ब्रिटेन में अपने ही नेता का विरोध ‘बगावत’ या ‘गद्दारी’ क्यों नहीं कहा जाता?

अपने ही दल लेबर पार्टी के सौ सांसदों के कहने पर कीर स्टार्मर ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और पार्टी के नेता पद से इस्तीफे का ऐलान कर दिया. प्रधानमंत्री आवास 10, डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर मीडियो से बात करते हुए उनकी बातों में पार्टी के भीतर कलेश को लेकर कोई तल्खी नहीं थी. आखिर, ब्रिटेन के सिस्टम में ऐसा क्या है, जो वहां शिवसेना या टीएमसी जैसे हालात नहीं बनने देता.

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अपने ही दल के सांसदों के असंतोष के कारण ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर का इस्तीफा वहां की संसदीय प्रणाली के कई दिलचस्प पहलुओं को उजागर करता है. अपने ही दल के सांसदों के असंतोष के कारण ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर का इस्तीफा वहां की संसदीय प्रणाली के कई दिलचस्प पहलुओं को उजागर करता है.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 23 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:16 AM IST

‘मेरी पार्टी मुझसे सवाल कर रही है कि क्या मैं अगले चुनाव में उन्हें नेतृत्व देने के लिए सबसे सक्षम हूं? इस सवाल का जवाब मैंने अपनी पार्टी से सुन लिया और मैं उसे पूरी गरिमा से स्वीकार करता हूं’ -ये बातें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने प्रधानमंत्री पद और लेबर पार्टी का नेता पद छोड़ते हुए कही. दिलचस्प ये है कि 2024 में स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ब्रिटेन का संसदीय चुनाव जीता, और पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई. लेकिन, अब उन्हीं की पार्टी के सौ सांसदों ने उनसे इस्तीफा देने को कहा, और उन्होंने इसे गरिमा के साथ मान लिया. बिना किसी को बागी या गद्दार कहे.

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ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने प्रधानमंत्री पद और लेबर पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने कहा कि वे अगले नेतृत्व के चुनाव पूरा होने तक पद पर बने रहेंगे और अपने उत्तराधिकारी को पूरा समर्थन देंगे. एक व्यवस्थित तरीके से सत्ता हस्तांतरण सुनिश्चित करेंगे. लेबर पार्टी के अंदर उनका समर्थन घटने और हालिया बाई-इलेक्शन में एंडी बर्नहम की बड़ी जीत के बाद यह दबाव बढ़ गया था.

ये घटनाक्रम ब्रिटेन और भारत की संसदीय व्यवस्था के बीच अंतर को और साफ करता है. जबकि, दोनों ही एक तरह की संसदीय प्रणाली को फॉलो करते हैं. भारत में इन दिनों टीएमसी और शिवसेना जैसी पार्टियों में नेतृत्व को लेकर कलह, पार्टी की टूट और बल-बदल चर्चा में है. जबकि, ब्रिटेन से ऐसी खबरें नहीं आतीं. बस देखते ही देखते नेतृत्व बदल जाता है. ब्रिटेन में पिछले कुछ सालों में छह प्रधानमंत्री समय से पहले इस्तीफा दे चुके हैं. डेविड कैमरन (ब्रेक्सिट के बाद), थेरेसा मे, बोरिस जॉनसन, लिज ट्रस (केवल 49 दिन) और ऋषि सुनक – ये सब पार्टी के अंदर घटते समर्थन या संसद में मुश्किलों के चलते चले गए.

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अब स्टार्मर भी उसी लिस्ट में शामिल हो गए. उनकी लेबर पार्टी 2024 में भारी बहुमत से जीती थी, लेकिन लोकप्रियता घटी. पार्टी के अंदर से कई सांसद उन्हें इस्तीफा देने को कह रहे थे. एंडी बर्नहम अब सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं. ब्रिटेन में पीएम रहने के लिए संसद का विश्वास जरूरी है. अगर बिल पास न हों या पार्टी विद्रोह करे तो इस्तीफा देना पड़ता है. अलोकप्रियता के बावजूद पीएम टिक सकता है, लेकिन बिना सपोर्ट के काम करना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है.

भारत में ऐसा कम ही होता है. यहां प्रधानमंत्री हों या मुख्यमंत्री, अक्सर पार्टी के अंदर विरोध के बावजूद टिके रहते हैं. बल्कि, विरोध जताने की गुंजाइश ही नहीं होती.

भारत vs ब्रिटेन: दल-बदल कानून कैसे काम करता है?

भारत में एंटी-डिफेक्शन लॉ (10वीं अनुसूची) 1985 में आया. अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ वोट दे या दूसरी पार्टी जॉइन करे तो उसकी सदस्यता छिन जाती है (कुछ अपवादों के साथ). इसका मकसद अस्थिरता रोकना था, लेकिन अब ये कानून पार्टी हाई कमांड को ज्यादा पावर देता है. असहमति को “बागी या गद्दारी” कह दिया जाता है.

ब्रिटेन में कोई सख्त कानून नहीं है. सांसद अपनी पार्टी में रहते हुए नेतृत्व का खुलकर विरोध कर सकता है. यहां वोटर व्यक्ति (सांसद) को वोट देते हैं, पार्टी को नहीं. अगर कोई लेबर सांसद कंजर्वेटिव में चला जाए तो उसकी सीट नहीं जाती. पार्टी व्हिप का उल्लंघन होता है लेकिन कानूनी सजा नहीं. ये सिस्टम सांसद को अपनी अंतरात्मा और वोटर की इच्छा के अनुसार काम करने की आजादी देता है.
भारत में वोटर मुख्य रूप से पार्टी को चुनता है, इसलिए पार्टी लाइन से हटना मुश्किल है.

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पार्टियों में नेतृत्व चयन: ब्रिटेन vs भारत

ब्रिटेन में पार्टियों का नेतृत्व ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से तय होता है. लेबर पार्टी में सदस्यों और संसद सदस्यों का वोट होता है. कंजर्वेटिव में सांसद उम्मीदवार चुनते हैं, फिर पार्टी सदस्य वोट देते हैं. आंतरिक असहमति को सामान्य माना जाता है – इसे “विश्वास मत” से सुलझाया जाता है. नेता को विरोध का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसे गद्दारी नहीं कहा जाता.

भारत में कई पार्टियां परिवार-केंद्रित हैं. कांग्रेस, टीएमसी, शिवसेना आदि में संस्थापक परिवार का दबदबा रहता है. विरोध करने वाले को “बागी” या “गद्दार” कहा जाता है. पार्टी प्राइवेट लिमिटेड की तरह चलती है.

टीएमसी का हाल: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी 2026 चुनावों में चुनौतियों का सामना कर रही है. कई विधायक और सांसद विद्रोह कर रहे हैं, कुछ भाजपा की ओर जा रहे हैं. आंतरिक कलह, भ्रष्टाचार के आरोप और नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं. अभिषेक बनर्जी पर भी असंतोष है.

शिवसेना का ब्योरा: 2022 में एकनाथ शिंदे के विद्रोह से पार्टी दो फाड़ हो गई. उद्धव ठाकरे की यूबीटी शिवसेना अब फिर स्प्लिट की कगार पर है. कुछ सांसद शिंदे गुट में जाने की तैयारी में हैं. उद्धव ने भावुक अपील की, लेकिन पार्टी में असंतोष गहरा है.

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ये उदाहरण दिखाते हैं कि भारत में असहमति को दबाया जाता है, जबकि ब्रिटेन में इसे खुले में सुलझाया जाता है.

संसदीय प्रणाली के बुनियादी अंतर

भारत में पार्टी चुनकर सरकार बनती है. सांसद/विधायक पार्टी लाइन फॉलो करते हैं. ब्रिटेन में व्यक्ति को वोट मिलता है, इसलिए सांसद ज्यादा स्वतंत्र हैं. पीएम अलोकप्रिय होने पर भी टिक सकता है, लेकिन बिल पास न हो तो मजबूरन जाना पड़ता है. भारत में मजबूत बहुमत होने पर पीएम ज्यादा सुरक्षित रहता है.

ब्रिटेन की व्यवस्था ज्यादा लचीली और जवाबदेह है, लेकिन अस्थिरता भी लाती है. स्टार्मर का इस्तीफा इसका ताजा उदाहरण है. भारत की व्यवस्था स्थिरता देती है, लेकिन आंतरिक लोकतंत्र कमजोर भी कर देती है. टीएमसी और शिवसेना इसके ताजा उदाहरण हैं. राजनीति में बदलाव जरूरी है. भारत को पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र मजबूत करने की जरूरत है, ताकि नेता पार्टी के प्रति जवाबदेह रहें. ब्रिटेन का सिस्टम सबक है – खुली बहस और सदस्यों की भागीदारी बढ़ाने के लिए.

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