भारत और पाकिस्तान का रिश्ता हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है. दोनों देशों के बीच तनाव, सीमा विवाद और राजनीतिक मतभेद अक्सर सुर्खियों में रहते हैं. धर्म के नाम पर मतभेद और आतंकवाद ने कभी दोनों देशों के रिश्ते को सुधरने ही नहीं दिया. लेकिन जहां कुछ लोग दोनों देशों को धर्म, मजहब और सरहद से जोड़कर देखते हैं. वहीं, पाकिस्तान के दो मुस्लिम फनकारों ने इसी सरहद को नकारते हुए भगवान कृष्ण के लिए इतनी सुंदर कव्वाली बनाई थी कि आज भी उसे सुनकर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
'हे कन्हैया! याद है कुछ भी हमारी...' भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित यह लोकप्रिय कव्वाली पाकिस्तान में बनी थी. बहुत सारे लोगों को यह मालूम नहीं है कि पाकिस्तान के कराची शहर में बैठकर उस्ताद फरीद आयाज और अबु मोहम्मद ने सरहद को नकारते हुए भगवान श्रीकृष्ण के लिए यह कव्वाली गाई थी. पहली बार सुनने पर यह कव्वाली श्रीकृष्ण के लिए गाया हुआ कोई भजन लगता है. लेकिन वास्तव में यह एक कव्वाली है, जिसे दक्खन के एक सूफी शायर नवाब सादिक जंग बहादुर हिल्म ने लिखा था.
ऐसा कहा जाता है कि इस सूफी शायर ने भगवान श्रीकृष्ण को भगवान समझकर नहीं, बल्कि अपना महबूब समझकर पुकारा था. इसलिए कहा भी जाता है कि सूफिज्म के नाम तो अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आपका महबूब कभी अलग नहीं हो सकता है. इसलिए 800 साल पुरानी सूफी रवायत से जुड़े कव्वाल उस्ताद फरीद अयाज जब इसे गाते हैं तो सुनने वालों में कोई हिंदू या मुसलमान नहीं रह जाता, बस एक आशिक या महबूब बचता है जो अपने महबूब कन्हैय्या को पुकार रहा है.
क्या कहती है श्रीकृष्ण पर बनी ये कव्वाली?
इस कव्वाली में श्रीकृष्ण को संबोधित करके विरह और प्रेम की भावना व्यक्त की गई है. इसमें भक्त कन्हैया को पुकारते हुए कह रहा है कि क्या उन्हें अपने भक्त की कोई खैर-खबर है. आगे कव्वाल कहता है कि कन्हैया का पता लगाने के लिए उसने कहां-कहां विनती नहीं की, लेकिन उसे अपने प्रिय के दर्शन नहीं हुए. भगवान श्रीकृष्ण पर बनी इस कव्वाली के छोटे-छोटे क्विल आजकल सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे हैं. जिन लोगों को इसके बारे में जानकारी नहीं थी, वे ऐसे तेजी से शेयर भी कर रहे हैं.
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