जिनके पास नाराज़ होने का बहुत स्पष्ट कारण नहीं होता. जिनके पास कारणों की कमी भी नहीं पड़ती. सबकुछ ठीक और यथावत होने में जिन्हें कुछ गड़बड़ी की गंध आती है. सिद्धांततः अप्रसन्न. आपत्ति मंत्रालय के अनन्य पदाधिकारी. आयोजनों में होंठ सिकोड़कर चाय पीते प्राणी- जिसे फूफा कहा जाता है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के बाद इन दिनों राजनीतिक नामकरण में काबिज़ हैं. शताब्दी समारोह के दौरान श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्रों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि वह जब भी कोई नया काम शुरू करते हैं, कुछ लोग फूफा बनकर सवाल करने लगते हैं.
राजनीतिक भाषा में यह बेहद सुविधाजनक विभाजन है. इससे बहस का केंद्र बदल जाता है. हालांकि यही इस बयान की ताकत भी है और खतरा भी. ताकत इसलिए कि राजनीति में रूपक तथ्य से ज्यादा तेजी से यात्रा करते हैं. खतरा इसलिए कि लोकतंत्र में हर असहमति को फूफागिरी मान लेने का मोह पैदा हो सकता है. जटिल बहस को एक घरेलू चरित्र में बदल देने और आलोचक को खलनायक बनाने के बजाय हास्यास्पद बना देने का तरीका दिलचस्प है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान को सिर्फ़ रूपक की तरह देखने के बजाय राजनीतिक भाषा में आलोचक की जगह तय करने की कोशिश की तरह भी पढ़ा जाना चाहिए. मोदी ने इस चरित्र को विपक्ष के एक हिस्से से जोड़ दिया. यही इस बयान का असली अर्थ है. यानि आलोचना को दो हिस्सों में बांटने का मजेदार प्रयास. एक तरफ वे लोग जो देश को आगे ले जाना चाहते हैं. दूसरी तरफ वे फूफा जो हर नई पहल में खोट खोजते हैं. इस बयान के आगे, पीएम मोदी ने जिस फूफा का जिक्र नहीं किया उसपर भी बात होनी चाहिए.
नब्बे के दशक का चर्चित नारा याद आ रहा. 'आडवाणी का कहना साफ. राम, रोटी और इंसाफ'. दरअसल बीजेपी के कुछ मूल वोटर इन दिनों फूफा की मुद्रा में हैं. और उनके फूफा होने के उनके कारण स्पष्ट हैं. जातिगत आरक्षण में बदलाव की मांग और UGC के इक्विटी नियम को केंद्र में रखकर बीजेपी के फूफा राम, रोटी के बाद अपने हिस्से का इंसाफ चाहते हैं. बीजेपी का मूल वोट बैंक फूफा हो चुका है, लेकिन फूफाओं की नाराज़गी की तरह इन मतदाताओं की नाराज़गी भी क्षणिक दिखाई पड़ रही है. घर में शादी हो और फूफा चाहे कितना नाराज़ हो, वह बारातियों के खेमे में कभी नहीं जाता. बस अपनी कुर्सी थोड़ा पीछे खिसका लेता है. खाना कम खाता है. चाय ज़्यादा पीता है. और जाते-जाते कहता है 'हम तो आए ही नहीं थे'.
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राजनीति में भी कुछ नाराज़गी ऐसी ही होती है. मतदान की तारीख़ आते-आते सिद्धांत जेब में चला जाता है और रिश्तेदारी बूथ तक साथ आती है. बीजेपी के इन मतदाताओं की स्थिति इसलिए दिलचस्प है कि उनकी शिकायत पार्टी से नहीं, पार्टी के अपने वादों से है. उन्हें लगता है कि जिस राजनीति के साथ वे इतने वर्षों से खड़े रहे, उसके लाभांश की बारी अब उनकी थी. मगर खाते में अभी तक केवल राष्ट्रवाद की रसीदें आईं. भावना का भुगतान भरपूर हुआ. प्रतिनिधित्व का हिसाब अभी बाकी है. फूफा की नाराज़गी में भी यही गणित होता है. वह शादी नहीं रोकना चाहता. चाहता है कि बारात में उसकी कुर्सी आयोजन के थोड़ा केंद्र में हो. यही फर्क नाराज़गी और विद्रोह के बीच की पूरी राजनीति है. यह फूफा का पुराना कौशल है. नाराज़ और निष्ठावान एक साथ हो जाना.
राजनीति में यह श्रेणी बहुत बड़ी है. सिर्फ भाजपा में नहीं. हर दल में. कांग्रेस का अपना फूफा है. समाजवादी पार्टी का अपना. क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने फूफा हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि सत्ता में आने के बाद हर पार्टी को लगता है कि उसके फूफा असल में विपक्ष के आदमी हैं. फूफा की सिर्फ अपेक्षाएं होती हैं. भले ही तर्कसंगत न हो. इसलिए उसकी नाराज़गी भी अजीब होती है. लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि फूफा मौजूद रहे. कभी-कभी परेशान करे. कभी बिलावजह. कभी पूर्वाग्रह से. कभी सचमुच जरूरी सवाल के साथ. उसकी मौजूदगी असुविधाजनक है. लेकिन अनुपस्थिति भी खलती है. इसलिए फूफा से छुटकारा लोकतंत्र का समाधान नहीं है. लोकतंत्र में फूफा का होना शुभ संकेत है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
अतुल तिवारी