Hindu Dharam: कभी सोचा है कि भगवान श्रीकृष्ण की भव्य नगरी द्वारका आखिर समुद्र में कैसे समा गई? आज की कहानी उस शहर की है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह कभी समुद्र किनारे शान से खड़ा था. एक ऐसा नगर, जहां भव्य महल थे, चौड़ी सड़कें थीं, बाजार थे और समुद्री व्यापार की चहल-पहल थी. लेकिन समय बदला और धीरे-धीरे यह पूरी नगरी इतिहास के पन्नों से गायब होती चली गई.
श्रीकृष्ण की भव्य नगरी द्वारका
प्राचीन ग्रंथों में द्वारका को श्रीकृष्ण की राजधानी बताया गया है. महाभारत, हरिवंश और श्रीमद्भागवत पुराण में इसके वैभव का वर्णन मिलता है. मान्यता है कि मथुरा छोड़ने के बाद श्रीकृष्ण ने यादवों के लिए समुद्र के किनारे एक नई और सुरक्षित नगरी बसाई थी.
कहा जाता है कि यह नगर केवल रहने की जगह नहीं था, बल्कि व्यापार, संस्कृति और सत्ता का एक बड़ा केंद्र था. समुद्र के रास्ते यहां दूर-दूर से व्यापारी आते थे. नगर की संरचना और समृद्धि का वर्णन इतना भव्य है कि द्वारका को प्राचीन भारत के सबसे चर्चित नगरों में गिना जाता है. लेकिन फिर आया महाभारत युद्ध के बाद का समय.
युद्ध खत्म हुआ, कौरव वंश का अंत हुआ और गांधारी अपने पुत्रों की मृत्यु के दुख में डूब गईं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दौरान उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि जिस तरह कौरव वंश नष्ट हुआ, उसी तरह यादव वंश का भी अंत होगा. समय बीतता गया और यादवों के भीतर ही संघर्ष बढ़ने लगा. धीरे-धीरे वह समय भी आ गया, जब श्रीकृष्ण ने अपना अवतार कार्य पूरा किया.
श्रीकृष्ण के प्रस्थान के बाद डूबी द्वारका?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद द्वारका का अंत भी शुरू हो गया. कहा जाता है कि समुद्र ने धीरे-धीरे उस नगरी को अपने भीतर समेट लिया. महल, सड़कें और भवन लहरों के नीचे खोते चले गए. सदियां गुजर गईं. द्वारका का नाम ग्रंथों और धार्मिक कथाओं में जिंदा रहा, लेकिन इतिहास की दुनिया में यह सवाल बना रहा कि क्या श्रीकृष्ण की वह नगरी वास्तव में कभी मौजूद थी?
जब समुद्र की गहराइयों में शुरू हुई खोज
फिर समुद्र के भीतर खोज शुरू हुई. 20वीं सदी में गुजरात के द्वारका तट और उसके आसपास समुद्री पुरातात्विक सर्वेक्षण किए गए. समुद्र के भीतर पत्थर की संरचनाएं, प्राचीन लंगर और मानव गतिविधियों से जुड़े कई अवशेष मिले. इन खोजों ने एक बार फिर द्वारका की कहानी को चर्चा के केंद्र में ला दिया.
समुद्री पुरातत्व, गोताखोरी और वैज्ञानिक तकनीकों के जरिए शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र के इतिहास को समझने की कोशिश की. अलग-अलग स्थानों से मिले अवशेषों ने यह जरूर संकेत दिया कि गुजरात का यह तटीय क्षेत्र प्राचीन समय से मानव बसाहट और समुद्री गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है.
क्या समुद्र के नीचे मिली है श्रीकृष्ण की द्वारका?
हालांकि, यहां सबसे बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है. क्या समुद्र के नीचे मिले ये सभी अवशेष वास्तव में महाभारत कालीन श्रीकृष्ण की द्वारका के ही हैं? इस सवाल पर आज भी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के बीच अलग-अलग राय हैं. विभिन्न नमूनों और संरचनाओं की तिथियां अलग-अलग कालखंडों की ओर संकेत करती हैं. इसलिए वैज्ञानिक रूप से यह कहना अभी संभव नहीं है कि समुद्र के नीचे मिली हर संरचना निश्चित रूप से वही द्वारका है, जिसका वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है. लेकिन इन खोजों ने एक बात जरूर साफ कर दी गुजरात का तटीय क्षेत्र हजारों वर्षों से समुद्री गतिविधियों और मानव सभ्यताओं का गवाह रहा है.
आस्था और विज्ञान के बीच द्वारका का रहस्य
द्वारका की कहानी भी यहीं सबसे दिलचस्प हो जाती है. एक तरफ वह द्वारका है, जो आस्था में बसती है. जहां श्रीकृष्ण की राजधानी, उनका जीवन और उनके प्रस्थान के बाद समुद्र में डूबती नगरी की कथा सुनाई जाती है.
दूसरी तरफ वह द्वारका है, जिसे विज्ञान समुद्र की गहराइयों में खोज रहा है. जहां हर पत्थर, हर संरचना और हर पुरातात्विक वस्तु से अतीत के सवाल पूछे जा रहे हैं. शायद यही वजह है कि द्वारका सिर्फ एक धार्मिक कहानी नहीं है और न ही केवल एक पुरातात्विक खोज. यह एक ऐसा रहस्य है, जहां आस्था, इतिहास और विज्ञान एक-दूसरे से मिलते हैं.
द्वारका डूबी, लेकिन कहानी बाकी है
द्वारका डूब गई, लेकिन उसकी कहानी कभी खत्म नहीं हुई. आज भी अरब सागर की लहरों के नीचे इतिहास के कई सवाल दबे हुए हैं. हो सकता है आने वाले समय में नई तकनीक और समुद्री पुरातत्व की मदद से ऐसे और प्रमाण सामने आएं, जो हमें इस प्राचीन नगरी की कहानी को पहले से कहीं बेहतर तरीके से समझने में मदद करें. और शायद तब समुद्र की गहराइयों में छिपी द्वारका की कहानी का एक और अध्याय हमारे सामने आए.
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