसपास लंबे बाल होने की वजह से इसका नाम लायन टैमरिन पड़ा है. यह छोटा बंदर पेड़ों पर रहता है और इसकी पूरी जंगली आबादी 400 से भी कम मानी जाती है. अब इसे येलो फीवर जैसी बीमारी से बचाने के लिए पहली बार जंगल में ही वैक्सीन दी गई है. Photo: Getty
जुलाई 2026 में ब्राजील के पराना राज्य के सुपरागुई नेशनल पार्क में तीन ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन को येलो फीवर की वैक्सीन लगाई गई. इनमें दो नर और एक मादा थे. यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि इस प्रजाति की आबादी पहले से बहुत छोटी है और जंगल में बीमारी का बड़ा प्रकोप इसके लिए गंभीर खतरा बन सकता है. आईयूसीएन की मौजूदा सूची में ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन को एंडेंजर्ड यानी संकटग्रस्त बताया गया है. Photo: Getty
सिर्फ ब्राजील में मिलता है यह बंदर... ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन का वैज्ञानिक नाम लियोन्टोपिथेकस कैसारा है. यह दुनिया में सिर्फ ब्राजील के अटलांटिक फॉरेस्ट में पाया जाता है. इसका इलाका मुख्य रूप से पराना और साओ पाउलो के कुछ तटीय हिस्सों तक सीमित है. यानी इसकी पूरी प्राकृतिक आबादी एक ही देश के छोटे से इलाके में रहती है. Photo: Getty
यह आकार में छोटा बंदर है और ज्यादातर समय पेड़ों पर रहता है. यह दिन में सक्रिय रहता है और आमतौर पर छोटे समूहों में रहता है. इसके भोजन में फल, फूल, नेक्टर और पेड़ों से निकलने वाला गोंद शामिल हैं. यह कीड़े और दूसरे छोटे जीव भी खाता है. Photo: Getty
जंगल कम होना भी बड़ी समस्या... इस प्रजाति के लिए बीमारी के अलावा उसका घटता और बंटता जंगल भी बड़ी परेशानी है. अटलांटिक फॉरेस्ट का बड़ा हिस्सा पहले ही खत्म हो चुका है और बचे हुए जंगल कई छोटे हिस्सों में बंट गए हैं. इससे ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन के अलग-अलग समूहों के बीच संपर्क कम होता है. Photo: Getty
जब किसी जानवर की आबादी छोटे-छोटे समूहों में बंट जाती है, तो उसके लिए दूसरे समूहों तक पहुंचना और आपस में प्रजनन करना मुश्किल हो सकता है. इससे लंबे समय में उसकी आबादी और जेनेटिक विविधता पर असर पड़ सकता है. इसी वजह से इसके बचे हुए जंगलों को सुरक्षित रखना इस प्रजाति के संरक्षण का अहम हिस्सा है. Photo: Getty
येलो फीवर से क्यों खतरा?... ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन के लिए येलो फीवर एक अलग तरह का खतरा है. यह वायरस से होने वाली बीमारी है, जो मच्छरों के जरिए फैलती है. ब्राजील के अटलांटिक फॉरेस्ट में येलो फीवर के प्रकोप से कई जंगली प्राइमेट्स प्रभावित हो चुके हैं. छोटी आबादी वाली प्रजाति में बीमारी का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है. अगर एक ही इलाके में रहने वाले कई जानवर संक्रमित हो जाएं, तो पूरी स्थानीय आबादी तेजी से घट सकती है. इसी खतरे को देखते हुए वैज्ञानिकों ने ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन को पहले से वैक्सीन देने का फैसला किया. Photo: Getty
पहली बार जंगल में वैक्सीन... इस अभियान में तीन ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन को कुछ समय के लिए सुरक्षित तरीके से पकड़ा गया. उन्हें वैक्सीन देने के साथ ब्लड और दूसरे सैंपल लिए गए. उनकी पहचान के लिए माइक्रोचिप और निगरानी के लिए रेडियो कॉलर लगाए गए. इसके बाद तीनों को वापस जंगल में छोड़ दिया गया. Photo: Getty
वैक्सीन के बाद वैज्ञानिक उनकी सेहत और शरीर में बनने वाली इम्यून प्रतिक्रिया पर नजर रख रहे हैं. अभी तक किसी गंभीर साइड इफेक्ट की जानकारी नहीं मिली है. इन शुरुआती नतीजों के आधार पर आगे दूसरे ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन को भी वैक्सीन देने पर काम किया जा सकता है. Photo: Getty
क्यों जरूरी है इस बंदर को बचाना?... ब्लैक-फेस्ड लायन टैमरिन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसकी आबादी बहुत छोटी है और इसका प्राकृतिक इलाका भी सीमित है. इसके ऊपर जंगलों का कम होना और येलो फीवर जैसी बीमारी का खतरा बना हुआ है. इसलिए सिर्फ वैक्सीन देना ही इस प्रजाति को बचाने का समाधान नहीं है. इसके जंगलों को बचाना, अलग-अलग आबादी वाले इलाकों को जोड़ना और बीमारी पर नजर रखना भी उतना ही जरूरी है. जंगल में पहली बार हुआ यह वैक्सीनेशन इसी बड़े संरक्षण प्रयास का एक हिस्सा है. Photo: Getty