प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी की मौत का मामला खूब सुर्खियों में हैं. 25 सितंबर को उनके एक शिष्य दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण ने वृंदावन स्थित गुरु कृपा कुंज की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी. इसके बाद लगातार प्रेमानंद महाराज और उनके आश्रम पर सवाल खड़े होने लगे. अलग-अलग जगहों से आए तीन परिवारों ने तो परिजनों की गुमशुदगी को लेकर प्रेमानंद के आश्रम के बाहर हंगामा तक खड़ा कर दिया. विवाद बढ़ता देख अब वृंदावन के अनिरुद्धाचार्य महाराज संत प्रेमानंद के बचाव में उतरे हैं.
संत अनिरुद्धाचार्य ने प्रेमानंद का बचाव करते हुए कहा, 'इतने बड़े संत प्रेमानंद महाराज पर लोग न जाने क्या-क्या आरोप लगा रहे हैं. कुछ लोग जानते-समझते कुछ नहीं है, बस जज बनकर न्याय करने लगते हैं. पूज्य प्रेमानंद महाराज लोगों ने कितना बुरा-भला कहा. प्रेमानंद महाराज ने रोज कथावाचन करके करोड़ों लोगों का जीवन भक्ति से जोड़ा. सबके मन में भगवान की प्रीत जगाई. इतना कुछ सुनने के बाद भी प्रेमानंद महाराज खामोश रहे.'
'किडनी खराब फिर भी सबकी सुनते हैं'
उन्होंने आगे कहा, 'जब मेढक टर-टर करते हैं तो कोयल चुप हो जाती है. कोयल अभी चुप है, क्योंकि समय मेढकों का है. लेकिन ध्यान रहे कि कांटों के बीच में ही गुलाब रहेगा.' अनिरुद्धाचार्य ने आगे कहा कि संत प्रेमानंद की किडनी साथ नहीं देती है. शरीर में हर समय सूजन बनी रहती है. फिर भी वह सबसे मिलते हैं. सबसे बात करते हैं. सबकी सुनते हैं और उन्हें भक्ति से जोड़ते हैं.
अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि प्रेमानंद महाराज की किडनी खराब है. उन्हें भला किसी से मिलने की क्या जरूरत है. लेकिन लोगों के सुख और मार्गदर्शन के लिए वह सबसे मिलते हैं. फिर भी समाज के कुछ लोग उनके पीछे पड़े हैं. उनके बारे में उल्टी-सीधी बातें कर रहे हैं. इस बीच उन्होंने एक श्लोक बोला- 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि'. यानी जब किसी इंसान के विनाश या बर्बादी का समय नजदीक आता है तो उसकी बुद्धि उल्टी दिशा में काम करने लगती है.
'धरती पर जो आया उसे जाना ही होगा'
अनिरुद्धाचार्य महाराज ने कहा कि प्रेमानंद महाराज एक भले संत हैं. लोगों के उद्धार के लिए काम करते हैं. अब किसी की मृत्यु हो गई तो उसमें उनका क्या कसूर है. क्या किसी की मृत्यु के लिए संत को जिम्मेदार ठहराना सही है. मृत्यु एक होनी है और होनी होकर ही रहती है. उनके शिष्य की मृत्यु जिस तरह हुई, उसके लिए संत प्रेमानंद महाराज कैसे जिम्मेदार हुए. धरती मृत्यु लोक है और यहां जो आया है, उसे जाना होगा. साधु-संत भी भगवान का नाम लेते हैं. लेकिन वो अजर-अमर नहीं हैं. इसलिए पूरी बात जाने बिना संतों को परेशान नहीं करना चाहिए.
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