Ramayana: कुछ दिन पहले फिल्म रामायण का पहला ट्रेलर लॉन्च हो चुका है, जो कि दिवाली पर रिलीज होगी. रामायण फिल्म में रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश के साथ एक्टर सुहैल नय्यर भी नजर आएंगे. दरअसल, सुहेल नय्यर इस फिल्म में बालि के छोटे भाई सुग्रीव का किरदार निभाते नजर आएंगे. तो चलिए जानते हैं कि कौन थे सुग्रीव.
कौन थे सुग्रीव?
रामायण के मुताबिक, सुग्रीव बालि के छोटे भाई थे. कईं किंवदंतियों के मुताबिक, सुग्रीव के पिता सूर्यदेव थे और बालि के पिता इंद्रदेव थे. परंतु रामायण के मुताबिक, सुग्रीव और बालि दोनों अनाथ थे. उनका पालन-पोषण ऋषि गौतम के आश्रम में अनुसूया और गौतम ऋषि ने किया था. दोनों बच्चे आश्रम में रहते थे. एक दिन किष्किंधा के वानर राजा वृषराज ऋषि गौतम के आश्रम में पहुंचे. उस समय उनके कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने इन दोनों बच्चों को गोद लेने की इच्छा जताई. गौतम ऋषि ने सोचा कि अगर सुग्रीव और बालि को वानर रूप देकर वृषराज को सौंप दिया जाए, तो उनका भविष्य बेहतर हो सकता है. इसके बाद दोनों को वानर रूप में किष्किंधा ले जाया गया. किष्किंधा प्राकृतिक रूप से बहुत समृद्ध थी. वहां पेड़-पौधों, फलों और प्राकृतिक संसाधनों की भरमार थी. नए स्थान पर पहुंचकर सुग्रीव और बालि भी खुश रहने लगे.
वृषराज भी बालि और सुग्रीव की परवरिश पर विशेष ध्यान देते थे. उन्होंने दोनों को शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ युद्ध और राज्य से जुड़े जरूरी नियमों की भी शिक्षा दिलाई. किष्किंधा वानरों का राज्य था और वहां की सीमाओं पर अक्सर राक्षसों और नरभक्षियों का खतरा बना रहता था. इसलिए, वृषराज को हमेशा सतर्क रहना पड़ता था. समय के साथ बालि काफी शक्तिशाली हो गया और सुग्रीव भी उसके समान ही मजबूत और कुशल बन गया. दोनों ने अपने राज्य के नियम-कायदे और जिम्मेदारियां समझनी शुरू कर दीं.
कैसे हुई थी सुग्रीव की बालि से दुश्मनी?
बालि और सुग्रीव ने मिलकर किष्किंधा को एक समृद्ध राज्य बनाए रखा. वहां फलों की भरपूर पैदावार होती थी और खाने के लिए अनाज भी पर्याप्त मात्रा में था. कहा जाता है कि किष्किंधा के सभी वानर शाकाहारी थे और वहां कोई भी जानवरों का मांस नहीं खाता था. विवाह के बाद बालि और सुग्रीव ने खजूर के पेड़ और अंगूर की बेलें भी लगाईं. बालि के ससुर सुशेन अच्छे चिकित्सक होने के साथ-साथ पेड़-पौधों और बागवानी की अच्छी जानकारी रखते थे. उनकी सलाह से किष्किंधा में खेती और बागवानी को भी बढ़ावा मिला.
बाद में एक दिन एक राक्षस दुंदुभि ने किष्किंधा पर हमला कर दिया था. बालि ने अकेले ही उसका सामना किया. सुग्रीव भी दुंदुभि का पीछा करते हुए एक गुफा तक पहुंच गए. राक्षस गुफा के अंदर चला गया और सुग्रीव गुफा के बाहर उसका इंतजार करने लगे. गुफा के अंदर बालि और दुंदुभि के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था. उनके युद्ध की आवाज किष्किंधा के महल तक सुनाई दे रही थी. मरने से पहले दुंदुभि ने बालि जैसी तेज आवाज निकाली. यह सुनकर सुग्रीव और किष्किंधा के लोगों को लगा कि बालि मारा गया. सुग्रीव काफी देर तक गुफा के बाहर इंतजार करते रहे. जब उन्हें लगा कि बालि की मौत हो चुकी है, तो उन्होंने गुफा के मुंह पर एक बड़ा पत्थर रख दिया. गुफा के बाहर खून भी बहकर आ गया था. इसके बाद सुग्रीव वापस किष्किंधा लौट आए और अपनी पत्नी व परिवार के लोगों के साथ राजगद्दी पर बैठकर राज्य चलाने लगे.
कुछ समय बाद बालि ने गुफा के मुंह पर रखा भारी पत्थर हटाकर बाहर निकलने की कोशिश की और वह बाहर आ गए. बाहर आने के बाद उसे वहां सुग्रीव नहीं मिले. उसे समझ आ गया कि सुग्रीव ने उसे मृत मानकर किष्किंधा का राज संभाल लिया है. यह देखकर बालि को बहुत अपमान महसूस हुआ और वह गुस्से से भर गया. जब बालि राजदरबार में पहुंचा, तो उसने देखा कि सुग्रीव बीच में राजगद्दी पर बैठे हैं. उनके दोनों ओर रूमा और तारा बैठी थीं. बालि ने दरबार में जोर से दहाड़ लगाई और कहा कि कोई भी अपनी जगह से खड़ा न हो. लेकिन सुग्रीव पहले ही खड़े हो चुके थे. यह देखकर बालि और ज्यादा नाराज हो गया और उसने सुग्रीव को अपना आदेश न मानने वाला और अवज्ञाकारी घोषित कर दिया.
गुस्से से भरे बालि ने हाथ में गदा लेकर सुग्रीव का पीछा करना शुरू कर दिया. सुग्रीव जहां भी भागते, हनुमान और उनके साथी भी उनके साथ भागते और उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचाने की कोशिश करते. जब भी सुग्रीव वापस अपने महल की ओर जाने की कोशिश करते, बालि उन्हें मारने के लिए फिर से उनका पीछा करने लगता.
सुग्रीव अपनी जान बचाने के लिए धरती के अलग-अलग हिस्सों में भागते रहे. इस दौरान उन्होंने कई देशों और जगहों को देखा. वह समुद्र के ऊपर से भी छलांग लगाकर निकले थे. जब वह समुद्र के ऊपर से गुजरते, तो समुद्र का पानी शीशे की तरह चमकता हुआ दिखाई देता था. इस तरह उन्होंने दुनिया के कई हिस्सों को अपनी आंखों से देखा और उनके बारे में जानकारी हासिल की.
बाद में यही जानकारी सुग्रीव के बहुत काम आई. जब रावण माता सीता का अपहरण कर ले गया था, तब उनकी खोज के लिए सुग्रीव ने वानरों को अलग-अलग दिशाओं में भेजा. ऋष्यमूक पर्वत पर बैठकर सुग्रीव ने भगवान राम को बताया कि उन्होंने सीता की खोज से पहले धरती के कई हिस्सों को घूमकर देखा था और किस तरह वह आकाश में छलांग लगाकर दूर-दूर तक गए थे.
नदीश्च विविधाः पश्यन् वनानि नगराणि च ॥
आदर्श तल संकाशा ततो वै पृथवी मया।
अलात चक्र प्रतिमा दृष्टा गोष्तवत् कृता ॥
सुग्रीव ने भगवान राम को बताया कि बालि लगातार उनका पीछा कर रहा था. अपनी जान बचाने के लिए वह कई नदियों को पार करते हुए घने जंगलों और अलग-अलग शहरों से होकर गुजरे. उन्हें ऐसा लगने लगा था, जैसे वह धरती का बार-बार चक्कर लगा रहे हों. रास्ते में जब वह समुद्र के ऊपर से गुजरते, तो नीचे का पानी उन्हें शीशे की तरह चमकता हुआ दिखाई देता था और धरती गोल नजर आती थी. उनकी इन बातों से भगवान राम समझ गए कि सुग्रीव ने बहुत दूर-दूर तक यात्रा की है और वह माता सीता की खोज में काफी मदद कर सकते हैं.
भगवान राम की मदद से सुग्रीव बने किष्किंधा के राजा
भगवान राम ने बालि का वध करके सुग्रीव की मदद की. इसके बाद सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया गया. आगे चलकर राजकुमार अंगद को किष्किंधा का उत्तराधिकारी बनाया जाना था. जब रावण माता सीता का अपहरण करके उन्हें लंका ले गया, तब सुग्रीव ने भगवान राम की मदद की और माता सीता को खोजने के अभियान में उनका साथ दिया. बालि की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी तारा भी किष्किंधा के प्रशासन में मदद करती थीं, क्योंकि उस समय अंगद अभी शासन चलाने के लिए छोटे और अनुभवहीन थे. सुग्रीव के नेतृत्व में किष्किंधा का राज्य अच्छी तरह चलने लगा. वह सही काम के लिए सही व्यक्ति को जिम्मेदारी देते थे और उनके कुशल प्रबंधन से राज्य की व्यवस्था मजबूत हुई.
माता सीता की खोज के लिए सुग्रीव ने अपनी सेना के प्रशिक्षित सैनिकों और प्रमुख योद्धाओं को चारों दिशाओं में भेजा था. उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों की भौगोलिक जानकारी का भी अच्छा ज्ञान था. इसी वजह से वह लंका तक पहुंचने के रास्ते और वहां की स्थिति को समझने में सक्षम थे. सुग्रीव के राज्य में नील एक कुशल वास्तुकार थे. उन्होंने समुद्र के ऊपर लंका तक जाने के लिए पुल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस काम में मैंद और द्विविद नाम के दो कुशल वानरों ने भी उनकी मदद की.
सुग्रीव खुद भी एक महान योद्धा थे. लंका के युद्ध में जब वानर सैनिक कुंभकर्ण को देखकर डरकर भागने लगे, तब सुग्रीव ने उसका सामना किया था. श्री राम के साथ अपनी मित्रता और किए गए वादे को निभाते हुए सुग्रीव ने लंका के युद्ध में भगवान राम का साथ दिया और रावण पर विजय हासिल की. जब भगवान राम, माता सीता के साथ अयोध्या लौट रहे थे, तब सुग्रीव और उनकी पत्नी रूमा भी उनके साथ गए. भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद दोनों वापस किष्किंधा लौट आए.
काफी समय बीतने के बाद अंगद ने किष्किंधा का शासन संभाल लिया था. इसी दौरान सुग्रीव और रूमा ने गौतम ऋषि से एक छोटी बच्ची को गोद लिया और उसे अपनी बेटी के रूप में पालने लगे. उस समय दंडकारण्य क्षेत्र पर सहस्रमुख रावण के पुत्र चंद्रगुप्त का शासन था और यह क्षेत्र विभीषण के नियंत्रण में था. शूर्पणखा अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ पाई थी और कभी-कभी चंद्रगुप्त के समय जनस्थान भी जाया करती थी. माता सीता के अपहरण में असफल होने के बाद उसके मन में बदला लेने की भावना फिर जाग उठी. उसे यह भी याद था कि सुग्रीव ने कुंभकर्ण को युद्ध में मार दिया था.
सुग्रीव का शासन
एक दिन शूर्पणखा ने चंद्रगुप्त को सुग्रीव के खिलाफ भड़का दिया. इसके बाद चंद्रगुप्त ने सुग्रीव की बेटी का अपहरण कर लिया. तब तारा ने रूमा को सलाह दी कि वह सीधे चंद्रगुप्त से युद्ध न करें, बल्कि अयोध्या के राजा से मदद मांगें. उस समय अयोध्या में कुश का शासन था और उनकी पत्नी रानी कुमुदवती थीं. कुमुदवती ने तारा को भरोसा दिया कि वह चंद्रगुप्त के कब्जे से सुग्रीव की बेटी को वापस लाएंगी. माता सीता की बहादुर बहू कुमुदवती ने चंद्रगुप्त से युद्ध किया, उसे मार डाला और सुग्रीव की बेटी को सुरक्षित वापस ले आईं.
जब बच्ची सुग्रीव के पास वापस पहुंची, तब वह काफी बीमार थी. जनस्थान में उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया था, जिसकी वजह से उसकी तबीयत खराब हो गई थी. सुग्रीव उसे वैद्य सुषेण के पास ले गए. सुषेण ने बताया कि अगर बच्ची को नियमित रूप से गाय का दूध दिया जाए, तो वह जल्द ठीक हो सकती है. लेकिन, उस समय किष्किंधा में एक भी गाय नहीं थी. तब सुग्रीव को अपने पुराने मंत्री हनुमान की याद आई. वह अयोध्या गए और हनुमान से मिले. सुग्रीव ने उन्हें अपनी बेटी की बीमारी के बारे में बताया और उसके लिए गाय के दूध की जरूरत बताई.
हनुमान ने इस बारे में रानी कुमुदवती से बात की. उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि जब भगवान राम 14 साल का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटने वाले थे, तब राजा भरत ने हनुमान को एक लाख गायें और 100 गांव देने का वादा किया था. भरत ने यह भी कहा था कि इन गायों की देखभाल उनकी पत्नी और उनकी 16 बेटियां मिलकर करेंगी.
गवां शतसहस्रं च ग्रामाणां च शतं परम्।
सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्याश्च षोडश ॥
इसके बाद राजा कुश ने एक लाख गायों की व्यवस्था की. इन गायों की नस्ल को अमृत महल नाम दिया गया. वहीं, कुमुदवती चंद्रगुप्त को मारने के बाद दक्षिण दिशा में गोदावरी नदी के क्षेत्र से वापस लौटी थीं. उन्होंने किष्किंधा के आसपास के क्षेत्रों का हिसाब लगाया और पाया कि करीब 100 गांव ऐसे थे, जिन्हें सुग्रीव को दिया जा सकता था. ये गांव दंडकारण्य से अलग थे और नदी के दक्षिणी हिस्से में स्थित थे. बाद में इन्हें किष्किंधा के साथ जोड़ दिया गया और सुग्रीव को दान कर दिया गया.
इसके बाद अमृत महल नस्ल की एक लाख गायें किष्किंधा पहुंचीं. रानी मांडवी अपनी 16 बेटियों के साथ इन गायों की देखभाल के लिए वहां आईं. सुग्रीव और रूमा बहुत खुश हुए और उन्होंने हनुमान को इस उपहार के लिए धन्यवाद दिया. कहा जाता है कि किष्किंधा को गायों का यह उपहार मिलने के बाद वहां की नदी का नाम कुमुदवती नदी पड़ा. इन 100 गांवों का इस्तेमाल गायों के चरने के लिए किया जाता था. इसलिए उनकी कोई निश्चित सीमा नहीं थी. आम तौर पर इनका क्षेत्र गोदावरी नदी के दक्षिण में और कुमुदवती नदी के आसपास के इलाके तक माना जाता था. जंगलों को इस क्षेत्र में शामिल नहीं किया गया था.
हनुमान ने सुग्रीव को एक लाख अमृत महल गायें देने के बाद एक और खतरे के बारे में पता लगाया. शूर्पणखा मांडवी और उनकी 16 बेटियों के लिए खतरा बन रही थी. हनुमान ने इस बारे में माता सीता की बहू रानी कुमुदवती को जानकारी दी. इसके बाद सुग्रीव ने अंगद और किष्किंधा के लोगों को आदेश दिया कि वे शूर्पणखा को मारने में रानी कुमुदवती की पूरी मदद करें. अंगद ने यह जिम्मेदारी अपनी मां तारा को सौंप दी. मांडवी, कुमुदवती और उनकी 16 बेटियों के साथ बैठक हुई और शूर्पणखा को खत्म करने की योजना बनाई गई.
एक दिन शूर्पणखा फिर दंडकारण्य पहुंची. इस बार उसके साथ लंका से उसकी सहेली और देवरानी कुंभिनी भी थी. वहां कुमुदवती की सेना ने मांडवी और उनकी 16 बेटियों के साथ मिलकर उनका सामना किया. वहीं तारा छिपकर बैठी थीं, ताकि सही समय आने पर इन राक्षसियों पर हमला कर सकें. युद्ध शुरू होने से पहले दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई. यह महिलाओं के बीच शब्दों का युद्ध था. सुग्रीव ने अयोध्या से हनुमान को बुलाया और हनुमान तुरंत किष्किंधा पहुंच गए. उन्होंने वहां की स्थिति को समझा और उन गायों की रक्षा करने का फैसला किया, जिन्हें उन्होंने किष्किंधा को दिया था. हनुमान अपनी गदा लेकर दोनों पक्षों के बीच खड़े हो गए और सभी से बहस बंद करके युद्ध रोकने की अपील की.
कुमुदवती समझौते के लिए तैयार हो गईं, लेकिन शूर्पणखा अपनी बात पर अड़ी रही. हनुमान ने उससे पूछा कि आखिर वह चाहती क्या है. शूर्पणखा ने बताया कि वह भगवान राम को अपना पति बनाना चाहती है. इसी बीच किष्किंधा के सुरक्षा प्रमुख मैंद और द्विविद भी सुग्रीव के साथ वहां पहुंच गए. भगवान राम ने पहले उनसे दोबारा मिलने का वादा किया था. हनुमान ने भी इस वादे की पुष्टि की. सभी ने मिलकर शूर्पणखा को समझाया कि वह भगवान राम को पति के रूप में पाने के लिए इंतजार करें और तपस्या करें. उन्होंने कहा कि जब तक राम से उसकी मुलाकात नहीं हो जाती या मैंद और द्विविद की उनसे दोबारा मुलाकात नहीं होती, तब तक उसे इंतजार करना चाहिए.
लेकिन शूर्पणखा इसके लिए तैयार नहीं हुई. उसने कहा कि इंतजार करने से अच्छा है कि वह मर जाए. शूर्पणखा की यह बात सुनकर तारा को अपने पति बालि की याद आ गई. बालि को भगवान राम ने छिपकर बाण चलाकर मारा था. तारा ने सोचा कि उनके पति ने भगवान राम के हाथों मृत्यु को स्वीकार किया था. किष्किंधा की जिम्मेदारी और संपत्ति अब उनके पास थी. वह चाहती थीं कि उनके पति की आत्मा को शांति मिले और किष्किंधा में सुख-समृद्धि बनी रहे. इसके लिए उन्हें लगा कि शूर्पणखा को रोकना जरूरी है.
तारा ने अपना धनुष उठाया और एक बाण शूर्पणखा तथा दूसरा कुंभिनी पर चला दिया. दोनों की मृत्यु हो गई. इसके बाद तारा ने दोनों राक्षसियों के शव समुद्र में फेंक दिए. इसके बाद सुग्रीव ने हनुमान से पूछा कि कुंभिनी को क्यों मारा गया. हनुमान ने बताया कि कुंभिनी गायों का अपहरण करने के इरादे से वहां आई थी, इसलिए तारा ने उसे मार दिया.
सुग्रीव ने हनुमान से पूछा कि शूर्पणखा भगवान राम को अपना पति क्यों बनाना चाहती थी. हनुमान को भूतकाल और भविष्य की घटनाओं का ज्ञान था. उन्होंने सुग्रीव को बताया कि अगले युग में भगवान राम श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेंगे और पांडवों का साथ देंगे. हनुमान जी ने बताया कि अश्वमेध यज्ञ के समय पांचवें पांडव सहदेव किष्किंधा आएंगे. उस दौरान होने वाले युद्ध में भगवान कृष्ण, मैंद और द्विविद को भगवान राम के रूप में दिखाई देंगे.
उन्होंने आगे बताया कि शूर्पणखा अगले जन्म में कुब्जा के रूप में जन्म लेगी. वह फिर भगवान को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या करेगी. भगवान कृष्ण ने 16,008 महिलाओं से विवाह किया था और कुब्जा भी उनमें से एक थी. कुब्जा को भी भगवान कृष्ण में भगवान राम का ही रूप दिखाई देगा, जैसे मैंद और द्विविद को दिखाई दिया था. यह सुनकर सुग्रीव ने हनुमान को धन्यवाद दिया. इसके बाद सुग्रीव और रूमा ने अपनी बेटी और हनुमान को गाय का दूध दिया. हनुमान ने उनकी बेटी को आशीर्वाद दिया और फिर अयोध्या चले गए. बाद में बाकी रानियां और उनकी बेटियां भी अयोध्या लौट गईं. वहीं मैंद और द्विविद ने अमृत महल की गायों की देखभाल की जिम्मेदारी संभाली. किष्किंधा को मिले 100 गांवों का इस्तेमाल गायों के चरने के लिए किया जाने लगा.
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