Ramayana: 'जय जय राम' गाने में दिखी भरत की झलक, जानें रामायण के इस किरदार की पूरी कहानी

Ramayana: रामायण फिल्म के गाने 'जय जय राम' में सबसे दिल को छू लेने वाला पल वह है, जब श्रीराम (रणबीर कपूर) अपने छोटे भाई भरत (आदिनाथ कोठारे) से गले मिलते हैं. तो चलिए जानते हैं कि कौन थे भरत, जिनके त्याग को दुनिया आजतक याद रखती है.

Advertisement
रामायण फिल्म का सीन श्रीराम भरत मिलाप (Photo: Screengrab) रामायण फिल्म का सीन श्रीराम भरत मिलाप (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:43 PM IST

Ramayana: नितेश तिवारी के डायरेक्शन में बनी फिल्म रामायण का पहला गाना 'जय जय राम' हाल ही में रिलीज हुआ है. ए.आर. रहमान के संगीत, डॉ. कुमार विश्वास के बोल और अरिजीत सिंह व श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज से सजा यह गाना दर्शकों के बीच काफी पसंद किया जा रहा है. इस गाने में श्रीराम (रणबीर कपूर) और माता सीता (साई पल्लवी) के भव्य विवाह, अयोध्या में नगरवासियों द्वारा पुष्प वर्षा से स्वागत और राजा दशरथ (अरुण गोविल) के साथ भावनात्मक दृश्यों को दिखाया गया है. लेकिन इस पूरे गाने का सबसे दिल को छू लेने वाला दृश्य वह है, जहां श्रीराम अपने छोटे भाई भरत से गले मिलते हैं. 

Advertisement

इस गाने के माध्यम से फिल्म मेकर्स ने भरत के किरदार में नजर आने वाले एक्टर आदिनाथ कोठारे की पहली झलक भी दिखाई है. तो आइए जानते हैं कि रामायण में भरत का किरदार कितना महत्वपूर्ण था और आदिनाथ कोठारे पर्दे पर जिसका किरदार निभाएंगे उनका वास्तविक सच क्या है.

कौन थे भरत?

रामायण व रामचरितमानस के मुताबिक, भरत केवल श्रीराम के भाई (अनुज) नहीं थे, बल्कि वे निस्वार्थ प्रेम, धर्म और त्याग के सर्वोच्च प्रतीक भी माने जाते हैं. भरत सूर्यवंशी राजा दशरथ और उनकी प्रिय रानी कैकेयी के पुत्र थे. बचपन से ही भरत का अपने बड़े भाई श्रीराम के प्रति स्नेह और आदर रखते थे. भरत का विवाह राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री मांडवी से हुआ था.

मातृ-मोह पर धर्म की विजय

रामायण के अनुसार, जब भरत अपने ननिहाल (कैकेय देश) से अयोध्या लौटे और उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी माता कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वरदान मांगकर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास पर भेजा है और उनके लिए राजसिंहासन मांगा है, तो वे अत्यंत दुखी और लज्जित हुए. भरत ने बिना किसी झिझक के अपनी माता के इस अनुचित कार्य का विरोध किया. उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अयोध्या के सिंहासन पर केवल बड़े भाई श्रीराम का अधिकार है और किसी भी अनैतिक सुख को वे स्वीकार नहीं करेंगे. उन्होंने अपनी माता कैकेयी के इस अपराध की कठोर शब्दों में निंदा भी की थी. 

Advertisement
रामायण फिल्म (Photo: ITG)

चित्रकूट में राम-भरत मिलाप

इसके बाद भरत केवल दुखी होकर शांत नहीं बैठे, बल्कि वे पूरी अयोध्या नगरी, माताओं और गुरु वशिष्ठ के साथ श्री राम को वापस लाने के लिए चित्रकूट के जंगलों की ओर चल पड़े थे. चित्रकूट में जब श्रीराम और भरत का मिलाप हुआ, तो वह प्रसंग इतना भावुक था कि वहां मौजूद हर किसी की आंखें नम हो गई थी. भरत ने श्रीराम के चरणों में गिरकर अयोध्या वापस लौटने की विनती भी की थी. हालांकि, श्रीराम ने अपने पिता के वचनों का मान रखते हुए अयोध्या लौटने से इनकार कर दिया था.

जब श्री राम ने लौटने से मना कर दिया था, तो भरत ने श्री राम की 'चरण पादुकाएं' (खड़ाऊ) मांगी थी. उन्होंने संकल्प लिया कि वे कभी भी अयोध्या के राजसिंहासन पर नहीं बैठेंगे. भरत ने श्री राम की पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान किया और स्वयं को केवल उनका 'प्रतिनिधि' (सेवक) मानकर राज्य का संचालन किया था.

नंदीग्राम में 14 वर्षों का कठिन तपस्वी जीवन

भरत केवल नाम के त्यागी नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने आचरण से उसे सिद्ध किया था. उन्होंने राजमहल के सारे सुख-वैभव का त्याग कर दिया था. महल के वैभव और सुख-सुविधाओं को छोड़कर, भरत ने अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में एक साधारण कुटिया बनाई थी. जहां 14 वर्षों तक उन्होंने भी अपने भाई श्रीराम की तरह सिर पर जटाएं रखीं, वल्कल वस्त्र पहने, कंद-मूल खाया और भूमि पर सोकर एक तपस्वी का जीवन बिताया था. उनका मानना था कि यदि उनके भाई श्रीराम वनों में कष्ट सह रहे हैं, तो वे महल की सुख-सुविधाओं का आनंद लेने के हकदार नहीं हैं.

Advertisement

आज के समाज के लिए भरत का संदेश

भरत का चरित्र हमें सिखाता है कि रिश्ते, मूल्य और भ्रातृ-प्रेम किसी भी भौतिक संपत्ति या पद से कहीं ऊपर होते हैं. उन्होंने सिद्ध किया था कि सच्चा अधिकार वही है जो धर्म और न्याय पर आधारित हो, न कि जबरन छीना गया हो. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »