E20 पेट्रोल : सरकारी दावों में सच्चाई का माइलेज कम, बाजीगरी का धुआं ज्यादा

E20 पेट्रोल पर सरकार की सफाई जितनी बढ़ रही है, सवाल उतने गहरे होते जा रहे हैं. सरकार ही नहीं, भाजपा भी E20 पेट्रोल की गुणवत्ता के गुण गा रही है. लेकिन, इसके लिए वह जो आंकड़े दे रही है वे न सिर्फ गलत हैं, बल्कि गैर-जरूरी भी.

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E20 पेट्रोल को लेकर सरकार और भाजपा के दावे सरकारी आंकड़ों और दस्तावेजों से टकराकर चूर हो रहे हैं. E20 पेट्रोल को लेकर सरकार और भाजपा के दावे सरकारी आंकड़ों और दस्तावेजों से टकराकर चूर हो रहे हैं.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 31 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 12:10 PM IST

E20 पेट्रोल को लेकर सरकार और भारतीय जनता पार्टी जिस तेजी से सफाई दे रही हैं, उससे मामला शांत होने के बजाय और उलझता जा रहा है. पिछले दो दिनों में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और बीजेपी के आधिकारिक X हैंडल से लगातार पोस्ट करके लोगों को समझाने की कोशिश की गई कि E20 पेट्रोल न सिर्फ आपके वाहनों के लिए, बल्कि देश के लिए कितना फायदेमंद है. लेकिन जितने ज्यादा दावे सामने आए, उतने ही ज्यादा सवाल भी खड़े हो गए.

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सरकार और भाजपा की सोशल मीडिया पोस्ट में दो दावे सबसे अहम थे. पहला, E20 पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर. कहा गया कि E20 का ऑक्टेन नंबर 108.5 है, जबकि साधारण पेट्रोल का सिर्फ 84.4 है. और इससे आपके वाहन का परफॉर्मेंस बढ़ जाता है. दूसरा दावा यह था कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से अब तक 310 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का आयात बचा है, 1.90 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है और भारत वैश्विक तेल कीमतों के झटकों से बच रहा है.

पहली नजर में ये दावे काफी मजबूत लगते हैं. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सरकार के अपने दस्तावेज ही इन दावों की पूरी तस्वीर सामने रखते हैं. आंकड़े या तो गलत पेश किए गए हैं, या अधूरे और संदर्भों को हटाकर पेश किए गए हैं. कुल मिलाकर उन्हें जिस तरह पेश किया गया है, उससे लोगों के मन में एक अलग तस्वीर बनती है. 5 जुलाई 2026 को प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो द्वारा जारी किए गए आंकड़े सरकार और भाजपा दोनों के दावों का फैक्ट-चैक कर देते हैं. 

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पहला दावा: क्या सचमुच E20 का ऑक्टेन नंबर 108.5 है?

यहीं सबसे बड़ी चालाकी दिखाई देती है. सरकार और बीजेपी लगातार कह रही हैं कि E20 का ऑक्टेन नंबर 108.5 है. लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय के अपने FAQ में साफ लिखा है कि 108.5 रिसर्च ऑक्टेन नंबर (RON) शुद्ध इथेनॉल (E100) का है. उसी दस्तावेज में आगे यह भी लिखा है कि जब पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाया जाता है, तब तैयार होने वाले E20 पेट्रोल का ऑक्टेन करीब 95 RON होता है. मंत्रालय की यह प्रेस एजेंसी PIB ने जारी की थीः

यानी 108.5 और 95 दो अलग-अलग आंकड़े हैं.

108.5 उस इथेनॉल का है, जो अकेले इस्तेमाल नहीं होता. आम आदमी की गाड़ी में जो ईंधन जाता है, उसका ऑक्टेन करीब 95 होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कंज्यूमर E20 खरीद रहा है, तो उसे E20 का ऑक्टेन नंबर क्यों नहीं बताया जा रहा? उसकी जगह शुद्ध इथेनॉल का आंकड़ा क्यों दिखाया जा रहा है?

यहीं दूसरी बात भी ध्यान देने वाली है. सरकार 108.5 की तुलना 84.4 से कर रही है. लेकिन 84.4 भी वह पेट्रोल नहीं है, जो आज पेट्रोल पंप पर मिलता है. भारत में सामान्य पेट्रोल का ऑक्टेन पहले से करीब 91 RON है. यानी असली तुलना करीब 91 और 95 के बीच है, लेकिन पब्लिसिटी में 84.4 और 108.5 की तुलना दिखाई जा रही है. जाहिर है, इससे फर्क कहीं ज्यादा बड़ा दिखता है.

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यानी तकनीकी तौर पर आंकड़ा भी गलत है, और उससे जुड़े तथ्य भी. लेकिन तुलना इस तरह की गई कि E20 की तस्वीर वास्तविकता से कहीं ज्यादा चमकदार नजर आए.

क्या ज्यादा ऑक्टेन हर कार के लिए अच्छा होता है?

दुनिया भर की ऑटोमोबाइल एजेंसियां और कार कंपनियां कहती हैं कि अगर आपकी कार सामान्य पेट्रोल के लिए बनी है, तो ज्यादा ऑक्टेन वाला ईंधन डलवाने से न इंजन ज्यादा ताकतवर हो जाता है और न माइलेज में कोई बड़ा फर्क पड़ता है. ज्यादा ऑक्टेन का फायदा केवल उन इंजनों को मिलता है, जिन्हें उसी हिसाब से डिजाइन किया गया हो. यानी हाई-परफॉर्मेंस वाली कार. यानी केवल 108.5 जैसा बड़ा आंकड़ा देखकर यह मान लेना कि हर कार को उससे फायदा होगा, सही नहीं है.

दूसरा दावा: क्या इथेनॉल ब्लेंडिंग ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा बदल दी?

कहा जा रहा है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से अब तक 310 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का आयात बचा, 1.90 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची और भारत वैश्विक तेल कीमतों के झटकों से बच रहा है.

यहां भी सरकार के अपने दस्तावेज पूरी कहानी बताते हैं. सबसे पहले 310 लाख मीट्रिक टन वाले आंकड़े को समझिए. यह कोई ऐसा आंकड़ा नहीं है कि भारत ने वास्तव में उतना तेल आयात ही नहीं किया. यह एक अनुमान है. यानी जितनी मात्रा में पेट्रोल की जगह इथेनॉल इस्तेमाल हुआ, उतनी मात्रा के बराबर कच्चे तेल की जरूरत कम मान ली गई. यानी इसे वास्तविक आयात में दर्ज कमी नहीं कहा जा सकता.

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और ऐसा भी नहीं है कि यह बचत E20 पेट्रोल रोल-आऊट करने के बाद से हुई है. सरकारी दस्तावेज खुद कह रहा है कि यह बचत 2014-15 से अब तक के अनुमानित आंकड़े पर आधारित हैः

इसी तरह 1.90 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचत भी एक अनुमान है. इसमें इथेनॉल खरीदने की लागत, सरकार की तरफ से दिए जाने वाले प्रोत्साहन, लॉजिस्टिक्स का खर्च और दूसरी आर्थिक लागतें शामिल नहीं हैं. यानी यह पूरी आर्थिक तस्वीर नहीं दिखाता है.

सरकार का एक और आंकड़ा, जो पूरी कहानी बदल देता है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस सरकारी दस्तावेज में 310 लाख मीट्रिक टन और 1.90 लाख करोड़ रुपये की उपलब्धियां गिनाई गई हैं, उसी में यह भी लिखा है कि भारत आज भी अपनी जरूरत का करीब 88.5 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. यही आंकड़ा सरकार के बड़े दावे पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है.

अगर देश आज भी लगभग 90 फीसदी कच्चे तेल के लिए विदेशों पर निर्भर है, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि E20 भारत को वैश्विक तेल कीमतों के झटकों से बचा रहा है?

सच यह है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से आयात पर कुछ असर जरूर पड़ा है, लेकिन भारत अब भी दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक बढ़ जाएं, तो उसका असर भारत पर पहले की तरह पड़ेगा. यानी E20 उस असर को थोड़ा कम कर सकता है, लेकिन उससे बचा नहीं सकता.

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सरकार के इंश्योरेंस वाले दावे में भी झोल है

सरकार बार-बार कह रही है कि E20 पेट्रोल के कारण आपकी गाड़ी की इंश्योरेंस पॉलिसी पर कोई असर नहीं पड़ेगा. जबकि, हकीकत ये है E20 पेट्रोल का असर इंजन पर पड़ता है. और इंश्योरेंस पॉलिसी में ‘इंजन प्रोटेक्ट’ का प्रावधान भी गाड़ी खरीदने के कुछ अरसे बाद मिलना बंद हो जाता है. इंश्योरेंस पॉलिसी के ‘इंजन प्रोटेक्ट’ फीचर में ये शर्त भी होती है कि वह पानी भरने के कारण सीज़ न हुआ हो. लेकिन, सरकार की E20 पॉलिसी से गाड़ियों में ऐसा ईंधन डल रहा है, जो नमी यानी पानी को आकर्षित करता है. 

जो गाड़ियां 2023 से पहले की बनी हैं, उनका पेट्रोल टैंक और फ्यूल गास्केट पर E20 पेट्रोल का दबाव पड़ रहा है. उसमें जंग लगने की आशंका कई ऑटो एक्सपर्ट ने बताई है. वैसे भी वाहनों में लगातार E20 पेट्रोल छह महीने पहले से ही डलना शुरू हुआ है. जंग एक दिन में नहीं लगती. कुछ अरसे बाद हो सकता है कि शिकायतों की तादाद बढ़े. जिसे सरकार वैसे छोटी-मोटी बात कहकर टाल दे कि ये तो नियमित सर्विस का हिस्सा है. 

सवाल नीति पर नहीं, उसे पेश करने के उतावलेपन पर है

सरकार ने 2030 तक E20 पेट्रोल रोल-आऊट करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन दिसंबर 2025 में यह काम करके अपनी पीठ थपथपा ली. जब पेट्रोल पंपों पर सिर्फ E20 पेट्रोल ही मिलने लगा तो 2023 से पहले के वाहन चला रहे लोगों को सरकार ने तसल्ली दी कि उनकी गाड़ियों पर कोई असर नहीं होगा. हमने सारे जरूरी परीक्षण कर लिए हैं.

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लेकिन, बुधवार को राज्यसभा एक सवाल के जवाब देते हुए सड़क-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि 2016 तक मैन्युफैक्चर्ड वाहनों के रबर के पुर्जे और फ्यूल गास्केट खराब हो सकते हैं. अब बताइये, जिन उपभोक्ताओं की गाड़ी 2031 तक चलने के लिए पात्र है, वो E20 पेट्रोल से जो यातना झेलेगी उसका खर्च कौन उठाएगा?

आखिर सरकार इतनी जल्दी में क्यों दिख रही है?

यही इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. जितनी तेजी से सरकार और बीजेपी सफाई दे रही हैं, उससे लगता है कि वे लोगों के सवाल खत्म करने से ज्यादा अपनी बात साबित करने में लगी हैं. लेकिन हर नई पोस्ट के साथ लोग सरकारी दस्तावेज ही उठाकर सवाल पूछ रहे हैं.

यानी इस बार सरकार के सामने विपक्ष नहीं, उसके अपने आंकड़े खड़े हैं. आंकड़े गलत नहीं हैं, लेकिन उन्हें जिस संदर्भ में पेश किया गया है, वही लोगों को गुमराह कर सकता है.

किसी भी सरकार को अपनी उपलब्धियां बताने का पूरा हक है. लेकिन जब पूरे सच की जगह आधा सच सामने रखा जाता है, तो भरोसा कमजोर होता है. और सरकार के लिए भरोसा किसी भी प्रचार से ज्यादा कीमती होता है.

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