जम्मू-कश्मीर के कठुआ में सीआईएसएफ शिविर की गोलीबारी कोई अकेली दुर्घटना नहीं है. एक परियोजना की सुरक्षा में तैनात एक हेड कांस्टेबल ने बहस के बाद साथियों पर गोलियां चला दीं. असिस्टेंट कमांडेंट अंकित कुमार पांडे, सब-इंस्पेक्टर लक्ष्मण सिंह, कांस्टेबल रफीक अहमद और संदीप कुमार मारे गए. आरोपी हिरासत में है. जांच पूरी होने तक मकसद पर अनुमान लगाना गलत होगा, पर घटना का स्वरूप एक मामले में साफ है. यह अपने ही बल के भीतर की हिंसा है. कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में तैनात एक पीएसी जवान का वीडियो वायरल हुआ था. उन्होंने बैरक को तबेले जैसा बताया, बिस्तर पर सांप आने, शौचालय स्वयं साफ करने, खराब खाने और बच्चे के जन्म पर छुट्टी न मिलने की बात कही. दोनों घटनाएं अलग-अलग बलों की हैं, पर दोनों एक ही प्रश्न उठाती हैं. हमारी रक्षा करने वाले कितना सुरक्षित हैं?
दरअसल यह सिलसिला नया नहीं है. चार अगस्त 2026 को असम के नगांव में सीआरपीएफ की 34वीं बटालियन के शिविर में एक सहायक उप-निरीक्षक ने दो साथियों को मार दिया, एक को घायल किया और फिर खुद को गोली मार ली. फरवरी 2025 में मणिपुर के एक शिविर में भी सीआरपीएफ जवान ने फायरिंग की थी. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2025 के बीच सहकर्मियों की गोलीबारी में करीब 40 जवान मारे गए. सीआरपीएफ में पिछले पंद्रह वर्षों में तीस ऐसी घटनाओं में चालीस जानें गईं हैं.
लोकसभा में 16 दिसंबर 2025 को सरकार ने बताया कि 2023 से 2025 तक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, असम राइफल्स और एनएसजी में 438 आत्महत्याएं और सात फ्रेट्रीसाइड हुए. 2020 से 2024 के पांच वर्षों में यह संख्या लगभग 730 बताई गई है. उसी अवधि में हजारों जवानों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली या इस्तीफा दिया. यानी कि कहीं न कहीं ये लोग भी अपनी नौकरी से खुश नहीं थे. जनवरी 2026 तक बलों में नब्बे हजार से अधिक पद रिक्त थे. ये आंकड़े व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, व्यवस्था की थकान दिखाते हैं.
सरकार स्वयं इस संकट को पहचान चुकी है. 2021 में गृह मंत्रालय ने आत्महत्या और फ्रेट्रीसाइड पर कार्यबल गठित किया. मसौदा रिपोर्ट में तीन बड़े कारण सामने आए. सेवा शर्तें, कार्य स्थितियां और व्यक्तिगत दबाव से जवान परेशान हैं. छुट्टी न मिलना खासकर परिवार में बीमारी या मृत्यु के समय जवान को तोड़ देता है. कार्यबल ने लिखा कि फ्रेट्रीसाइड में अपमान सबसे बड़ी उत्तेजना होता है. बुलीइंग, गाली-गलौज, उप-समूहों में भेदभाव, अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर और कमांडर से संवाद का अभाव भी दर्ज हुए. एक और चौंकाने वाला निष्कर्ष यह था कि करीब 80 प्रतिशत आत्महत्याएं छुट्टी से लौटने के बाद, प्रायः सात से पंद्रह दिनों के भीतर होती हैं. घर के अधूरे संकट और यूनिट की कठोर दिनचर्या का टकराव घातक सिद्ध होता है.
साथियों की हत्या का कोई औचित्य नहीं है. तनाव अपराध को माफ नहीं करता. पर राज्य केवल सजा देकर मुक्त नहीं हो सकता. अर्धसैनिक बलों से सेना जैसी कठोरता और पुलिस जैसी निरंतर उपलब्धता दोनों मांगी जाती है. सीमा, नक्सल क्षेत्र, चुनाव, हवाई अड्डे, बिजलीघर सब उन्हीं के सिर हैं. रिक्तियां बड़ी हैं, इसलिए जो मौजूद हैं उन पर बोझ बढ़ जाता है. पारिवारिक आवास की कमी के कारण जवान वर्षों तक अकेले रहते हैं. छुट्टी कागज पर बेहतर दिखती है, मैदान में मंजूरी अक्सर अधिकारियों की दया पर टिकी रहती है. बाराबंकी के जवान ने वही शिकायत की थी. विभाग का उत्तर आया कि वीडियो भ्रामक है. जांच होनी चाहिए. पर हर आवाज को अनुशासनहीनता मान लेना उसी संस्कृति का हिस्सा है, जिसमें शिकायत दबती है और दबाव भीतर फूटता है.
यहां दो अतियों से बचना होगा. एक अति यह कहना कि सारी व्यवस्था चरमरा गई. लाखों जवान कठिन परिस्थितियों में डटे हैं. दूसरी अति यह कहना कि वर्दी वाले को शिकायत का अधिकार नहीं. राष्ट्रभक्ति गंदे बैरक या परिवार से वर्षों की जुदाई का विकल्प नहीं है. साफ पानी, खाने योग्य भोजन, साफ शौचालय और बच्चे के जन्म पर छुट्टी विशेष कृपा नहीं, सामान्य अपेक्षा है. कार्यबल ने रिक्तियां भरने, पारदर्शी अवकाश प्रणाली, पदोन्नति के रास्ते और वरिष्ठों द्वारा गाली-गलौज बंद करने की सिफारिश की थी.मानसिक स्वास्थ्य जांच छुट्टी से लौटने पर हो, पर मदद मांगने से कैरेक्टर सर्टिफिकेट खराब न हो. थका और अपमानित जवान न सतर्क रहता है, न स्थिर रह सकता है.
कठुआ की जांच पूरी हो और दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड मिले. साथ ही सरकार को यह भी देखना चाहिए कि 2021 की कार्यबल रिपोर्ट के बाद भी नगांव और कठुआ जैसी घटनाएं क्यों दोहराई गईं. देश जवान से बलिदान मांगता है. जवान देश से सम्मान के साथ जीने योग्य सेवा-शर्तें मांगता है. दोनों मांगें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं. जब रक्षक स्वयं असुरक्षित महसूस करने लगे, तो सुरक्षा केवल बयानबाजी रह जाती है. वर्दी की शान परेड मैदान में नहीं, बैरक की गरिमा और शिविर के अनुशासन में तय होती है.
संयम श्रीवास्तव