धीमा पड़ता 'डबल इंजन', अपने ही गढ़ में कमजोर हुई भाजपा की चुनावी जमीन

'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे के आंकड़े बीजेपी के डबल इंजन मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. हालांकि पीएम नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत साख मजबूत बनी हुई है, लेकिन राज्यों के स्तर पर पार्टी की पकड़ ढीली पड़ रही है. हिंदी पट्टी और पारंपरिक गढ़ों में सीटों का नुकसान बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है, जिसकी भरपाई केवल एक बंगाल से संभव नहीं है.

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मूड ऑफ द नेशन के ताजा सर्वे में आए बहुत से आंकड़े भाजपा की चुनावी मशीन के लिए चिंताजनक हैं. मूड ऑफ द नेशन के ताजा सर्वे में आए बहुत से आंकड़े भाजपा की चुनावी मशीन के लिए चिंताजनक हैं.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 28 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 9:16 AM IST

'डबल इंजन' के जिस नारे को बीजेपी अपनी सबसे बड़ी ढाल और जीत का पक्का फॉर्मूला मानती रही है, उसकी परतें अब उधड़ने लगी हैं. केंद्र की सत्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा आज भी विरोधियों पर भारी पड़ता दिख रहा है, लेकिन राज्यों के धरातल पर पार्टी का दूसरा इंजन पूरी तरह हांफ रहा है. इंडिया टुडे और सी-वोटर का ताजा 'मूड ऑफ द नेशन' (MOTN) अगस्त 2026 सर्वे राजनीतिक विश्लेषकों की आंखें खोल देने वाले नतीजे लेकर आया है. आंकड़े चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि जिन राज्यों में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का परचम फहराया था, वहां महज दो साल के भीतर पार्टी का जनाधार अप्रत्याशित रूप से खिसक चुका है.

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2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रहने वाली भाजपा ने अपने आपको संभाला और फिर हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जबर्दस्त जीत हांसिल की. विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि का सहारा लेकर जिस ‘डबल इंजन’ को जनता ने समर्थन दिया, अब वही समर्थन कमजोर पड़ता दिख रहा है.

आज देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो जाए, तो सर्वे के आंकड़े एनडीए को 326 सीटें और 45.1 प्रतिशत वोट शेयर देते हैं, जबकि विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन को 185 सीटें और 39.1 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है. केवल बीजेपी के आंकड़े देखें तो पार्टी 261 सीटों और 39.0 प्रतिशत वोट शेयर के साथ संसद की सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी और 2024 के 240 सीटों के मुकाबले 21 सीटें ज्यादा हासिल करेगी. लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला और बीजेपी के सिपहसालारों की नींद उड़ाने वाला है. इसी साल जनवरी 2026 के सर्वे में बीजेपी अपने दम पर 287 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त 2026 में घटकर 261 पर आ गई है. यानी बीते महज छह महीनों के भीतर बीजेपी की झोली से 26 सीटें खिसक चुकी हैं, जो यह साबित करता है कि राज्यों में जनता का मिजाज बहुत तेजी से बदल रहा है और डबल इंजन का पहिया थमने लगा है.

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मध्य प्रदेश और ओडिशा: जहां बीजेपी के सबसे मजबूत किले ढह रहे हैं

सबसे ज्यादा आंखें खोल देने वाले आंकड़े उन राज्यों से आए हैं जिन्हें बीजेपी का अभेद्य गढ़ और जीत की गारंटी माना जाता था. मध्यप्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने 29 की 29 सीटें जीतकर इतिहास रचा था और विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर दिया था. मगर अगस्त 2026 का सर्वे बताता है कि मध्यप्रदेश में बीजेपी की झोली से सीधे 8 सीटें गायब हो चुकी हैं और पार्टी महज 21 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है. जनवरी 2026 के सर्वे में भी जहां पार्टी 26 सीटों पर थी, वहां छह महीने में ही 5 सीटें और कम हो गईं. पार्टी का वोट शेयर 2024 के 59.27 प्रतिशत से सीधा गिरकर 51.3 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि बीते चुनाव में शून्य पर लटकी कांग्रेस अब 8 सीटें झटकती दिख रही है और उसका वोट शेयर 32.44 प्रतिशत से उछलकर 43.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा है.

ओडिशा का सच तो और भी ज्यादा कड़वा है. जिस ओडिशा में 2024 के चुनाव में बीजेपी ने 21 में से 20 सीटें जीतकर नवीन पटनायक के दशकों पुराने साम्राज्य को ढहा दिया था, वहीं अब बीजेपी की साख दांव पर लगी है. सर्वे के अनुसार ओडिशा में बीजेपी की सीटें घटकर सिर्फ 12 रह सकती हैं, यानी पार्टी को 8 सीटों का सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है. जनवरी 2026 के 17 सीटों के अनुमान से तुलना करें तो भी छह महीने में पार्टी ने 5 सीटें गंवा दी हैं और उसका वोट शेयर 45.34 प्रतिशत से घटकर 43.0 प्रतिशत पर सिमट गया है.

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हिंदी पट्टी में सुलगता असंतोष और कमजोर पड़ते राज्य

बीजेपी की राजनीति की रीढ़ मानी जाने वाली हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में भी हालात बेहद चिंताजनक हैं. उत्तर प्रदेश में 2024 के चुनाव में बीजेपी 33 सीटों पर अटक गई थी. अगस्त 2026 के सर्वे में पार्टी को 34 सीटें मिलती दिख रही हैं, जो भले ही 2024 से 1 सीट ज्यादा हो, लेकिन छह महीने पहले की तस्वीर से तुलना करने पर पैरों तले जमीन खिसक जाती है. जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी 44 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त आते-आते सीधे 10 सीटें घटकर 34 पर आ चुकी हैं और एनडीए का वोट शेयर 43.69 प्रतिशत से गिरकर 41.7 प्रतिशत हो गया है.

छत्तीसगढ़ की बात करें तो 2024 में 11 में से 10 सीटें हासिल करने वाली बीजेपी अब सिर्फ 7 सीटों पर सिमटती दिख रही है, यानी 3 सीटों की सीधी चपत लग रही है, जबकि कांग्रेस 1 सीट से बढ़कर 4 सीटों पर कब्जा जमाती नजर आ रही है. उत्तराखंड में सभी 5 सीटों पर काबिज बीजेपी को 1 सीट का नुकसान होकर 4 सीटें मिलने का अनुमान है. वहीं राजस्थान में बीजेपी 16 सीटों पर दिखाई दे रही है, जो 2024 की 14 सीटों से 2 ज्यादा जरूर है, लेकिन जनवरी 2026 के 18 सीटों के आंकड़े से 2 सीटें कम हो चुकी है.

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पश्चिम बंगाल की लहर का छलावा

देश भर में खिसकती जमीन के बीच पश्चिम बंगाल ही अकेला ऐसा राज्य बनकर उभरा है जहां बीजेपी के लिए चमत्कारिक आंकड़े सामने आए हैं. 2024 के चुनाव में जहां बीजेपी बंगाल की 42 सीटों में से सिर्फ 12 सीटें जीत पाई थी, वहीं अगस्त 2026 का सर्वे अनुमान लगा रहा है कि बीजेपी राज्य में 35 सीटें जीतकर तख्तापलट कर सकती है, यानी सीधे 23 सीटों का बंपर फायदा. बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर 38.73 प्रतिशत से बढ़कर 46.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और 'इंडिया' गठबंधन का आंकड़ा 30 सीटों से गिरकर महज 7 सीटों पर सिमट रहा है.

लेकिन क्या बंगाल का यह उछाल बीजेपी को राहत दे सकता है? आंखें खोल देने वाली सचाई यह है कि केवल एक राज्य के दम पर पूरे देश की राजनीतिक गिरावट की भरपाई नहीं की जा सकती. अगर बंगाल में बीजेपी को 23 सीटों की बढ़त मिल भी जाता है, तो मध्यप्रदेश में 8 सीटें, ओडिशा में 8 सीटें, छत्तीसगढ़ में 3 सीटें और उत्तर प्रदेश में जनवरी के मुकाबले गंवाई गई 10 सीटें मिलकर उस पूरी बढ़त को डकार जाती हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य पार्टी का वैचारिक और संगठनात्मक आधार हैं. बंगाल में स्थानीय विरोध या सत्ता-विरोधी लहर के कारण अस्थायी फायदा मिल सकता है, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी के प्रति गहराता जनाक्रोश संगठन के बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ा खतरा है.

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'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे के ये आंकड़े साफ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि देश का मतदाता अब आंख मूंदकर 'डबल इंजन' के झांसे में आने को तैयार नहीं है. केंद्र में नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत प्रभाव आज भी कायम है और लोग राष्ट्रीय मुद्दों पर उन पर भरोसा कर रहे हैं, लेकिन राज्यों की बीजेपी सरकारों की नाकामी, स्थानीय बेरोजगारी, महंगाई और प्रशासनिक सुस्ती ने जनता का मोहभंग कर दिया है. एक ताकतवर इंजन पूरी ट्रेन को खींचने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन अगर राज्यों का दूसरा इंजन पूरी तरह खराब हो जाए, तो गाड़ी को पटरी से उतरने में वक्त नहीं लगता.

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