जब आजाद हुआ भारत, तब लोकतंत्र पर क्यों था शक?

15 अगस्त 2026 को भारत आजादी के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. इन 79 वर्षों में भारत ने गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता से जूझते हुए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाई. लेकिन आजादी के 80वें वर्ष में असली सवाल यही है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत के लोकतंत्र को कितना स्वतंत्र, जवाबदेह, सहिष्णु और मजबूत बनाया जा सकता है?

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सत्ता बदली, सरकारें बदलीं और हर दौर में जनता ने अपनी ताकत दिखाई (Photo- AI) सत्ता बदली, सरकारें बदलीं और हर दौर में जनता ने अपनी ताकत दिखाई (Photo- AI)

टीके श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:32 AM IST

15 अगस्त 2026 को भारत अपनी आजादी के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक सफर को पीछे मुड़कर देखने और आगे की दिशा पर विचार करने का अवसर है.

1947 में जब भारत आजाद हुआ, तब देश के सामने गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता और भारी विविधता जैसी चुनौतियां थीं. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक था कि इतना बड़ा और विविध देश लोकतांत्रिक व्यवस्था को कितनी मजबूती से चला पाएगा. भारत ने समय के साथ इन आशंकाओं को काफी हद तक गलत साबित किया. संविधान, चुनाव और नागरिक भागीदारी ने लोकतंत्र को भारतीय जीवन का स्थायी हिस्सा बना दिया.

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भारत का लोकतंत्र किसी एक नेता या राजनीतिक दल की देन नहीं है. यह करोड़ों नागरिकों की भागीदारी से बना है. इसकी मूल धारणा यही है कि सत्ता का अंतिम स्रोत जनता हैं. 

आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ. इसके साथ ही हर नागरिक को बराबर अधिकार मिले. सबसे बड़ी बात यह थी कि हर वयस्क को वोट देने का अधिकार दिया गया, चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या नहीं. उस समय यह बहुत बड़ा और साहसिक कदम था.

1951-52 में भारत में पहला आम चुनाव हुआ. करोड़ों लोगों ने वोट दिया. दुनिया ने देखा कि एक नया देश भी लोकतांत्रिक तरीके से सरकार चुन सकता है. इसके बाद चुनाव भारत की पहचान बन गए.

भारत के लोकतंत्र की ताकत उसकी संवैधानिक संस्थाओं और स्वतंत्र सार्वजनिक विमर्श में है. संसद, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के साथ मीडिया और नागरिक समाज भी लोकतांत्रिक जवाबदेही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब सरकार से सवाल पूछे जा सकें और नागरिक न्याय के लिए अदालत जा सकें.

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लेकिन लोकतंत्र की कहानी सिर्फ उसकी उपलब्धियों की कहानी नहीं है. इसके रास्ते में ऐसे दौर भी आए जब लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर सवाल उठे. 1975 में आपातकाल लगाया गया. लोगों की आजादी सीमित हुई, राजनीतिक विरोध पर अंकुश लगा और प्रेस पर भी प्रतिबंध लगाए गए. यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक थी.

लेकिन लोकतंत्र की खूबी देखिए- जिस व्यवस्था पर उस समय चोट पहुंची, उसी व्यवस्था के रास्ते जनता ने अपना फैसला सुनाया. 1977 के चुनाव में सत्ता बदल गई. जनता ने बता दिया कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति किसी सरकार, नेता या पार्टी के पास नहीं, बल्कि मतदाता के पास होती है.

शायद यही भारतीय लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण चरित्र है. लोकतंत्र पर प्रहार हुआ तो लोकतंत्र ने ही जवाब दिया. लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिशें हुईं तो लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावों ने अपनी ताकत दिखाई.

आज भी भारतीय राजनीति में अक्सर यह सुनाई देता है कि लोकतंत्र खतरे में है, लोकतंत्र पर प्रहार हो रहा है या लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है. दिलचस्प यह है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों अपने-अपने समय और अपने-अपने संदर्भ में लोकतंत्र का हवाला देते हैं. एक पक्ष कहता है कि लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, दूसरा कहता है कि लोकतंत्र के माध्यम से उसका जवाब दिया जाएगा. कोई जनता के जनादेश को लोकतंत्र की ताकत बताता है, तो कोई विरोध और असहमति को लोकतंत्र की आत्मा.

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यह विरोधाभास दरअसल भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी से ज्यादा उसकी जीवंतता को दिखाता है. लोकतंत्र में हर पक्ष अपने लिए जनता का समर्थन मांगता है, अपने फैसलों को जनादेश से जोड़ता है और अपने विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार बताता है. यही कारण है कि लोकतंत्र किसी एक विचार, दल या व्यक्ति की संपत्ति नहीं बन सकता.

भारत में राज्यों का लोकतंत्र भी मजबूत हुआ है. अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें बनीं. लोगों ने अपनी पसंद से सरकारें चुनीं और बदलीं. इससे भारत की विविधता और मजबूत हुई.

1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक में गठबंधन की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र को नया रूप दिया. कई पार्टियां मिलकर सरकार बनाने लगीं और क्षेत्रीय दलों की भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ी. इससे यह साफ हुआ कि भारत की राजनीति किसी एक विचार या समूह के स्थायी नियंत्रण में नहीं रह सकती. सत्ता में विविधता आई और अलग-अलग क्षेत्रों की आवाजों को राष्ट्रीय राजनीति में जगह मिली.

पंचायती राज व्यवस्था ने लोकतंत्र को गांवों तक पहुंचाया. 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक आधार मिला. महिलाओं और कमजोर वर्गों की राजनीतिक भागीदारी भी बढ़ी. लोकतंत्र संसद से निकलकर स्थानीय संस्थाओं तक पहुंचा.

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है. यहां अलग-अलग भाषाएं, धर्म, संस्कृतियां और परंपराएं हैं. इसके बावजूद लोकतंत्र ने सभी को एक राजनीतिक ढांचे में जोड़े रखा है. असहमति के बावजूद साथ रहने और अपनी राजनीतिक पसंद के अनुसार सरकार चुनने की क्षमता भारत की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक उपलब्धियों में से एक है.

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लेकिन लोकतंत्र में कुछ समस्याएं भी हैं. चुनावों में पैसे और ताकत का गलत इस्तेमाल, जाति और धर्म के नाम पर राजनीति, राजनीति में बढ़ता ध्रुवीकरण और झूठी खबरें बड़ी चुनौतियां हैं. सोशल मीडिया ने नागरिकों को अपनी बात कहने की अभूतपूर्व ताकत दी है, लेकिन उसी के साथ गलत सूचना और दुष्प्रचार का खतरा भी बढ़ा है.

संसद में बहस की गुणवत्ता, संस्थाओं की स्वतंत्रता, मीडिया की भूमिका और राजनीतिक भाषा की मर्यादा पर भी समय-समय पर सवाल उठते हैं. इन सवालों को दबाना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता. बल्कि लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि इन सवालों पर खुलकर बहस हो.

क्योंकि लोकतंत्र की खास बात यह है कि इसमें आलोचना की आजादी होती है. सरकार से सवाल पूछे जा सकते हैं, विपक्ष विरोध कर सकता है, नागरिक प्रदर्शन कर सकते हैं और अदालतें सरकार के फैसलों की समीक्षा कर सकती हैं. लोकतंत्र की सुंदरता सहमति में नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद साथ चलने की क्षमता में है.

आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ यह नहीं कि यहां करोड़ों लोग मतदान करते हैं. बड़ी उपलब्धि यह है कि इतने बड़े और विविध देश में लगातार चुनाव होते रहे हैं और कई बार सत्ता बदली है. जनता ने सरकारें बनाईं भी हैं और हटाई भी हैं.

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भारत का लोकतंत्र एक लगातार चलने वाली बातचीत है- सरकार और जनता के बीच, सत्ता और विपक्ष के बीच, अधिकार और जिम्मेदारी के बीच और पुराने-नए विचारों के बीच.

आजादी के इतने साल बाद सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि लोकतंत्र कितना पुराना हो गया है, बल्कि यह है कि हम इसे और बेहतर कैसे बना सकते हैं. लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का नाम नहीं है. यह समानता, स्वतंत्रता, असहमति, जवाबदेही और नागरिक सम्मान का नाम है.

भारत ने पिछले 80 वर्षों में एक बात साबित की है- लोकतंत्र को चोट पहुंच सकती है, लोकतांत्रिक संस्थाएं संकट में पड़ सकती हैं, सत्ता का दुरुपयोग हो सकता है और राजनीतिक संघर्ष तीखा हो सकता है. लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह अपने भीतर सुधार और प्रतिरोध की गुंजाइश बनाए रखता है.

इसीलिए भारत के लोकतंत्र की कहानी किसी एक सरकार की कहानी नहीं है. यह उन करोड़ों नागरिकों की कहानी है जो हर चुनाव में अपने हाथ में एक छोटी-सी उंगली की स्याही लेकर सत्ता को याद दिलाते हैं कि सत्ता स्थायी नहीं है.

सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं, नेता बदलते हैं, राजनीतिक नारे बदलते हैं - लेकिन जनता का अधिकार बना रहता है.

यही भारत के लोकतंत्र की असली ताकत है. लोकतंत्र पर प्रहार का दावा करने वाला भी अंततः लोकतंत्र की ही शरण लेता है और लोकतंत्र के नाम पर जवाब देने वाला भी जनता के पास ही जाता है. शायद यही 80 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि है- भारत में लोकतंत्र इतना गहरा हो चुका है कि उसके विरोध की राजनीति भी अंततः उसी के भीतर जगह तलाशती है.

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और इसलिए आजादी के 80वें वर्ष में लोकतंत्र का उत्सव सिर्फ यह कहने का अवसर नहीं है कि हमने इसे बचाए रखा. यह खुद से यह पूछने का अवसर भी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम इसे कितना स्वतंत्र, जवाबदेह, सहिष्णु और मजबूत छोड़कर जाएंगे. 

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