हिंदुकुश हिमालय: पिघलती बर्फ और भविष्य की चुनौती

हिंदुकुश हिमालय में होने वाला पर्यावरणीय परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं है. यह पूरे दक्षिण एशिया की जल, खाद्य और पारिस्थितिक सुरक्षा का प्रश्न है. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक आकलन संकेत देते हैं कि एशिया में तापमान बढ़ने के साथ हिमनदों के पिघलने, बाढ़ और सूखे का जोखिम बढ़ रहा है.

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हिमनदों के सिकुड़ने से भविष्य में कृषि, जलविद्युत, पारिस्थितिकी और पर्वतीय समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है. (Photo: ITG) हिमनदों के सिकुड़ने से भविष्य में कृषि, जलविद्युत, पारिस्थितिकी और पर्वतीय समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है. (Photo: ITG)

डॉ सुशील द्विवेदी

  • नई दिल्ली,
  • 23 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:33 AM IST

हिंदुकुश हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत शृंखलाओं का विस्तार नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की जीवन रेखा है. अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान और म्यांमार तक फैला यह विशाल पर्वतीय क्षेत्र जल, कृषि, ऊर्जा, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है.

इस क्षेत्र से निकलने वाली प्रमुख नदी प्रणालियां मैदानों और डेल्टा क्षेत्रों तक जीवन पहुंचाती हैं. इसलिए हिंदुकुश हिमालय में होने वाला पर्यावरणीय परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की जल, खाद्य और पारिस्थितिक सुरक्षा का प्रश्न है.

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आज इस क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का दबाव पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है. बढ़ता तापमान, बदलती वर्षा, घटती बर्फ, तेजी से पीछे हटते हिमनद, पिघलता परमाफ़्रॉस्ट, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और हिमनदीय झीलों के विस्तार ने हिमालयी पारिस्थितिकी की स्थिरता को चुनौती दी है. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक आकलन भी संकेत देते हैं कि एशिया में तापमान वृद्धि के साथ हिमनद पिघलने, बाढ़ और सूखे का जोखिम बढ़ रहा है.

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने हिंदुकुश हिमालय में हिमनदों के पीछे हटने और बर्फ के आवरण में कमी को महत्वपूर्ण जलवायु जोखिमों में शामिल किया है. सबसे चिंताजनक संकेत हिमनदों और बर्फ में हो रहे बदलाव हैं.

मार्च 2026 में अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (इसिमोड) की नई रिपोर्टों ने बताया कि हिंदुकुश हिमालय के हिमनदों में बर्फ के नुकसान की दर वर्ष 2000 के बाद दोगुनी हो गई है. 1975 के बाद कुछ क्षेत्रों में हिमनदों की मोटाई में कुल 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है. यह आंकड़ा केवल वैज्ञानिक रिपोर्ट का विषय नहीं है, यह उन लगभग दो अरब लोगों के भविष्य से जुड़ा है जो हिमालय से निकलने वाली नदी प्रणालियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं.

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हिमनदों का तेजी से पिघलना प्रारंभिक तौर पर नदियों में अतिरिक्त पानी ला सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है. हिमनद प्राकृतिक जल-भंडार की तरह काम करते हैं, यदि उनका आकार लगातार घटता रहा तो भविष्य में गर्म और शुष्क मौसम के दौरान नदी प्रवाह को बनाए रखने की उनकी क्षमता कमजोर होगी.

आईपीसीसी के आकलन के अनुसार, उच्च पर्वतीय एशिया के हिमनदों का द्रव्यमान सदी के अंत तक उत्सर्जन की स्थिति के अनुसार बहुत बड़े स्तर तक घट सकता है. इसका अर्थ है कि आज दिखाई देने वाला अतिरिक्त पिघला पानी भविष्य में जल-संकट का संकेत बन सकता है. सिर्फ हिमनद ही नहीं, मौसमी बर्फ भी दक्षिण एशिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसिमोड की 2025 की स्नो अपडेट' रिपोर्ट के अनुसार हिंदुकुश हिमालय में लगातार तीसरे वर्ष सामान्य से कम बर्फ पड़ी और बर्फ की स्थायित्व अवधि 23 वर्षों के उपलब्ध रिकॉर्ड में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. 

इसके अगले वर्ष 2026 की रिपोर्ट में स्थिति और गंभीर बताई गई. बर्फ का आवरण दीर्घकालिक औसत से 27.8 प्रतिशत कम रहा और यह लगातार चौथा वर्ष था, जब मौसमी बर्फ सामान्य से नीचे रही. यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी बर्फ केवल पहाड़ों की शोभा नहीं है. इसिमोड के अनुसार, मौसमी बर्फ का पिघलना हिंदुकुश हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदी प्रणालियों के प्रवाह में महत्वपूर्ण योगदान देता है. कई बेसिनों में इसका योगदान लगभग 10 प्रतिशत से लेकर 30 प्रतिशत से अधिक तक हो सकता है. अतः बर्फ की मात्रा और उसके पिघलने के समय में बदलाव सीधे जल उपलब्धता के समय और स्थान को प्रभावित कर सकता है.

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इस बदलती जल-व्यवस्था का प्रभाव कृषि पर सबसे पहले और सबसे व्यापक रूप से पड़ सकता है. दक्षिण एशिया की बड़ी आबादी कृषि, पशुपालन और जल आधारित आजीविकाओं पर निर्भर है. सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता में मौसमी असंतुलन खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकता है. शहरों में पेयजल की मांग बढ़ रही है, जबकि पर्वतीय जलस्रोतों पर जलवायु परिवर्तन का दबाव बढ़ता जा रहा है. इसलिए हिमालय की रक्षा वास्तव में दक्षिण एशिया की खाद्य और जल सुरक्षा की रक्षा है. जलवायु संकट ने आपदाओं की प्रकृति को भी जटिल बनाया है.

तीव्र वर्षा, अचानक बाढ़, भूस्खलन और हिमनदीय झीलों के फटने से होने वाली बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) का खतरा पर्वतीय क्षेत्रों में गंभीर चिंता बन चुका है. इसिमोड  ने वर्ष 2026 में बताया कि हिमनद, बर्फ और परमाफ़्रॉस्ट में बदलाव के साथ ग्लोफ, भूस्खलन, मलबा प्रवाह और अन्य आपदाओं के जोखिम बढ़ रहे हैं.

नेपाल के रसुवा जिले की लांगटांग घाटी स्थित याला ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का स्पष्ट उदाहरण है, वैश्विक तापमान वृद्धि, बदलते हिमपात और वर्षण प्रतिरूपों के कारण इसका द्रव्यमान और विस्तार तेजी से घटा है. 

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इसिमोड के अनुसार, 1970 के दशक से याला ग्लेशियर लगभग 66 प्रतिशत क्षेत्रफल खो चुका है और इसका अग्रभाग करीब 784 मीटर पीछे हट चुका है. मई 2025 में इसे ‘मृत ग्लेशियर’ घोषित किया गया, ग्लेशियर का क्षरण हिमालयी क्रायोस्फियर और जल सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है.

हिमनदों के सिकुड़ने से भविष्य में कृषि, जलविद्युत, पारिस्थितिकी और पर्वतीय समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है, साथ ही हिमनदीय झीलों के विस्तार से  ग्लोफ  जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ता है, याला ग्लेशियर का तेजी से पिघलना स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य की नहीं, वर्तमान की चुनौती है. हिमालय की चुनौती केवल जलवायु परिवर्तन से पैदा नहीं हुई है. 

अनियोजित सड़क निर्माण, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, पर्यटन का दबाव, वनों का क्षरण और संवेदनशील ढलानों पर बढ़ता निर्माण भी जोखिम बढ़ा रहे हैं. विकास आवश्यक है, लेकिन हिमालय की भौगोलिक और पारिस्थितिक सीमाओं की अनदेखी करके किया गया विकास दीर्घकाल में आर्थिक लाभ के बजाय आपदा का कारण बन सकता है.

पहाड़ों की वहन क्षमता मैदानों से अलग होती है. इसलिए हर सड़क, सुरंग, भवन और परियोजना के लिए स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और पारिस्थितिक संवेदनशीलता का वैज्ञानिक आकलन अनिवार्य होना चाहिए.

जैव विविधता की दृष्टि से भी हिंदुकुश हिमालय असाधारण महत्व रखता है. हिम तेंदुआ, लाल पांडा, कस्तूरी मृग, हिमालयी मोनाल और असंख्य वनस्पतियां इस क्षेत्र की पारिस्थितिक संपदा हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण प्रजातियों के आवास ऊपर की ओर खिसक रहे हैं, जबकि मानवीय गतिविधियों से उनके प्राकृतिक आवास पहले ही खंडित हो रहे हैं.

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इसिमोड के वाटर, आइस, सोसायटी एंड इकोसिस्टम्स इन द हिंदूकुश हिमालय अर्थात आकलन ने हिमालयी क्रायोस्फीयर में परिवर्तन के साथ प्रजातियों की संख्या में कमी, ऊंचाई की ओर उनके स्थानांतरण, आवास की गुणवत्ता में गिरावट और बाहरी प्रजातियों के प्रसार जैसे प्रभावों को रेखांकित किया है.

हिमालय को केवल ग्लेशियरों (हिमनदों) के पिघलने तक सीमित करके देखना एक बड़ी भूल होगी, क्योंकि यहां यहां जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता और मानव समाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. हिमनदों का क्षरण जल-चक्र बदलता है. जल-चक्र में बदलाव कृषि और पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है. पारिस्थितिकी का क्षरण स्थानीय आजीविका पर असर डालता है और आजीविका का संकट पलायन और सामाजिक असुरक्षा को बढ़ा सकता है. 

यह एक जटिल श्रृंखला है, जिसके किसी एक हिस्से की अनदेखी पूरे तंत्र को कमजोर कर सकती है. वर्ष 2026 में इसिमोड द्वारा प्रस्तुत क्षेत्रीय क्रायोस्फीयर रणनीति एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावी कदम है. अब दक्षिण एशिया को आपदा के बाद राहत देने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर जोखिम को पहले पहचानने वाली व्यवस्था बनानी होगी.

उपग्रह निगरानी, स्वचालित मौसम केंद्र, हिमनदीय झीलों की निगरानी, आधुनिक जलमाप प्रणालियां और स्थानीय प्रारंभिक चेतावनी तंत्र इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं. तकनीक तभी प्रभावी होगी, जब उसका लाभ पर्वतीय गांवों तक पहुंचे और स्थानीय समुदायों को चेतावनी मिलने के बाद सुरक्षित कार्रवाई करने की क्षमता भी हो. 

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इसके साथ ही जल संरक्षण को विकास नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाना होगा. वर्षाजल संचयन, पारंपरिक झरनों और जलस्रोतों का पुनर्जीवन, छोटे जलाशयों का संरक्षण, जल-कुशल कृषि और स्थानीय जल प्रबंधन प्रणालियां हिमालयी समुदायों की जल सुरक्षा मजबूत कर सकती हैं. सदियों से पर्वतीय समाजों ने जल, जंगल और भूमि के उपयोग के अनेक स्थानीय तरीके विकसित किए हैं. इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और उपग्रह तकनीक के साथ जोड़ना भी निश्चय ही उपयोगी हो सकता है.

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न विकास की दिशा का है. सड़कें, पुल, जलविद्युत और पर्यटन जरूरी हैं, लेकिन उनका निर्माण हिमालय की पारिस्थितिक वहन क्षमता को ध्यान में रखकर होना चाहिए. संवेदनशील ढलानों पर निर्माण सीमित हो, आपदा-जोखिम मानचित्रों को विकास योजनाओं का आधार बनाया जाए और परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृति केवल औपचारिक प्रक्रिया न रहकर वैज्ञानिक निर्णय का माध्यम बने. हिमालय में ‘जितना संभव हो उतना निर्माण’ नहीं, बल्कि ‘जितना प्रकृति सह सके उतना निर्माण’ विकास का सिद्धांत होना चाहिए.

नागरिक समाज और विद्यालय भी इस बदलाव के महत्वपूर्ण भागीदार हो सकते हैं. पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय जलस्रोतों, जैव विविधता, जंगलों और जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष अध्ययन से जोड़ा जाना चाहिए. युवा पीढ़ी को जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन, टिकाऊ पर्यटन, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय पारिस्थितिकी के प्रति जिम्मेदार बनाया जाना आवश्यक है. 

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आज हिंदुकुश हिमालय मानवता को एक स्पष्ट चेतावनी दे रहा है. 2025 और 2026 के बर्फ संबंधी आंकड़े, हिमनदों के तेजी से घटते द्रव्यमान और बढ़ते पर्वतीय जोखिम बताते हैं कि संकट को भविष्य की समस्या मानकर टालना अब संभव नहीं है. इसिमोड के नवीनतम आकलन में हिमालयी क्रायोस्फीयर को दो अरब से अधिक लोगों की जल सुरक्षा से जोड़ते हुए तत्काल क्षेत्रीय सहयोग और वैज्ञानिक निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया गया है.

हिमालय को बचाने का अर्थ केवल पर्वतों, हिमनदों और वन्यजीवों को बचाना नहीं है. इसका अर्थ दक्षिण एशिया की नदियों, खेतों, शहरों, ऊर्जा व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों के भविष्य को सुरक्षित करना है. यदि हिमालयी जंगल स्वस्थ रहेंगे, तो जलस्रोतों की क्षमता मजबूत होगी. यदि बर्फ और हिमनद सुरक्षित रहेंगे, तो नदी प्रणालियों की दीर्घकालीन स्थिरता बेहतर होगी और यदि पर्वतीय पारिस्थितिकी संतुलित रहेगी, तो मैदानों की आबादी भी अधिक सुरक्षित रहेगी. अब समय है कि हिंदुकुश हिमालय को पर्यटन, जलविद्युत या रणनीतिक दृष्टि से आगे बढ़कर एक साझा और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा जाए.

जलवायु परिवर्तन वैश्विक समस्या है, लेकिन उसका समाधान स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर भी तलाशना होगा. दक्षिण एशिया के देशों को साझा वैज्ञानिक निगरानी, पारदर्शी जलवायु आंकड़े, सीमा-पार आपदा चेतावनी, जल सहयोग और प्रकृति-आधारित विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा.

हिमालय की बर्फ में केवल पानी नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की सभ्यता का भविष्य सुरक्षित है. उस बर्फ का पिघलना केवल एक पर्यावरणीय घटना नहीं; यह आने वाले जल, खाद्य और सामाजिक संकट का संकेत है. इसलिए हिमालय की रक्षा आज की पर्यावरणीय जिम्मेदारी भर नहीं, आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है. अब निर्णय का समय है- क्या विकास प्रकृति की सीमाओं के साथ चलेगा, या प्रकृति की सीमाओं को तोड़कर विकास स्वयं अपने भविष्य को संकट में डालेगा? हिंदुकुश हिमालय का उत्तर स्पष्ट है, विकास और पर्यावरण के बीच चुनाव नहीं, बल्कि दोनों के बीच विवेकपूर्ण संतुलन ही भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया के सुरक्षित भविष्य का रास्ता प्रशस्त करेगा.

(नोटः लेखक विज्ञान और पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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