राजस्थान का नाम सुनते ही दिमाग में क्या आता है? बड़े-बड़े किले, महल, रेत के टीले, ऊंट और रंग-बिरंगे कपड़े. लेकिन राजस्थान की कहानी इतनी भर नहीं है. इस कहानी में वो गांव भी हैं, जहां आज भी पीढ़ियों पुराना हुनर जिंदा है. वो कारीगर भी हैं, जिनके हाथों से कपड़े और कढ़ाई की पहचान बनती है. और वो स्वाद भी हैं, जिनका रिश्ता सिर्फ खाने से नहीं, बल्कि पूरे इलाके की परंपरा से है.
इसी राजस्थान को किलों और महलों से बाहर जाकर देखने के लिए एक Art Car निकली. करीब 20 दिनों में इसने 3,500 किलोमीटर से ज्यादा का सफर किया. 45 से ज्यादा जगहों पर पहुंची. और कैमरे में कैद की राजस्थान की वो तस्वीर, जो आमतौर पर टूरिस्ट ब्रोशर में नहीं मिलती.
कहानी शुरू होती है 4 सितंबर से. जगह थी जयपुर. कार्टिस्ट की 'Stories of Indian Cities' पहल के राजस्थान चैप्टर की शुरुआत यहीं से हुई. इसके बाद Art Car राजस्थान की सड़कों पर निकल पड़ी.
जयपुर से निकली कार, राजस्थान के कई रंग समेटती चली गई
सफर मंडावा से शुरू होकर बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर और बाड़मेर तक पहुंचा. फिर टीम जवाई, रणकपुर, नाथद्वारा, उदयपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, बूंदी और कोटा गई. इसके बाद भरतपुर, डीग और अलवर तक पहुंची. नामों की यह लंबी लिस्ट सिर्फ जगहों की लिस्ट नहीं है. हर जगह के साथ एक अलग कहानी जुड़ी है.
कहीं लोककला मिली, कहीं हस्तशिल्प. कहीं गांव के लोगों का रोजमर्रा का जीवन कैमरे में आया, तो कहीं ऐसा पारंपरिक काम दिखा जो परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा है. यानी इस सफर में सवाल यह नहीं था कि यहां घूमने के लिए क्या है? सवाल यह था कि यहां रहने वाले लोगों की कहानी क्या है?
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राजस्थान के बांसवाड़ा के आदिवासी इलाके में टीम खेमराज और उनके परिवार तक पहुंची. यहां राजस्थान का एक अलग चेहरा दिखाई देता है. वह चेहरा जो किसी किले की दीवार पर नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी में बसा है. इसी तरह बाड़मेर के दूरदराज के इलाके में पैचवर्क और स्थानीय कढ़ाई से जुड़े कानाराम जी की कहानी रिकॉर्ड की गई.
इन कहानियों में एक चीज कॉमन है. हुनर... ऐसा हुनर जो किसी ऑनलाइन कोर्स से नहीं सीखा गया. जिसे किताब में पढ़कर नहीं, बल्कि घर के बड़े-बुजुर्गों को देखकर सीखा गया. हाथों से हाथों तक पहुंचता रहा और आज भी लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है.
राजस्थान को समझना है तो उसकी रसोई में भी जाना पड़ेगा
इस सफर में सिर्फ लोगों और उनके काम को नहीं देखा गया. राजस्थान के खाने को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया. अलग-अलग इलाकों के पारंपरिक व्यंजन रिकॉर्ड किए गए. उन्हें बनाने के तरीके समझे गए और यह जानने की कोशिश की गई कि किसी इलाके का खाना वहां की संस्कृति से कैसे जुड़ा है. क्योंकि किसी जगह को समझने का एक रास्ता उसकी गलियों से होकर जाता है, तो दूसरा उसकी रसोई से. और राजस्थान में तो खाने की कहानी भी अपने आप में काफी लंबी है.
राजस्थान का इतिहास राजघरानों के बिना पूरा नहीं होता. इसलिए टीम ने अलग-अलग राजघरानों के सदस्यों से भी बातचीत की. एक तरफ वे लोग थे जिनकी जिंदगी में राजस्थान की रियासती विरासत आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद है. दूसरी तरफ वे गांव और कस्बे थे जहां स्थानीय कारीगर अपने पुराने हुनर को बचाए हुए हैं. इस सफर में दोनों तस्वीरें एक साथ सामने आईं.
एक राजस्थान वह है जिसे दुनिया पर्यटन के जरिए जानती है. दूसरा राजस्थान वह है जिसे वहां रहने वाले लोग रोज जीते हैं. और Art Car ने इसी दूसरे राजस्थान को पकड़ने की कोशिश की.
अब बात उस कार की, जो खुद इस कहानी का हिस्सा बन गई. इसे अंदर और बाहर से राजस्थानी रंग-रूप दिया गया है. कार के अंदर पिंक इंटीरियर तैयार किया गया है. इसमें बांसवाड़ा का पारंपरिक पैचवर्क और एप्लीक वर्क इस्तेमाल किया गया है. बाहर कार का रंग ब्लू है. उस पर राजस्थानी कठपुतलियां लगाई गई हैं. मतलब कार के अंदर जयपुर की गुलाबी पहचान और बाहर जोधपुर के 'सिटी ऑफ ब्लू' की झलक. यह कार जहां से गुजरती है, वहां सिर्फ एक वाहन नहीं गुजरता. अपने साथ राजस्थान के कई रंग लेकर चलती है.
अब राजस्थान खत्म, लेकिन सफर नहीं
जयपुर में राजस्थान चैप्टर पूरा हो चुका है. लेकिन Art Car का सफर अभी बाकी है. अब यह दिल्ली और गुजरात की तरफ जाएगी. इसके बाद देश के दूसरे राज्यों और शहरों में पहुंचने का प्लान है. वहां भी कोशिश यही रहेगी कि सिर्फ मशहूर जगहों की तस्वीरें न जुटाई जाएं. बल्कि उन लोगों तक पहुंचा जाए जिनकी कहानियां अक्सर बड़ी खबरों के बीच दब जाती हैं. किसी शहर का वह कारीगर, जो 40 साल से एक ही काम कर रहा है. कोई ऐसा गांव, जिसकी अपनी अनोखी परंपरा है. कोई स्थानीय खाना, जिसे बनाने की विधि सिर्फ कुछ परिवार जानते हैं. या फिर कोई ऐसी कहानी, जिसे वहां के लोग जानते तो हैं, लेकिन बाहर की दुनिया उससे अनजान है.
कार्टिस्ट के संस्थापक हिमांशु जांगिड़ के मुताबिक, राजस्थान का यह सफर सिर्फ 3,500 किलोमीटर की दूरी तय करना नहीं था. यह लोगों के बीच जाने और उनके जीवन को करीब से समझने का अनुभव था. अब इस सफर में जुटाई गई कहानियों को तस्वीरों, वीडियो और डिजिटल स्टोरीटेलिंग के जरिए लोगों तक पहुंचाया जाएगा. तो राजस्थान की कहानी जयपुर में खत्म नहीं हुई है. बल्कि यहां से एक दूसरी यात्रा शुरू हुई है.
पहले Art Car ने राजस्थान की सड़कों पर दौड़कर किलों और महलों के पीछे छिपी कहानियां खोजीं. अब यही कार देश के दूसरे हिस्सों में जाएगी. हो सकता है अगली बार किसी दूसरे शहर की किसी छोटी सी गली में कोई ऐसा कारीगर मिले, जिसकी कहानी पूरे देश को सुनाई जानी चाहिए. या किसी गांव में कोई ऐसी परंपरा मिले, जिसके बारे में शहरों को कुछ पता ही न हो. फिलहाल इतना समझिए कि राजस्थान सिर्फ वो नहीं है जो तस्वीरों में दिखता है. राजस्थान वो भी है जो गांवों में सांस लेता है, कारीगरों के हाथों में पलता है, रसोई में पकता है और पीढ़ियों से एक कहानी की तरह आगे बढ़ता है.
रिदम जैन