राज्यों पर भारी रही केंद्रीय सत्ता

भारत में केंद्र मजबूत रहा है, लेकिन राज्यों के अधिकारों को लेकर टकराव का इतिहास भी लंबा है. सरकारिया आयोग से लेकर राज्यपाल विवादों तक, बहस हमेशा केंद्र-राज्य के संवैधानिक संतुलन पर रही है.

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केंद्र-राज्य रिश्तों का इतिहास (Photo: ITG) केंद्र-राज्य रिश्तों का इतिहास (Photo: ITG)

चंदन मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:47 AM IST

आज जब हम 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो यह सवाल हमारे सामने आता है कि बतौर देश हम किस मुकाम पर खड़े हैं? सत्ता के दो प्रमुख सेंटर-केंद्र और राज्यों के बीच का संबंध किस तरह का रहा है? मौजूदा स्थिति क्या है? अगर हम अमेरिकी प्रणाली की बात करें, तो भारतीय और अमेरिकी संघवाद में सबसे बड़ा अंतर केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलन का है. दोनों में सत्ता का बंटवारा केंद्र और राज्यों के बीच है, लेकिन दोनों की संवैधानिक संरचना और राजनीतिक व्यवहार में बड़ा अंतर है. हालांकि, भारतीय संघवाद को शुरू से ही मजबूत केंद्रीय झुकाव वाला माना गया है.

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उदाहरण के तौर पर हम देखें तो रक्षा, विदेश नीति, करेंसी और संचार जैसे विषय केंद्र के पास हैं. पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य जैसे कई अहम विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. इसके बावजूद भारतीय राजनीति में केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों, वित्तीय संसाधनों, राज्यपाल की भूमिका और अनुच्छेद 356 यानी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने के अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर टकराव का लंबा इतिहास रहा है.

इसी टकराव को समझने और दूर करने के मकसद से सरकारिया आयोग का गठन किया गया. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस आरएस सरकारिया की अगुआई में 1983 में इसे बनाया गया. केंद्र और राज्यों के बीच के संबंधों पर बने इस आयोग ने 1988 में अपनी रिपोर्ट दी. इसमें 247 सिफारिशें थीं. इसमें केंद्र को कमजोर करने के बजाय संविधान में मौजूद संघीय व्यवस्था को बेहतर तरीके से चलाने पर जोर दिया गया. खास तौर पर राज्यपाल की नियुक्ति और भूमिका, अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल, राज्यों से सलाह-मशविरा जैसे विषयों पर विस्तृत सुझाव दिए. आयोग का मानना था कि राज्यपाल का पद दलगत राजनीति से ऊपर रहना चाहिए. राज्यपाल के लिए ऐसे व्यक्ति को प्राथमिकता देने की बात कही गई, जो सक्रिय राजनीति से दूर हो और संबंधित राज्य की स्थानीय राजनीति में बहुत गहरे रूप से जुड़ा न हो.

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लेकिन, हाल के वर्षों में तमिलनाडु, केरल, पंजाब और कर्नाटक में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव के बड़े उदाहरण रहे हैं. तमिलनाडु में तत्कालीन राज्यपाल आरएन रवि और तब की डीएमके सरकार के बीच विधानसभा से पारित विधेयकों पर मंजूरी को लेकर लंबा विवाद चला. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मामले में राज्यपाल की ओर से 10 विधेयकों को दोबारा विधानसभा से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजने की कार्रवाई को कानूनन गलत ठहराया.

पंजाब में भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच विधेयकों को मंजूरी देने को लेकर टकराव सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. केरल में राज्य सरकार ने राज्यपाल की ओर से कई विधेयकों पर लंबे समय तक फैसला नहीं लेने का मुद्दा अदालत के सामने उठाया. 2024 में केरल सरकार ने दावा किया था कि राज्यपाल ने सात विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखने के बाद राष्ट्रपति के पास भेजा.
कर्नाटक में 2026 में विवाद का एक अलग रूप सामने आया. यहां राज्यपाल के अभिभाषण के उन हिस्सों को लेकर टकराव हुआ, जिनमें केंद्र सरकार की नीतियों और राज्यों की शिकायतों का जिक्र था. राज्यपाल ने राज्य सरकार के तैयार किए गए भाषण के 11 पैराग्राफ्स (जिनमें मनरेगा और केंद्र की नीतियों की आलोचना थी) को पढ़ने से मना कर दिया और केवल तीन लाइनें पढ़कर सदन से बाहर चले गए. राज्य सरकार और राजभवन के बीच इस बात पर मतभेद हुआ कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की ओर से तैयार अभिभाषण किस रूप में पढ़ना चाहिए. यह विवाद भी इस बड़े सवाल को सामने लाता है कि राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख हैं या केंद्र की राजनीतिक प्राथमिकताओं के प्रतिनिधि?

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हालांकि, केंद्र और राज्य के बीच टकराव का इतिहास सरकारिया आयोग से काफी पुराना है. केरल में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई पहली कम्युनिस्ट सरकार को केंद्र सरकार ने 31 जुलाई 1959 को संविधान के अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करके बर्खास्त कर दिया था. मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली इस सरकार को भारी विरोध और 'विमोचन समरम्' (मुक्ति संघर्ष) आंदोलन के बाद हटाया गया था.यह घटना लंबे समय तक इस बहस के केंद्र में रही कि क्या केंद्र को राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर किसी चुनी हुई राज्य सरकार को हटाने की शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए.

1977 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस शासित कई राज्यों की सरकारों को हटाया गया. 1980 में केंद्र में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद भी विपक्षी दलों की सरकारों वाले कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया. इन घटनाओं ने इस आरोप को बल दिया कि केंद्र में बैठी सरकार कई बार राज्य सरकारों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह देखती रही है.

इसी विवाद ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एसआर बोम्मई मामले में अहम संवैधानिक सीमाएं तय करने की जमीन तैयार की. 1994 के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि किसी राज्य सरकार के बहुमत पर संदेह होने की स्थिति में विधानसभा के पटल पर शक्ति परीक्षण महत्वपूर्ण है. अदालत ने अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी रखा. इस फैसले ने केंद्र के लिए चुनी हुई राज्य सरकारों को मनमाने ढंग से हटाना कठिन बनाया.

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मजबूत केंद्र और स्वायत्त राज्य

केंद्र और राज्यों के बीच रिश्तों का दूसरा बड़ा पहलू वित्तीय संघवाद है. राज्यों की जिम्मेदारियां बड़ी हैं, लेकिन उनके पास राजस्व जुटाने के सीमित स्वतंत्र साधन हैं. टैक्स के बंटवारे, केंद्रीय मदद, जीएसटी मुआवजे और केंद्रीय योजनाओं में राज्यों की हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर समय-समय पर राज्यों की शिकायतें सामने आती रही हैं. दूसरी तरफ केंद्र का तर्क रहा है कि राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं और आर्थिक संतुलन के लिए मजबूत केंद्रीय समन्वय जरूरी है.

केंद्र-राज्य संबंधों पर बना आयोग

सरकारिया आयोग के बाद 2007 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में केंद्र-राज्य संबंधों पर एक और आयोग बनाया गया, ताकि भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था में हुए बदलावों को ध्यान में रखते हुए केंद्र-राज्य संबंधों के नए मुद्दों की जांच की जा सके. इसने भी बदलते राजनीतिक और प्रशासनिक हालात में सुधारों की जरूरत बताई. इससे साफ है कि केंद्र-राज्य रिश्तों की समस्या किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है. अलग-अलग दौर में अलग-अलग दलों ने केंद्र में सत्ता संभाली और अलग-अलग दलों ने राज्यों में विपक्ष की भूमिका निभाई. भारतीय संघवाद की असली ताकत इस बात में है कि केंद्र मजबूत हो, लेकिन राज्य कमजोर न हों. राज्य स्वायत्त हों, लेकिन राष्ट्रीय हितों से अलग न हों. इतिहास बताता है कि जब राजनीतिक सत्ता इस संतुलन को साधने के बजाय संस्थागत ताकत का इस्तेमाल राजनीतिक मुकाबले में करने लगती है, तब टकराव पैदा होता है. सरकारिया आयोग से लेकर एसआर बोम्मई और राज्यपाल-विधेयक विवादों तक की कहानी यही बताती है कि भारतीय संघवाद का सवाल केंद्र बनाम राज्य का नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक संतुलन का सवाल है.
 

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