औरों को पिलाते रहते हैं और खुद प्यासे रह जाते हैं,
ये पीने वाले क्या जानें पैमानों पे क्या गुजरी है...
क़मर जलालाबादी के गीत की ये पंक्तियां जब भी जेहन में उतरती हैं, तो अक्सर किसी शायर की मुफलिसी या किसी महफिल की उदासी की याद दिलाती हैं, लेकिन सोमवार को जब गाजियाबाद की एक पॉश सोसाइटी की 5वीं मंज़िल से नीचे गिरकर एक मनोचिकित्सक की आत्महत्या की खबर पता चली तो ये पंक्तियां किसी गजल का मिसरा नहीं, बल्कि एक कड़वी और खौफनाक हकीकत बनकर दिमाग में कौंध गईं.
सोचिए जरा, जो औरत या शख्स या डॉक्टर जो भी कह लें... जो हर रोज न जाने कितने टूटते हुए दिलों को जोड़ती रही होगी, जो हर सुबह बंद दरवाजों के पीछे बिलखती रूहों को जीने की वजह देने का हुनर रखती थी, जो दूसरों के अंधेरों में चिराग जलाती थी... वह खुद अंदर ही अंदर किस कदर वीरान हो रही थी, इसका अंदाजा तक किसी को नहीं हुआ. या शायद अंदाजा था भी, तो उस 'स्टिग्मा' की दीवार इतनी ऊंची थी कि कोई आवाज बाहर आ ही न सकी.
आखिर किसी मनोचिकित्सक या हीलर की 'जेहन की बीमारी' यानी डिप्रेशन से मौत को अपनाने की खबर हमें अंदर तक हिला क्यों देती है?शायद इसलिए, क्योंकि हमने अपने समाज में डॉक्टरों और मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स को एक ऐसे 'सुपरह्यूमन' का दर्जा दे दिया है, जिसे रोने की इजाजत तक नहीं है. हम मान लेते हैं कि 'मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट है तो खुद हेल्दी ही होगा'. जो दिमाग की सभी पेचीदगियों को किताबों में पढ़ चुका है, जो अवसाद के एक-एक लक्षण की थ्योरी जानता है, भला वो डिप्रेशन का शिकार कैसे हो सकता है?
लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हर सफेद कोट और हर भारी-भरकम डिग्री के पीछे एक हाड़ मांस का इंसान ही धड़कता है. और आंकड़े भी इस खौफनाक सच पर मुहर लगाते हैं. ऐसी तमाम स्टडीज हैं जो बताती हैं कि भारत में आम जनता की तुलना में डॉक्टरों में अवसाद, एंग्जायटी और सुसाइडल थॉट्स (आत्महत्या के विचार) की दर लगभग दोगुनी है.
अमेरिका के 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ' (NIMH) और 'गार्जियन' की रिपोर्ट बताती हैं कि मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स, मोटिवेशनल स्पीकर्स और डॉक्टर्स में 'विकेरियस ट्रॉमा' (दूसरों के दुख को सुनकर मिलने वाला मानसिक आघात) के कारण 'बर्नआउट' की दर 40 से 50 फीसदी तक पहुंच चुकी है. दुनिया भर में रोजाना औसतन एक डॉक्टर या हीलर अवसाद के चलते अपनी जान गंवा देता है पर यह आंकड़ा अक्सर फाइलों में चुपचाप दबा दिया जाता है.
मुझे याद है लास्ट इयर देश के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी से हुई मेरी एक मुलाकात. मानसिक स्वास्थ्य पर लंबी चर्चा के दौरान जब मैंने उनसे हीलर्स और डॉक्टर्स के मानसिक तनाव पर सवाल पूछा था, तो उन्होंने एक गहरी सांस खींचकर एक ऐसी बात कही थी जो आज गाजियाबाद हादसे के बाद बार-बार कानों में गूंज रही है.
डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने कहा था, 'समाज हमसे उम्मीद करता है कि हम हर वक्त लोहे का ढाल पहनकर खड़े रहें. पर कोई यह नहीं पूछता कि ढाल के पीछे जो इंसान है, उसका दिल कितनी बार टूटा है? हम रोज दूसरों का कचरा और दर्द अपने अंदर समेटते हैं, लेकिन जब खुद खाली होने की बारी आती है, तो हमारे पास न कोई कंधा होता है और न ही अपनी कमजोरी स्वीकार करने की इजाजत. हीलर्स की सबसे बड़ा त्रासदी यही है कि वे दूसरों का इलाज करते-करते खुद अकेले में घुटकर मरने को मजबूर हो जाते हैं.
डॉ. त्रिवेदी का यह बयान और गाजियाबाद की यह दर्दनाक घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है. यह हम सबके लिए एक जगाने वाली घंटी है. यह हादसा हमें चीख-चीखकर बता रहा है कि डिप्रेशन किसी की डिग्री, किसी के पद या किसी के बैंक बैलेंस को देखकर नहीं आता. यह एक बीमारी है, जो किसी को भी अपनी गिरफ्त में ले सकती है, चाहे वह मरीज हो या मरीज का इलाज करने वाला 'मसीहा'. और फिर सबसे बड़ा बोझ होता है, 'प्रोफेशनल मास्क' का.
एक आम इंसान जब उदास होता है, तो वह किसी दोस्त के गले लगकर रो सकता है, सोशल मीडिया पर अपना दर्द लिख सकता है, या किसी थेरेपिस्ट के पास जाकर कह सकता है कि 'डॉक्टर साहब, मुझे बचा लीजिए, मैं अंदर से मर रहा हूं.' लेकिन जब एक मनोचिकित्सक ही डिप्रेशन में घिरता है, तो उसके लिए किसी के आगे हाथ फैलाना सबसे मुश्किल काम बन जाता है. उसे डर लगता है समाज के उस फैसले से कि 'जो खुद अपनी मानसिक सेहत नहीं संभाल सकता, वह हमारा इलाज क्या करेगा?'
यही वह स्टिग्मा है जो उन्हें चुपचाप घुटने पर मजबूर कर देता है. वे दूसरों की दुनिया रोशन करते-करते खुद एक गहरे, काले कुएं में समा जाते हैं. अब समय आ गया है कि हम 'हीलर' को भी इंसान समझना शुरू करें. हमें एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहां एक डॉक्टर, काउंसलर या मोटिवेशनल स्पीकर भी बिना किसी झिझक के कह सके कि 'आज मैं ठीक नहीं हूं, मुझे भी मदद चाहिए.' क्योंकि अगर मसीहा ही अकेलेपन और उनके दिमाग में चल रही जंग में हारते रहे, तो फिर उन पैमानों का क्या होगा जो दूसरों की प्यास बुझाते-बुझाते खुद टूटकर बिखर जाते हैं.
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने इस साल एक जुलाई को 'नेशनल डॉक्टर्स डे 2026' की थीम भी शायद यही सोचकर रखी थी. साल 2026 की यह खास थीम Behind the Mask: Who Heals the Healers? डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य, उनकी सुरक्षा, अत्यधिक तनाव और बर्नआउट जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए चुनी गई है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि दूसरों का इलाज करने वाले डॉक्टरों को भी देखभाल और मानसिक सहारे की जरूरत होती है.
नोट:- (अगर आपके या आपके किसी परिचित के मन में आता है खुदकुशी का ख्याल तो ये बेहद गंभीर मेडिकल एमरजेंसी है. तुरंत भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 पर संपर्क करें. आप टेलिमानस हेल्पलाइन नंबर 1800914416 पर भी कॉल कर सकते हैं. यहां आपकी पहचान पूरी तरह से गोपनीय रखी जाएगी और विशेषज्ञ आपको इस स्थिति से उबरने के लिए जरूरी परामर्श देंगे. याद रखिए जान है तो जहान है.)
मानसी मिश्रा