इतिहास ने मेहरबानी तो की, लेकिन फैसला देखने के लिए दुनिया में नहीं रहे मनमोहन सिंह

मनमोहन सिंह के लिए यह फैसला बहुत देर से आया. राजनीति आमतौर पर कानून की तुलना में बहुत तेज चलती है और जनता की राय शायद ही कभी किसी जज के फैसले का इंतजार करती है.

Advertisement
11 साल बाद मिटा 'कोलगेट' का दाग (Photo-ITG) 11 साल बाद मिटा 'कोलगेट' का दाग (Photo-ITG)

अजमल अब्बास

  • नई दिल्ली,
  • 30 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:46 PM IST

सालों तक कोयला आवंटन विवाद ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली दूसरी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार की पहचान तय की थी. 'कोलगेट' (Coalgate) एक ऐसी सरकार के लिए संक्षिप्त नाम बन गया, जिस पर बेकाबू भ्रष्टाचार और नीतिगत अपंगता का आरोप था. इन आरोपों ने अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को हवा दी, संसद को ठप कर दिया और टीवी बहसों पर छा गए. इसने UPA की विश्वसनीयता को धीरे-धीरे खत्म कर दिया. आखिरकार, इसी ने 2014 के आम चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत का मार्ग प्रशस्त किया. 

Advertisement

उस पूरे राजनीतिक बवंडर के बीच में मनमोहन सिंह खड़े थे, जो खुद इन सबमें नहीं पड़ना चाहते थे. उन्हें हमेशा एक ईमानदार और पढ़े-लिखे इंसान के रूप में जाना जाता था, लेकिन 2011 से 2014 के साल उनके लिए बहुत मुश्किल भरे रहे. मनमोहन सिंह वही बड़े अर्थशास्त्री थे जिन्होंने 1991 के बड़े आर्थिक संकट से भारत को निकाला था और देश की अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाया था. लेकिन अचानक, उन्हें एक ऐसी सरकार के मुख्य चेहरे के रूप में देखा जाने लगा जो घोटालों से घिरी हुई थी.

उनके शांत स्वभाव के कारण उन्हें "मौनमोहन सिंह" का तंज भरा उपनाम मिला. विपक्ष ने उन्हें एक ऐसे कमजोर नेता के रूप में चित्रित किया जो अपने मंत्रिमंडल को नियंत्रित करने में या तो असमर्थ थे या अनिच्छुक थे. यद्यपि किसी ने भी उन पर व्यक्तिगत रूप से कोयला आवंटन से लाभ कमाने का आरोप नहीं लगाया था, फिर भी इस विवाद ने उनकी छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया. इसने अस्थायी रूप से एक व्यापक रूप से सम्मानित राजनेता को सरकारी विफलता के प्रतीक में बदल दिया.

Advertisement

लंबे समय के बाद आया फैसला 

बुधवार को उनके निधन के लगभग दो साल बाद, सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार उस लंबे अध्याय का अंत कर दिया. अदालत ने तालाबीरा-द्वितीय कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया. इसने 2015 के एक विशेष सीबीआई अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सिंह को आरोपी के रूप में समन भेजा गया था, और उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद कर दिया. यह फैसला पूर्व प्रधानमंत्री को उसी मामले में निर्दोष साबित करता है जिसने राजनीति में उनके अंतिम वर्षों को धूमिल कर दिया था.

सिंह के लिए, यह वह न्यायिक पुष्टि थी जिसका उन्होंने इंतजार किया, लेकिन इसे देखने के लिए वे जीवित नहीं रहे.

यह मामला ओडिशा के तालाबीरा-द्वितीय कोयला ब्लॉक के 2005 में हिंडाल्को इंडस्ट्रीज (Hindalco Industries) को किए गए आवंटन से जुड़ा था. उस समय कोयला मंत्रालय का प्रभार मनमोहन सिंह के पास ही था. जांच के बाद सीबीआई को मुकदमा चलाने लायक कोई सबूत नहीं मिला. लेकिन मार्च 2015 में (जब दिल्ली में सरकार बदल चुकी थी) एक विशेष सीबीआई अदालत ने एजेंसी की रिपोर्ट को खारिज कर दिया. 

यह भी पढ़ें: कोल ब्लॉक आवंटन: पूर्व PM मनमोहन सिंह के खिलाफ जारी समन को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

Advertisement

यह आदेश अपने आप में अनोखा था. इससे पहले कभी भी किसी पूर्व प्रधानमंत्री को पद पर रहते हुए लिए गए फैसलों के आधार पर भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी के रूप में अदालत नहीं बुलाया गया था. मनमोहन सिंह ने तुरंत इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, उन्होंने तर्क दिया कि कोई आपराधिक मंशा नहीं थी, कोई लेन-देन नहीं हुआ था और उन पर मुकदमा चलाने का कोई कानूनी आधार ही नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2015 में मामले की कार्यवाही पर रोक लगा दी, जिससे यह मामला 11 साल तक अधर में लटका रहा.

जब इस मामले पर आखिरकार सुनवाई हुई, तब तक 26 दिसंबर 2024 को मनमोहन सिंह का निधन हो चुका था. आमतौर पर, उनके निधन के बाद यह याचिका बेअसर हो जाती, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की वास्तविक योग्यता की जांच करने का फैसला किया. अदालत ने माना कि निचली अदालत के आदेश ने उनकी विरासत पर एक लंबा साया डाल दिया था.

प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सीबीआई की दोनों क्लोजर रिपोर्टों का अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने उन्हें खारिज करके गलती की थी. पीठ ने कहा, "जांच एजेंसी की रिपोर्ट को स्वीकार करने के संबंध में इस अदालत द्वारा तय मानकों को ध्यान में रखते हुए, हम आश्वस्त हैं कि जज साहब के पास सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने और मामले पर संज्ञान लेने की कोई वजह नहीं थी." हालांकि यह फैसला एक अदालत कक्ष से आया, लेकिन इसका महत्व केवल तालाबीरा-द्वितीय मामले तक सीमित नहीं है.

Advertisement

यह मामला सिर्फ एक कोयला ब्लॉक तक सीमित नहीं था. यह विवाद UPA-II सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा तब बन गया, जब 2012 में कैग (CAG) की रिपोर्ट आई. रिपोर्ट में कहा गया कि बिना नीलामी के कोयला ब्लॉक आवंटित करने से निजी कंपनियों को भारी काल्पनिक फायदा हुआ है.

इस रिपोर्ट ने देश में एक बड़ा राजनीतिक भूचाल ला दिया, संसद ठप हो गई और बीजेपी ने सरकार पर तीखे हमले शुरू कर दिए. 'कोलगेट' (Coalgate) घोटाला भी 2G स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों (CWG) के घोटालों की तरह उस दौर के बड़े घोटालों में गिना जाने लगा. यह सब ऐसे समय में हुआ जब देश में अन्ना हजारे का 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन चरम पर था और जन-आक्रोश एक राष्ट्रव्यापी अभियान का रूप ले चुका था. उस माहौल में, इससे पहले कि अदालतें सबूतों की जांच कर पातीं, ये आरोप ही जनता के बीच सच मान लिए गए.

बीजेपी ने पूरा फायदा उठाया

UPA सरकार घोटालों के आरोपों और अपने बचाव के चक्रव्यूह में फंसकर रह गई और इसकी सबसे भारी राजनीतिक कीमत मनमोहन सिंह को चुकानी पड़ी, दशकों से उनकी गिनती देश के सबसे ईमानदार नेताओं में होती थी. उनके सबसे बड़े विरोधी भी उनकी ईमानदारी का लोहा मानते थे, लेकिन कोयला विवाद ने उनकी इसी बेदाग छवि पर सीधा हमला किया. हालांकि आरोप प्रशासनिक निर्णयों को लेकर थे न कि उनके निजी लालच पर, लेकिन उस दौर के शोर-शराबे में यह फर्क कहीं गायब हो गया. लोग उन्हें या तो भ्रष्टाचार में मूक-सहमति देने वाला मानने लगे या फिर एक ऐसा नेता जो इसे रोकने में पूरी तरह असमर्थ था.

Advertisement

बीजेपी ने इस छवि का पूरा फायदा उठाया, 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान, नरेंद्र मोदी ने कोयला विवाद का ज़िक्र कर-करके मनमोहन सिंह को एक लाचार और भ्रष्ट सरकार के चेहरे के रूप में पेश किया. "नीतिगत अपंगता"  UPA-II की पहचान बन गई और "मौन मोहन सिंह" का तंज भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित तंजों में से एक बन गया.

हालांकि, वर्षों बाद, अदालतों ने प्रशासनिक कमियों और वास्तविक आपराधिक मंशा के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखा खींचनी शुरू कर दी. 2017 के एक अलग कोयला आवंटन मामले में, विशेष सीबीआई न्यायाधीश भरत पराशर ने कहा था कि मनमोहन सिंह ने केवल स्क्रिनिंग कमेटी और मंत्रालय के अधिकारियों की सिफारिशों पर काम किया था, और उनके पास यह संदेह करने का कोई कारण नहीं था कि प्रक्रियाओं की अनदेखी की जा रही थी. यह शासन के एक बुनियादी सिद्धांत की याद दिलाता था. एक प्रधानमंत्री को फैसले लेते समय संस्थागत प्रक्रियाओं और आधिकारिक सलाह पर ही भरोसा करना पड़ता है.

लेकिन इन तार्किक निष्कर्षों की गूंज कुछ साल पहले की सनसनीखेज सुर्खियों के मुकाबले नाममात्र की ही रही.

'इतिहास मेरे प्रति अधिक दयालु रहेगा' शायद उन मुश्किल सालों के दौरान सिंह की मानसिकता को जनवरी 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में अपनी अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही गई उनकी बात से बेहतर कुछ भी बयां नहीं करता. "मैं ईमानदारी से यह मानता हूं कि समकालीन मीडिया या उस मामले में संसद में विपक्ष की तुलना में इतिहास मेरे प्रति अधिक दयालु रहेगा."

Advertisement

उस समय, लोगों ने इस टिप्पणी को एक घिरे हुए नेता के दर्द के रूप में खारिज कर दिया था, लेकिन आज, यह बात बिल्कुल अलग और गहरी महसूस होती है.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला UPA-II के राजनीतिक इतिहास को फिर से नहीं लिखता, और न ही यह भ्रष्टाचार के उन आरोपों के असर को जादू से मिटाता है जिसने 2011 से 2014 के बीच भारतीय राजनीति को पूरी तरह बदलकर रख दिया था. कांग्रेस को तब भी अपने इतिहास की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा था और मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल हमेशा उस उथल-पुथल भरे दौर से जुड़ा रहेगा.

लेकिन यह फैसला एक महत्वपूर्ण काम ज़रूर करता है: यह राजनीतिक नैरेटिव को वास्तविक कानूनी जिम्मेदारी से अलग करता है. सालों की जांच और न्यायिक समीक्षा के बाद, देश की सर्वोच्च अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि सिंह के खिलाफ आपराधिक मामला टिक ही नहीं पाया, जैसा कि अपेक्षित था, कांग्रेस ने तुरंत इसे अपनी जीत और बेगुनाही का सबूत बताया. महासचिव जयराम रमेश ने मनमोहन सिंह को जिस तरह निशाना बनाया गया था, उसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माफी की मांग की. पवन खेड़ा ने तर्क दिया कि 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन ने अनुचित रूप से एक ईमानदार व्यक्ति की छवि को खराब किया, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने इस फैसले को "उनकी सत्यनिष्ठा की जीत" करार दिया.

Advertisement

यह भी पढ़ें: 'तो मैं आत्महत्या कर लूंगा...', पूर्व CEC एसवाई कुरैशी से ऐसा क्यों बोले थे मनमोहन सिंह

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »