भारतीय राजनीति में इस समय एक दिलचस्प स्थिति दिखाई दे रही है. एक तरफ नरेंद्र मोदी सरकार कई मुद्दों पर विपक्ष के लगातार दबाव में नजर आ रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष के पास भी इस मौके को एक मजबूत राजनीतिक विकल्प में बदलने की वैसी तैयारी दिखाई नहीं दे रही, जैसी होनी चाहिए. यानी सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं, लेकिन विपक्ष की राह भी आसान नहीं हुई है.
बीते कुछ समय में ऐसे कई मुद्दे सामने आए हैं, जिन पर मोदी सरकार को सफाई देनी पड़ी है या राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा है. चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है. एसआईआर को लेकर भी राजनीतिक विवाद तेज हुआ है. चुनाव आयोग ने हाल में वोटर-रोल से जुड़े सॉफ्टवेयर की समीक्षा और कुछ प्रक्रियाओं में बदलाव की घोषणा की है. विपक्ष इसे लेकर अब भी सवाल उठा रहा है.
यह भी पहली बार नहीं है जब सरकार को किसी बड़े विवाद पर राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा हो. नीट और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विवाद, तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और दूसरे मुद्दों पर भी विपक्ष सरकार को घेरता रहा है, लेकिन यहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार कितनी कमजोर हुई है. असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष इस कमजोरी का राजनीतिक लाभ उठाने की स्थिति में है? फिलहाल इसका जवाब बहुत स्पष्ट नहीं है.
30 सितंबर की INDIA ब्लॉक की बैठक में विपक्षी एकता की तस्वीर पूरी तरह एकजुट नहीं दिखी. आम आदमी पार्टी और डीएमके ने बैठक से दूरी बनाई. AAP ने साफ कहा कि वह अब INDIA ब्लॉक का हिस्सा नहीं है, हालांकि उसने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की कार्रवाई का समर्थन किया. डीएमके ने भी खुद को मौजूदा विपक्षी गठबंधन से अलग बताया और कांग्रेस के साथ तमिलनाडु में राजनीतिक मतभेदों को इसकी वजह माना.
वहीं, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी को सीधे गठबंधन से दूरी के तौर पर देखना ठीक नहीं होगा. उनकी अनुपस्थिति की वजह उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के नामांकन से जुड़ी व्यस्तता बताई गई और बैठक में समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि मौजूद रहे. शिवसेना (यूबीटी) भी बैठक में शामिल थी और उद्धव ठाकरे वर्चुअल माध्यम से जुड़े.
यही INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी समस्या है. राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ लड़ाई और राज्यों में स्थानीय राजनीतिक हित- दोनों को एक साथ साधना आसान नहीं हो रहा है. कांग्रेस को जहां राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन का नेतृत्व चाहिए, वहीं क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखते हैं. ऐसे में एक मंच पर आना और वास्तव में एक रणनीति पर चलना, दोनों अलग-अलग बातें हो गई हैं.
ममता बनर्जी अभी भी विपक्षी एकता और INDIA गठबंधन की जरूरत की बात करती दिखाई देती हैं, लेकिन बंगाल में उनकी राजनीतिक स्थिति और दूसरे राज्यों में विपक्षी दलों की स्थिति को एक जैसा नहीं माना जा सकता. इसलिए केवल किसी बड़े नेता का गठबंधन के पक्ष में बोलना उस गठबंधन को जमीन पर मजबूत नहीं बनाता.
अखिलेश यादव की राजनीति भी इसका एक उदाहरण है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों दिखाई देते रहे हैं. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की ओर से कांग्रेस की ‘एकला चलो’ नीति पर सवाल उठना भी इसी व्यापक समस्या का हिस्सा है. इन घटनाओं से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विपक्ष के दल वास्तव में एक साझा राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं या फिर वे सिर्फ जरूरत के मुद्दों पर साथ आते हैं?
दूसरी तरफ मोदी सरकार और उसके सहयोगियों के बीच भी हर मुद्दे पर पूरी समानता नहीं दिखती. नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड का हालिया रुख इसका उदाहरण है. समान नागरिक संहिता को लेकर जेडीयू ने कहा कि वह प्रस्ताव के प्रावधानों को समझने के बाद अपनी स्थिति तय करेगी. पार्टी के नेताओं ने यह भी संकेत दिया कि किसी तरह की चिंता सामने आने पर केंद्र के सामने अपनी बात रखी जाएगी.
इससे यह साफ है कि गठबंधन की राजनीति में बीजेपी को भी अपने सहयोगियों को साथ लेकर चलना पड़ता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 240 सीटें मिली थीं, यानी अपने दम पर बहुमत के 272 के आंकड़े से वह नीचे रही. सरकार बनाने के लिए उसे एनडीए सहयोगियों के समर्थन की जरूरत पड़ी.
इसलिए आज की राजनीति को केवल ‘मोदी सरकार मजबूत है’ या ‘सरकार कमजोर है’ जैसे दो खानों में बांटना शायद सही नहीं होगा. असल तस्वीर इससे ज्यादा जटिल है. सरकार को कई मोर्चों पर सवालों का सामना करना पड़ रहा है और सहयोगी दल भी हर मुद्दे पर आंख बंद करके उसके साथ खड़े हों, यह जरूरी नहीं है. लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष के पास इन परिस्थितियों को एक स्थायी राजनीतिक चुनौती में बदलने के लिए जरूरी एकता भी अभी दिखाई नहीं देती. यही इस समय की भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है. सरकार के सामने मुश्किलें हैं, लेकिन विपक्ष उन मुश्किलों का विकल्प नहीं बन पा रहा.
अगर INDIA गठबंधन सिर्फ सरकार की आलोचना करने तक सीमित रहता है और अपने भीतर के मतभेदों को दूर नहीं करता, तो उसे राजनीतिक फायदा मिलने की संभावना सीमित रहेगी. विपक्ष के सामने असली चुनौती मोदी सरकार को घेरना भर नहीं है. उसे यह भी दिखाना होगा कि अलग-अलग विचारधारा और क्षेत्रीय हितों वाले दल किसी साझा मुद्दे पर लंबे समय तक साथ कैसे चल सकते हैं. और शायद यही आने वाले समय की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा होगी- मोदी सरकार की नहीं, बल्कि विपक्ष की भी.
लेखक: टीके श्रीवास्तव
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