सरकार ने साबित कर दिया कि वो सुन सकती है. साथ ही ये भी साबित कर दिया कि सुनने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है, और ये बात उस आम आदमी को चिंता में डाल देनी चाहिए जो पेट्रोल पंप पर खड़ा होकर सोच रहा है कि जो पेट्रोल वो पैसे देकर भरवा रहा है, उसमें असल में कितना पेट्रोल है.
शनिवार को केंद्र सरकार एक कॉकरोच के आगे घुटने टेक गई. कीड़ा नहीं, बल्कि वो प्रतीक. कॉकरोच जनता पार्टी की शुरूआत एक ‘तंज’ से हुई. जब चीफ जस्टिस ने (वैसे उन्होंने नहीं कहा था) बेचैन युवाओं को कीड़े-मकोड़े बताया, तो युवाओं ने उसे गाली मानकर अपना बिल्ला बना लिया. कुछ हफ्तों में दो महीने पुराना ये मजाक सत्ताधारी पार्टी से ज्यादा इंस्टाग्राम फॉलोअर्स वाला हो गया.
एक मीम आर्मी, जिसने लाठीचार्ज को रील बना दिया और आंसू गैस के बादल को कंटेंट. उन्होंने उसी सोशल मीडिया पर मोदी को मोदी से ज्यादा अच्छे से आउट-मोदी कर दिया, जिसे मोदी ने अपना ब्रांड बनाने के लिए इस्तेमाल किया था. उन्होंने शिक्षा मंत्री को डायपर भेजे ताकि उनके दिमाग के छेद बंद हो जाएं. उन्होंने इसे ‘इंस्टाग्रामिंग द रिवोल्यूशन’ कहा, और गलत भी नहीं कहा.
हफ्तों तक सरकार ने एक काम सबसे अच्छे से किया- कुछ नहीं किया. फिर 20 जुलाई को छात्र संसद की तरफ मार्च करने निकले, तो स्टेट ने ताकत का इस्तेमाल किया. शुक्रवार शाम को सरकारी ‘सूत्रों’ ने कसम खाई कि धर्मेंद्र प्रधान नहीं हटेंगे. शनिवार दोपहर तक वो जा चुके थे.
इसमें एक सबक है, और वो नीट के बारे में नहीं है. बहरी सरकार मजबूत नहीं होती. उसे बस अभी तक सुनने पर मजबूर नहीं किया गया था. लेकिन ध्यान दो- उसे सुनने पर किसने मजबूर किया? मुद्दे के जस्टिस ने नहीं, जो हफ्तों से वैसी का वैसा ही था. सिर्फ तादाद ने.
ये सरकार एकरूप है. ये नहीं देखती कि तुम सही हो या नहीं. ये देखती है कि तुम कितना टिक सकते हो और कितना नुकसान पहुंचा सकते हो. शाहीन बाग दिल्ली की सर्दी में बैठा रहा, तो पूरे देश में NRC की चर्चा ठंडे बस्ते में चली गई- अब सत्ता में कोई इसका जिक्र तक नहीं करता. किसान साल भर राजधानी के गेट पर डटे रहे, तो तीन कृषि कानून- जिनकी आर्थिक दलीलें इथेनॉल से विदेशी मुद्रा बचत वाले चार्ट जितनी ही भरोसेमंद थीं- प्रधानमंत्री के दुर्लभ माफी वाले भाषण के साथ वापस ले लिए गए. और जब सुप्रीम कोर्ट ने एक बार SC/ST अत्याचार कानून को तर्कसंगत ठहराया और उत्तर भारत में हिंसक बंद हो गया, तो सरकार ने लाइन नहीं संभाली. बल्कि जजों को ओवररूल करते हुए कानून को और भी सख्त बना दिया.
इन तीनों को साथ पढ़ो तो पैटर्न साफ है- डेसिबल तय करते हैं, मेरिट गया इथेनॉल लेने. सत्ता जो नजरअंदाज कर सकती है, कर देती है. जो डराने लगे, उसके आगे झुक जाती है. कमजोर और शांत लोगों को हवा में उड़ा देती है, जिद्दी और हिंसक लोगों के सामने- चाहे उनकी मांग कितनी भी बेतुकी हो- घुटने टेक देती है. ये क्लासिक गुंडागर्दी है. और अब हर नागरिक ने इसे पढ़ लिया है.
अब आते हैं सबसे शांत कतार पर- पेट्रोल पंप पर खड़े औसत बाइक और कार वाले पर
उसके पास कॉकरोच वाली चमक नहीं है. उसे नौकरी पर पहुंचना है, उसी गाड़ी से जिसकी वो चिंता कर रहा है. इसलिए वो एक महीना जंतर-मंतर पर डेरा नहीं डाल सकता. वो मेहनती भारतीय है- नौकरी वाला या खुद का काम करने वाला. जिसने पुरानी हैचबैक खरीदने के लिए पैसे जोड़े थे और अब शक कर रहा है कि वो ज्यादा पी रही है और कम चल रही है. उसके पास वायरल होने लायक फॉलोअर्स नहीं हैं. उसकी शिकायत सच्ची है. और सरकार के अपने खुलासे के मुताबिक, वो नजरअंदाज किया जाएगा- सिर्फ इसलिए क्योंकि वो शालीन और कामकाजी है.
बुरी बात ये कि जो थोड़ा-बहुत वो कह रहा है, उसे गडकरी-पूरी स्टाइल में जवाब मिल रहा है- आंकड़ा दे दो और उन्हें टेक्निकली अनपढ़ बता दो. महीनों से दोनों मंत्री सोशल मीडिया की शिकायतों पर इंटरव्यू और भाषण देकर जवाब दे रहे हैं- विदेशी मुद्रा बचत और किसानों की आय. हमेशा बात खत्म करने के लिए. एक नागरिक संवाद चाहता है, वो बार-बार कह रहा है कि खाना स्वादहीन लग रहा है लेकिन उसे न्यूट्रिशन लेबल पर लेक्चर दिया जा रहा है.
अब अजीब बात: आंकड़ों में सरकार सही है. भारत हर साल लाखों करोड़ का कच्चा तेल खरीदता है. इथेनॉल बढ़ते आयात बिल की समस्या का हल है. सरकार की अपनी फैक्टशीट के मुताबिक, ब्लेंडिंग से 2014-15 से अब तक 1.90 लाख करोड़ से ज्यादा विदेशी मुद्रा बची है और 310 लाख टन आयातित कच्चा तेल बचाया गया. किसानों के हाथ में 1.6 लाख करोड़ से ज्यादा रुपए गए- कैसे गए? हम नहीं जानते, लेकिन मान लेते हैं.
जब कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है, तब इथेनॉल महंगा पड़ता है. यानी उसका सस्ता होना कभी मकसद ही नहीं था. मकसद था एक मजबूत देश, जो टैंकर अटकने, कोई स्ट्रेट तनावपूर्ण होने या युद्ध करीब आने से कम प्रभावित हो. ये छोटी बात नहीं है, जिसे अपने गन्ने और अतिरिक्त अनाज से खरीदा जा रहा है.
मामला अच्छा है, कबूलनामा गायब है और अब पूरा खेल इसी कबूलनामे का है.
सरकार जो ईमानदार बात बार-बार टाल रही है, वो ये है: हम मंजिल पर पहले पहुंच गए, लेकिन तुम्हें बताया नहीं. 20 प्रतिशत का टारगेट पहले 2030 का था, फिर 2025 कर दिया गया, फिर 2023. हर बार इसे महत्वाकांक्षा की जीत बताया गया. नेता में महत्वाकांक्षा अच्छी है, लेकिन नीति में- जो आम आदमी की जिंदगी का ईंधन है- वो डरावनी हो जाती है.
E20 पर आराम से चलने वाली गाड़ियां असल में 2023 के आसपास बड़ी संख्या में आई हैं. उससे पहले की ज्यादातर गाड़ियां- जो ज्यादातर घरों के बाहर खड़ी हैं- पतले मिश्रण के लिए बनी थीं. उन्हें E20 पिलाओ तो माइलेज 6 से 12 प्रतिशत तक गिर जाता है, और समय के साथ पुराने गास्केट और होज़ नमी खींचने वाले फ्यूल से बिगड़ने लगते हैं. पेट्रोल पंप तैयार नहीं थे. बड़े शहरों के बाहर ईंधन में मिलावट एक बिजनेस था. अब उन मिलावटखोरों को बहाना मिल गया.
इथेनॉल पर तेजी से आगे बढ़ना ठीक था. लेकिन जहां सड़क न बिछी हो, वहां तेजी से बढ़ना ठीक नहीं था. देश जल्दबाजी वाली सरकार को माफ कर देता है. लेकिन उस सरकार को बर्दाश्त नहीं करता जो गड्ढों को नजरअंदाज करते हुए कहे कि ये बस तुम्हारी कल्पना है. देश ने पेपर लीक माफ कर दिए, लेकिन उसके नतीजे की मांग को खारिज करने का नतीजा आया. अब मंत्री चले गए और सुधार के उपाय तेजी से हो रहे हैं.
अगर ये मोड़ केमिस्ट्री से ज्यादा सपाट बातों का है. साफ-साफ बोल दो, बिना चाशनी के: हम जानबूझकर कर्व से आगे निकल गए क्योंकि एनर्जी सिक्योरिटी का गणित ये डिमांड करता था, और हम मानते हैं कि हमने पुराने इंजनों से E20 का बोझ उठवाया है, इससे पहले कि इस ब्लेंड के लायक गाड़ियों की पूरी फ्लीट तैयार हो जाती. फिर तीन काम करो जो इस कबूलनामे को प्लान में बदल दें.
पहला- अभी E20 पर ही रोक दो. 2030 तक E30 का टारगेट इंतजार कर सकता है. जब मरीज पिछली खुराक के साइड इफेक्ट से परेशान हो, तो डोज बढ़ाना ठीक नहीं.
दूसरा- पुरानी गाड़ियों के लिए E10 के विकल्प को वापस लाओ. ब्राजील में ड्राइवर खुद ब्लेंड चुनते हैं. अमेरिका में ड्राइवर खुद ब्लेंड चुनते हैं. पंप पर चुनाव देना नीति से पीछे हटना नहीं है. ये नीति है, लेकिन शिष्टाचार के साथ. क्योंकि बड़े लोग गाली-भरे नारे नहीं लगा सकते और अपमानजनक मीम नहीं बना सकते.
तीसरा- ऊंचे ब्लेंड का तभी वादा करो जब उसके लायक फ्लीट सचमुच तैयार हो, और इसे मील का पत्थर मानो, न कि उल्टी गिनती. गाड़ियों को फ्यूल के लायक होने दो, फ्यूल को रेस में आगे दौड़ाकर गाड़ियों को पीछे छोड़ो.
हर कारपेंटर के बक्से में एक औजार होता है- स्पिरिट लेवल. छोटी सी ट्यूब में लिक्विड होता है, जिसमें मौजूद बुलबुला सच्चाई बता देता है कि जो तुमने बनाया है, वो सीधा खड़ा है या झूठ पर टिका हुआ है. इथेनॉल कार्यक्रम एक अच्छी इमारत है, लेकिन टेढ़ी कहानी पर खड़ी है. बुलबुला बीच में नहीं है, और पेट्रोल पंप पर हर कोई इसे देख सकता है- चाहे सड़क परिवहन मंत्री सतह पर कुछ भी कहें और पेट्रोलियम मंत्री नीचे कुछ भी.
युवाओं ने अभी-अभी सरकार को सिखाया कि वो सुन सकती है, अगर शोर काफी तेज हो जाए. असली परीक्षा ये है कि क्या वो जायज बात सुन सकती है, इससे पहले कि नाजायज का डर उसे मजबूर कर दे. क्या उस शालीन आदमी को पहले चिल्लाना पड़ेगा, जिसके इंजन में अब खटखट होने लगी है या उससे भी कुछ बुरा, तभी सत्ता में बैठे लोग मुड़ेंगे?
देश सच पर बहुत दूर तक चलता है. लेकिन, वो एक भी किलोमीटर नहीं चलेगा यदि एक बार फिर उससे कहा जाए- 'ऑल इज वेल’.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
कमलेश सिंह