ये मर्जर है या मजाक? TMC सांसदों के NCPI में ‘विलय’ ने दल-बदल कानून को कर दिया बौना

तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने अपनी तरफ से बड़े ही सुरक्षित कदम बढ़ाए हैं, लेकिन संविधान और कानून के जानकार उनकी तरफ से अपनाई गई प्रक्रिया को पक्का नहीं मान रहे हैं. एक्सपर्ट की नजर में कई खामियां हैं, जो उनके रास्ते का रोड़ा साबित हो सकती हैं. और, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले भी यही कहते हैं.

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स्पीकर ओम बिरला को अपना पत्र सौंपते तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसद. (Photo: PTI) स्पीकर ओम बिरला को अपना पत्र सौंपते तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसद. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 16 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:34 PM IST

मुमकिन है तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों को नए रास्ते पर एक ठिकाना मिल गया हो. लेकिन, यह ठिकाना पश्चिम बंगाल में बनाए गए होल्डिंग सेंटर जैसा ही लगता है. त्रिपुरा की गुमनाम सी, रजिस्टर्ड लेकिन गैर मान्यता प्राप्त पार्टी NCPI (नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया) को कुछ कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए ही इस्तेमाल किया गया है. करीब करीब वैसे ही जैसे कारोबार में शेल कंपनियों की मदद ली जाती है.

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कुछ शेल कंपनियां तो देर सवेर मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों की जद में भी आ जाती हैं - क्या मर्जर का यह मामला भी वैसा ही होने जा रहा है. संविधान और कानून के जानकार टीएमसी सांसदों के NCPI में ‘विलय’ को गलत बता रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं. ऐसे सवाल सिर्फ अभिषेक मनु सिंघवी ही नहीं उठा रहे, बल्कि लोकसभा के महासचिव रह चुके पीडीटी आचार्य की राय भी कुछ वैसी ही है. 

साल 1985 में लाए गए 'दल-बदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) में समय समय पर जरूरत के मुताबिक संशोधन भी होते रहे हैं, और 2023 में शिवसेना के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी प्रासंगिक है. लेकिन, 2026 की कवायद में जिस तरीके से कानूनी खामियों का इस्तेमाल करने की कोशिश हुई है, अब तो नए प्रावधान भी जरूरी लगने लगे हैं. 

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TMC सांसदों के NCPI में ‘विलय’ पर सवाल

लोकसभा के पूर्व सेक्रेट्री जनरल पीडीटी आचार्य ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए TMC सांसदों के NCPI में ‘विलय’ पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने एक आर्टिकल में पीडीटी आचार्य ने लिखा है, 'यह समझना जरूरी है कि विलय राजनीतिक पार्टी का होता है, सांसदों या विधायकों का नहीं. वे सिर्फ सहमति जता सकते हैं. तृणमूल कांग्रेस के वे सांसद और विधायक, जिन्होंने पाला बदलने की तैयारी कर रखी है, उन्हें 2004 के डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह बनाम बिहार विधान परिषद के सभापति केस और सुभाष देसाई केस में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां पढ़नी चाहिए.'

पीडीटी आचार्य लिखते हैं, 'सुप्रीम कोर्ट ने दोनों मामलों में बहुत साफ कहा है कि 10वीं अनुसूची के पैरा-4 के तहत अयोग्यता से छूट पाने के लिए मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में विलय होना आवश्यक है. अगर कुछ सांसद या विधायक किसी दूसरे दल में जाकर शामिल हो जाते हैं, तो उसे विलय नहीं कहा जा सकता. वह सीधा और स्पष्ट रूप से दल-बदल (डिफेक्शन) है.'

पीडीटी आचार्य के मुताबिक, 'सुभाष देसाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, दसवीं अनुसूची का उद्देश्य दल-बदल जैसे संवैधानिक पाप को हतोत्साहित करना और उसके लिए सजा की व्यवस्था सुनिश्चित करना है.'(पैरा 128). इस कानून को जनप्रतिनिधियों की अवसरवादी राजनीतिक चालों और सिद्धांतहीन जोड़तोड़ का खिलौना बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती.

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मुद्दे की बात यह है कि ममता बनर्जी का साथ छोड़कर तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी सांसदों ने NCPI में शामिल हो जाने का ऐलान कर दिया है. बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर विलय का आधिकारिक पत्र भी सौंप दिया है. टीएमसी के बागी सांसदों का नेतृत्व कर रहीं काकोली घोष संसद में अलग बैठने की व्यवस्था किए जाने की भी मांग कर रही हैं. 

NCPI का अस्तित्व भी बड़ा ही दिलचस्प है. त्रिपुरा में सक्रिय NCPI का रजिस्टर्ड पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर इलाके में है. 2023 में रजिस्टर कराई गई NCPI का चुनाव निशान पेन की निब है. NCPI एक बार त्रिपुरा विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकी है. यह बात अलग है कि NCPI पर छप्पर फाड़ कृपा बरसने के बाद अब वह लोकसभा की पांचवीं और NDA की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है.

NCPI में तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के कथित विलय को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी की भी करीब करीब यही राय है. बागी सांसदों के बारे में अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है, विभाजन या विलय सबसे पहले संसद के बाहर राजनीतिक दल के स्तर पर होना चाहिए, ताकि दल बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचा जा सके. 

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सांसदों और विधायकों के अलग-अलग रास्ते 

दल-बदल विरोधी कानून के तहत बागी सांसद या विधायक अपनी मर्जी से कोई भी कदम नहीं उठा सकता. अगर ऐसा हुआ तो दल-बदल विरोधी कानून उसकी सदस्यता रद्द करवा सकता है. 1985 में यह कानून लाए जाने का मकसद ही यही था कि पैसे या पद के लालच में विधायकों-सांसदों के पाला बदलने की राजनीति को रोका जा सके.

1. अलग होने या 'विभाजन' का नियम खत्म: 2003 से पहले एक नियम था कि अगर किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायक अलग गुट बना लेते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. लेकिन 91वें संविधान संशोधन (2003) के जरिए इस 'विभाजन' वाले नियम को पूरी तरह खत्म कर दिया गया. मतलब, अब कोई भी गुट केवल अलग होने के नाम पर अपनी सदस्यता नहीं बचा सकता.

2. केवल विलय (Merger) को ही मंजूरी: मौजूदा कानून के मुताबिक, बागी विधायकों की सदस्यता तभी बच सकती है जब उनकी मूल राजनीतिक पार्टी किसी दूसरी पार्टी में 'विलय' कर ले. शर्त यह है कि सदन में मौजूद उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय के समर्थन में हों.

टीएमसी के पास मौजूदा लोकसभा में कुल 28 सांसद थे. दल-बदल कानून के तहत किसी भी कार्रवाई से बचने और दो-तिहाई का आंकड़ा पार करने के लिए कम से कम 20 सांसदों का एक साथ होना जरूरी था, वह तो पूरा हो गया. लेकिन, बागी सांसदों का गुट जो 'विलय' की बात कर रहा है, वह सवालों के कठघरे में खड़ा है.  

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अगर टीएमसी के बागी विधायकों की बात करें, तो बागी गुट के पास 58 विधायकों का समर्थन है, जो कानूनी रूप से दो-तिहाई के आंकड़े की शर्त पूरी करता है. लेकिन वे किसी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो रहे हैं, क्योंकि ऐसा करने के लिए संगठन के स्तर पर विलय की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए. टीएमसी की कमान ममता बनर्जी के हाथ में है, लिहाजा संभव नहीं है. यही वजह है कि बागी विधायक खुद को मूल पार्टी का हिस्सा बता रहे हैं - बगावत विधायकों ने भी की, और सांसदों ने भी लेकिन दोनों ने अलग-अलग रास्ते अख्तियार किए. 

बहुत कठिन है डगर...

यह जरूर है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र नाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे दी है, और काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में बागी सांसदों ने NCPI में 'विलय' का ऐलान कर दिया है - लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के कई बड़े फैसले हैं, जो बागियों की राह में रोड़ा बन सकते हैं. यह ठीक है कि कानूनी झंझटों से बचने के लिए खामियों का फायदा उठाते हुए 'विलय' का रास्ता अपनाया गया है, लेकिन जो कुछ भी हुआ है वह पक्का नहीं लगता. 

टीएमसी की तरफ से आधिकारिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को आधार बनाकर कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया गया है. टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के स्पीकर के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है. और, सांसदों के मामले में टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर किसी अलग गुट को मान्यता न देने का आग्रह किया है.

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टीएमसी सांसद सागरिका घोष और कीर्ति आजाद ने 10 जून को लिखा यह पत्र स्पीकर को सौंप भी दिया है. अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में कहा है, AITC (ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस) को एक ही राजनीतिक पार्टी माना जाए, जिसका प्रतिनिधित्व सदन में केवल उसके अधिकृत नेता और मुख्य सचेतक के माध्यम से हो, और एआईटीसी के किसी भी कथित अलग गुट या धड़े को कोई मान्यता, दर्जा या सुविधा न दिया जाए.

आइए नजर डालते हैं सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर, जो बागी सांसदों के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस के लिए मददगार साबित हो सकते हैं:

1. सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल (2023- शिवसेना विवाद): महाराष्ट्र के राजनैतिक संकट के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला दिया था. अदालत ने साफ किया था कि 'मूल राजनीतिक दल' और 'विधायक दल', दो अलग-अलग चीजें हैं. विधानसभा के भीतर बैठे विधायक खुद को पार्टी का मालिक नहीं समझ सकते. व्हिप (पार्टी का आधिकारिक निर्देश) जारी करने और फैसले लेने का असली अधिकार मूल राजनीतिक संगठन और उसके अध्यक्ष के पास ही रहता है. इस फैसले के आधार पर, टीएमसी नेतृत्व यह तर्क दे सकता है कि सांसदों का बहुमत होने के बावजूद वे पार्टी के आधिकारिक फैसले को नहीं बदल सकते.

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2. राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007): सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को यह अधिकार नहीं है कि वह मनमर्जी से किसी भी बागी गुट को सीधे 'विभाजन' या 'विलय' के आधार पर नई पार्टी या गुट के रूप में मान्यता दे दे. जब तक जमीनी स्तर पर मूल राजनीतिक पार्टी का फैसला नहीं होता, तब तक केवल विधायकों के दस्तखत कर देना कानूनी रूप से काफी नहीं है.

3. रवि नाइक बनाम भारत सरकार (1994): सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दल-बदल साबित करने के लिए किसी विधायक का लिखित इस्तीफा देना ही जरूरी नहीं है. अगर किसी विधायक की गतिविधियां अपनी ही पार्टी के आधिकारिक नेतृत्व और उसकी नीतियों के खिलाफ पाई जाती हैं, तो उसे भी 'स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना' माना जाएगा और उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है.

साल 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा स्पष्ट किया है कि दल-बदल कानून के तहत विधायकों का दो-तिहाई बहुमत केवल एक 'सत्यापन' (वेरिफिकेशन) का जरिया है. विलय तभी माना जाएगा जब मूल राजनैतिक संगठन भी उसके लिए राजी हो. हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने पूर्व में दो-तिहाई विधायकों के पाला बदलने को वैध माना था, लेकिन उन मामलों की अंतिम वैधता भी अब सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अधीन है.

जिस तरह से मौजूदा कानूनी खामियों का फायदा उठाया जा रहा है, विलय के नाम पर जो नए नए प्रयोग हो रहे हैं, मुमकिन है 2026 के नए प्रयोग के बाद नए कानूनी प्रावधान बनाने पड़ें. मसलन, कहीं भी किसी के भी साथ विलय नहीं हो सकेगा, विलय के लिए भी कुछ शर्तें लागू तो होंगी ही. 

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