गदर मूवी का तारा सिंह ‘बंटवारा’ में आकर सिकंदर मिर्जा बन गया है. और पाकिस्तान में एक हिंदू महिला की हिफाजत कर रहा है. इस पटकथा के आलोचकों को यह कहानी गले नहीं उतरती, क्योंकि 1947 के बंटवारे में उस पार कोई मुरव्वत नहीं की गई. अपनी फिल्म को प्रमोट करते हुए सनी अपने पिता धर्मेंद्र के शब्दों में कहते हैं कि ‘हिंदुस्तान मां है, तो पाकिस्तान मौसी’.
पड़ोसी देशों के बीच मेलजोल के संबंध होने चाहिए, लेकिन इसका पैगाम अतीत की क्रूरतम यादों के साथ जोड़कर देना नाइंसाफी लगता है. मरहम लगाने के लिए पुराने जख्मों को दोबारा कुरेदना ठीक नहीं. बंटवारा मूवी पाकिस्तानी लेखक असगर वजाहत के 1989 में लिखे गए नाटक ‘जिस लाहौर नै वेख्या, ओ जाम्या ए नई’ (जिसने लाहौर नहीं देखा, वो जन्मा ही नहीं) पर आधारित है. यह नाटक पाकिस्तान में ही यह कहकर बैन कर दिया गया था कि इसने इंसानियत को रूमानी बनाने के लिए क्रूर जमीनी हकीकतों को नजरअंदाज कर दिया.
बंटवारा से पहले आई दिलजीत दोसांझ की मूवी 'मैं वापस आऊंगा' को लेकर भी कुछ ही बहस हुई थी. मूवी का मैसेज ये था कि बंटवारे में दोनों तरफ के लोगों ने यातना झेली है. यकीनन सही. लेकिन, जब ये कहा गया कि दोनों तरफ के लोगों ने बराबर हिंसा झेली है, तो हिसाब-किताब होने लगा.
पुरानी बातें अक्सर कही है- गड़ा मुर्दा, जिसका काम होता है उखड़ना. इतिहास में कुछ वाकये और त्रासदी ऐसे ही गड़े मुर्दे होते हैं, जिनका जिक्र होते ही वो बाहर आने लगते हैं. बंटवारे की यादें ऐसी ही हैं, जिसका दर्द कभी किसी के साथ साझा नहीं किया जा सकता. तीन घंटे का सिनेमा या चार मिनट का गाना उस खौफ के करीब भी नहीं पहुंच सकता, बंटवारे की कहानियों में नाटकीयता नहीं है, बैकग्राउंड म्यूजिक और गाने तो बिल्कुल नहीं.
असली बंटवारे की 5 खूनी कहानियां
स्वीडन की स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस और जाने-माने इतिहासकार प्रो. इश्तियाक अहमद ने अपनी ऐतिहासिक किताब 'The Punjab Bloodied, Partitioned and Cleansed' (पंजाब: लहूलुहान, विभाजित और सफाया) में 1947 के बंटवारे का जो बेबाक और निष्पक्ष खाका खींचा है, वह रोंगटे खड़े कर देता है. इश्तियाक अहमद ने ब्रिटिश सरकार की सीक्रेट रिपोर्ट्स, उस दौर के अखबारों और सबसे बढ़कर दोनों मुल्कों में रहने वाले चश्मदीदों, पीड़ितों और यहां तक कि कत्लेआम में शामिल हमलावरों के इंटरव्यू लेकर इस किताब को लिखा है.
मार्च 1947 से लेकर दिसंबर 1947 तक पंजाब में जो हुआ, वह केवल भारत का बंटवारा नहीं था- वह मानव इतिहास का सबसे भयानक 'एथनिक क्लींजिंग' था. इस किताब से चुनकर निकाले गए 5 सबसे दर्दनाक वाकये यह अंदाजा लगाने के लिए काफी हैं कि बंटवारे का घाव सिनेमा के पर्दे से कहीं ज्यादा गहरा और कभी न भरने वाला है.
1. ठोहा खालसा की वह खौफनाक कुएं वाली रात: आबरू बचाने के लिए कुओं में कूदती महिलाएं
मार्च 1947 में, यानी जब आज़ादी और विभाजन की आधिकारिक तारीख तय भी नहीं हुई थी, तब रावलपिंडी (पश्चिमी पंजाब) के देहाती इलाकों में सिखों और हिंदुओं के खिलाफ भयानक हिंसा भड़क उठी. रावलपिंडी जिले का एक छोटा सा खूबसूरत गांव था- ठोहा खालसा.
इश्तियाक अहमद की किताब में दर्ज चश्मदीदों के बयानों के अनुसार, मार्च के दूसरे हफ्ते में हथियारबंद भीड़ ने इस गांव को चारों तरफ से घेर लिया. गांव के पुरुषों के पास खास हथियार नहीं थे. हमलावरों ने मांग रखी कि या तो वे मजहब बदल लें या फिर अपनी बहन-बेटियों को उनके हवाले कर दें.
गांव की महिलाओं और बुजुर्गों ने जो फैसला लिया, वह रूह कंपा देने वाला था. गांव की एक बुजुर्ग महिला लाजवंती और अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के अनुसार, करीब 90 सिख महिलाओं और मासूम लड़कियों ने जमा होकर तय किया कि हमलावरों के हाथों अपनी इज्जत नीलाम होने से बेहतर है मौत का चुनाव करना.
अपनी गोद में दूधमुहे बच्चों को छाती से चिपकाए, वाहेगुरु का जाप करते हुए, एक-एक करके 90 औरतें गांव के गहरे कुएं में छलांग लगाने लगीं. कुआं लाशों से भर गया. जो औरतें सबसे नीचे गिरीं, वे डूब गईं. लेकिन जो बाद में कूदीं, वे कुएं में जगह न होने और पानी घटने के कारण अंदर तड़पती रहीं.
यह सिर्फ ठोहा खालसा की बात नहीं थी. झेलम, रावलपिंडी और मुल्तान के दर्जनों गांवों में पिताओं ने अपनी बेटियों के सिर खुद अपनी तलवारों से काट दिए ताकि वे हमलावरों के हाथ न लगें. क्या कोई फिल्म उस पिता की चीख का दर्द कभी पर्दे पर ला सकती है जिसने अपनी ही औलाद का गला काटा था?
2. शेखूपुरा का राइस मिल नरसंहार: एक ही कंपाउंड में बिछ गईं सैकड़ों लाशें
अगस्त 1947 में जब रेडक्लिफ लाइन की घोषणा हुई और शेखूपुरा (पश्चिम पंजाब) पाकिस्तान के हिस्से में आया, तो वहां सदियों से बसने वाले हिंदू और सिख अचानक अपनी ही जमीन पर बेगाने और बेबस हो गए.
शेखूपुरा शहर में अफ़वाह और दहशत का माहौल था. प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों ने गैर-मुस्लिमों को सुरक्षा का दिलासा दिया और उन्हें शहर की एक बड़ी राइस मिल और गुरुद्वारे के अहाते में शरण लेने को कहा. सैकड़ों परिवार अपने बच्चों, बुजुर्गों और बच्चे-खुचे सामान के साथ उस मिल के अहाते में जमा हो गए. उन्हें लगा कि सेना और पुलिस उनकी हिफाजत करेंगी.
लेकिन इश्तियाक अहमद ने अपनी किताब में जिस सच्चाई का खुलासा किया है, वह रोंगटे खड़े कर देती है. 25 और 26 अगस्त 1947 को स्थानीय पुलिस और दंगाई भीड़ ने मिलकर उस राइस मिल को चारों तरफ से घेर लिया. लोगों को ये कहकर बहाने से बाहर निकाला गया कि उन्हें सेना के ट्रकों में लादकर भारत भेजा जाएगा, इसलिए वे छोटे-छोटे समूहों में बाहर निकलें.
जैसे ही लोग बाहर आए, उन पर गोलियों की बौछार कर दी गई. जो लोग मिल के अंदर छिपे रहे, उन पर अंदर घुसकर हमले किए गए. चावल की बोरियों के पीछे छिपे मासूम बच्चों को भालों से गोद दिया गया और पूरे कंपाउंड को आग के हवाले कर दिया गया. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उस एक दिन में शेखूपुरा राइस मिल के अंदर 3,000 से 4,000 मासूम लोगों को कत्ल कर दिया गया. कई दिनों तक उन लाशों को उठाने वाला कोई नहीं था और पूरे शहर में सड़ी हुई लाशों की बदबू फैली हुई थी.
3. 'मौत की ट्रेनें': जब स्टेशनों पर पैसेंजर नहीं, सिर्फ लाशें उतरती थीं
1947 के उस खौफनाक दौर में ट्रेनें सरहद पार करने का ज़रिया नहीं, बल्कि चलती-फिरती 'श्मशान' बन चुकी थीं. अमृतसर, लाहौर, गुजरांवाला, गुजरात (पाकिस्तान), और अंबाला के रेलवे स्टेशनों पर आने वाली ट्रेनें बर्बर मंजर पेश करती थीं.
इश्तियाक अहमद की किताब में इस बात का ब्योरा है कि हिंसा किसी एक तरफ से नहीं हो रही थी. दोनों तरफ के ट्रेन रूट खूनी थिएटर बन चुके थे. अगस्त और सितंबर 1947 के महीनों में ट्रेनों को साजिश रचकर निर्जन इलाकों में रोका जाता था. कभी पटरियों पर पत्थर रखकर, तो कभी सिग्नल गिराकर.
जैसे ही ट्रेन रुकती, झाड़ियों में छिपी हथियारबंद भीड़ डिब्बों पर टूट पड़ती. खिड़कियों और दरवाजों से भाले और तलवारें घुसाई जाती थीं. गोलियां चलाई जाती थीं. जो डिब्बे अंदर से बंद होते, उन्हें पेट्रोल छिड़क कर फूंक दिया जाता था.
जब यह ट्रेनें अपने गंतव्य स्टेशन (जैसे लाहौर से अमृतसर या अमृतसर से लाहौर) पहुंचती थीं, तो प्लेटफॉर्म पर सन्नाटा छा जाता था. ट्रेन के सारे डिब्बों में केवल और केवल कटी-फटी लाशें होती थीं. डिब्बों के नीचे से खून टपक रहा होता था. कई बार हमलावर ट्रेन के बोगी पर चूने से लिख देते थे- "यह हमारा तोहफा है."
एक-एक ट्रेन में 1,000 से 1,500 शव होते थे. कई बार दंगाई ट्रेन के ड्राइवर को सिर्फ इसलिए जिंदा छोड़ देते थे ताकि वह खून से लथपथ उस ट्रेन को दूसरे देश की सीमा तक पहुंचा सके ताकि उस पार के लोगों में दहशत पैदा हो.
4. 'काफ़िले' और बल्लोकी हेडवर्क्स का खूनी सैलाब: पैदल चलते हजारों शरणार्थियों का कत्लेआम
जब ट्रेनें और सड़कें पूरी तरह मौत का कुआं बन गईं, तो लोगों के पास सिर्फ एक रास्ता बचा- अपने घरों से पैदल निकल पड़ना. ये केवल 100-200 लोगों का समूह नहीं थे, बल्कि 50,000 से लेकर 1,00,000 लोगों के विशाल जत्थे थे, जिन्हें काफिला कहा जाता था. ये काफिले 10-10 किलोमीटर लंबे होते थे, जो धूल और कीचड़ में अपने मवेशियों और छोटे बच्चों को लिए घिसट रहे थे.
इश्तियाक अहमद ने अपनी पुस्तक में बल्लोकी हेडवर्क्स (Balloki Headworks) और रावी व सतलुज नदियों के पुलों पर हुए कत्लेआम का ब्योरा देते हैं. जब ये विशाल काफिले नदियों के संकरे पुलों या हेडवर्क्स को पार करने की कोशिश करते थे, तो दोनों तरफ से उन पर घात लगाकर हमले किए जाते थे.
उस साल मूसलाधार मानसूनी बारिश हो रही थी. एक तरफ पीछे से आते हथियारबंद दंगाई, दूसरी तरफ भूख, थकावट और हैजा. रास्ते में जो बुजुर्ग या छोटे बच्चे थककर गिर जाते, उन्हें काफिले के साथ चल रहे उनके अपने परिजन ही छोड़कर आगे बढ़ने को मजबूर थे, क्योंकि रुकने का मतलब पूरी फैमिली का कत्ल था.
बल्लोकी हेडवर्क्स के पास रावी नदी का पानी हफ्तों तक इंसानी लाशों और लाल खून से बहता रहा. चश्मदीदों ने बताया कि नदी का पानी इतना जहरीला और खूनी हो चुका था कि हफ्तों तक आसपास के गांवों के लोग उस नदी का पानी पीना तो दूर, उसे छूने से भी डरते थे.
5. मासूमों का अपहरण, जिस्मों पर दागे गए निशान और खोई हुई पहचान
1947 की त्रासदी का सबसे घिनौना और शर्मनाक पहलू महिलाओं के खिलाफ हुई बर्बरता थी. प्रो. इश्तियाक अहमद अपनी किताब में यह खौफनाक सच्चाई सामने लाते हैं कि बलवाइयों ने महिलाओं के शरीर को अपनी नफरत और जीत का मैदान बनाया.
अनुमान के मुताबिक 1947 में 75,000 से 1,00,000 महिलाओं का अपहरण किया गया. महिलाओं को नग्न करके बाजारों में घुमाया गया, उनके स्तनों को काटा गया और उनके जिस्मों पर गोदने की सुइयों से धार्मिक निशान और नफरत भरे शब्द दागे गए.
ये त्रासदी यहीं खत्म नहीं हुई. 1948 के बाद भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने समझौते के तहत 'सर्च एंड रिकवरी' ऑपरेशन चलाकर इन अगवा की गई महिलाओं को ढूंढकर उनके परिवारों को वापस लौटाने की कोशिश की, तो एक नया मानसिक अत्याचार शुरू हुआ.
कई परिवारों ने अपनी ही बेटियों और बहुओं को घर में वापस लेने से मना कर दिया. कई औरतें जो अपने अपहरणकर्ताओं के साथ रहने लगी थीं और उनके बच्चे हो चुके थे, उन्हें उनके बच्चों से जबरन छीनकर सीमाओं के पार भेजा गया. इस प्रशासनिक और सामाजिक क्रूरता ने हजारों महिलाओं को ताउम्र एक ऐसी गुमनाम दुनिया में धकेल दिया, जहां न उनका कोई अतीत बचा था, न कोई भविष्य.
इतिहास का वो नासूर जो किसी पर्दे पर समा नहीं सकता
जब हम सनी देओल की 'बंटवारा' जैसी फिल्में देखते हैं या दिलजीत दोसांझ के संगीतमय गीतों पर भावुक हैं, तो यह भी याद रखना चाहिए कि कला और सिनेमा की अपनी एक सीमा होती है. सिनेमा में हीरो होता है, एक्शन होता है, और आखिर में एक बैकग्राउंड स्कोर के साथ कहानी खत्म हो जाती है.
हकीकत में बंटवारे की किसी कहानी का कोई खुशनुमा अंत नहीं था. 1947 का दर्द वह घाव है जो कभी साझा नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिस मां ने अपने बच्चों को कुएं में फेंककर खुद छलांग लगाई, उसका दर्द केवल वही समझ सकती थी. जिस पिता ने अपनी बेटी का गला काटकर भीड़ से उसकी इज्जत बचाई, उस दर्द को किसी स्क्रीन पर री-क्रिएट नहीं किया जा सकता. और जिस ट्रेन के डिब्बे में केवल कटी हुई लाशें पहुंचीं, उस सन्नाटे को कोई संगीत बयां नहीं कर सकता.
1947 का इतिहास हमें किसी दूसरे समुदाय से नफरत करना सिखाने के लिए नहीं है. यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब राजनीति और मजहबी कट्टरता का जहर आम इंसान के दिमाग में घुलता है, तो सदियों पुरानी तहज़ीब और इंसानियत रातों-रात राख बन जाती है. बंटवारे का सिनेमा रोने या भावुक होने का मौका तो देता है, इमोशनल क्लोजर नहीं देता.
धीरेंद्र राय