पितृपक्ष शुरू होने वाले हैं. इस साल श्राद्ध की यह अवधि 26 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक रहेगी. इन पवित्र दिनों में लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं और उनका आशीर्वाद पाते हैं. श्राद्धकर्म के दौरान पितरों के निमित्त तर्पण करने की भी परंपरा है. हाथ में कुशा लेकर काले तिल मिला हुआ दूध, जल आदि पितरों को अर्पित करने के संस्कार को तर्पण कहा जाता है. लेकिन पितरों को जल अर्पित करते वक्त ज्यादातर लोग बड़ी कर देते हैं. दरअसल, बहुत सारे लोगों को तर्पण के वक्त हाथ की सही मुद्रा के बारे में पता ही नहीं है. इसलिए वे जाने-जाने गलत तरह से पितरों को जल अर्पित कर देते हैं. आइए आज आपको अर्पण और तर्पण की की सही विधि बताते है.
तर्पण करने की सही विधि क्या है?
शास्त्रों के अनुसार, हथेली में अंगूठे और तर्जनी अंगुली के बीच का हिस्सा पितृ तीर्थ कहलाता है. पितरों को तर्पण देते समय इसी स्थान से जल अर्पित किया जाना चाहिए. तर्पण के लिए पहले कुशा की अंगूठी बनाकर उसे अनामिका अंगुली में धारण करें. फिर हाथ में काले तिल मिला हुआ दध, गंगाजल, सुपारी, सिक्का और लाल फूल लेकर संकल्प लें. फिर जल को धीरे-धीरे अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच मौजूद पितृ तीर्थ से धीरे-धारे पात्र में गिराएं. इस तरह किया जाना वाले तर्पण सीधे पितरों तक पहुंचता है.
देवी-देवताओं को अर्पण कैसे करें?
भविष्य पुराण के अनुसार, दाहिने हाथ की अंगुलियों के अग्र भाग को देव तीर्थ बताया गया है. देवी-देवताओं को गंगाजल या कोई अन्य वस्तु अर्पित करते समय अंगुलियों के आगे वाले हिस्से से अर्पण करने की परंपरा है. इसलिए पूजा के दौरान भगवान को जल या अन्य सामग्री चढ़ाते समय उसे हथेली के बीच से देने के बजाय अंगुलियों के अग्र भाग से अर्पित किया जाता है.
ऋषि-ब्राह्मण को दान देने की सही मुद्रा क्या है?
दाहिनी हथेली में कनिष्ठा यानी सबसे छोटी अंगुली के नीचे का हिस्सा ऋषि तीर्थ कहलाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऋषियों को कोई वस्तु अर्पित करने या दान देने में हथेली के इसी भाग का इस्तेमाल किया जाता है. ऋषि तीर्थ से किया गया अर्पण या दान पुण्यकारी और फलदायी माना गया है. मान्यता है कि इस स्थान से अर्पण करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है.
पितृ पक्ष 2026 की पूरी तारीखें
26 सितंबर, शनिवार- भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर, रविवार- प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर, सोमवार- द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर, मंगलवार- तृतीया श्राद्ध
30 सितंबर, बुधवार- चतुर्थी श्राद्ध
1 अक्टूबर, गुरुवार- पंचमी श्राद्ध
2 अक्टूबर, शुक्रवार- षष्ठी श्राद्ध
3 अक्टूबर, शनिवार- सप्तमी और अष्टमी श्राद्ध
4 अक्टूबर, रविवार- नवमी श्राद्ध यानी मातृ नवमी
5 अक्टूबर, सोमवार- दशमी श्राद्ध
6 अक्टूबर, मंगलवार- एकादशी श्राद्ध
7 अक्टूबर, बुधवार- द्वादशी श्राद्ध
8 अक्टूबर, गुरुवार- त्रयोदशी श्राद्ध
9 अक्टूबर, शुक्रवार- चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर, शनिवार- अमावस्या श्राद्ध
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