1. सोनीपत में स्क्रीन पर जलती संवेदनाओं की चिता
एक वृद्धाश्रम से खबर आती है एक बुजुर्ग कपड़ा व्यापारी, शिवचरण गुप्ता की मौत की. उन्होंने अपनी तीन-तीन बेटियों को पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया कि वे समाज में सर उठाकर जी सकें. दो बेटियां टीचर बनीं. लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर वही पिता सोनीपत के वृद्धाश्रम में बेटियों की राह तकते-तकते अपनी अंतिम सांसें गिनता रहा. वृद्धाश्रम के संचालक बेटियों को फोन करते रहे कि पिता की तबीयत बहुत खराब है, एक बार आकर देख लो. पर जवाब में मिले सिर्फ टालने वाले बहाने. जब शिवचरण की आत्मा ने शरीर छोड़ दिया, तब भी बेटियों ने यही कहा- "हमारे पास वक़्त नहीं है, आप ही अंतिम संस्कार कर दीजिए."
एक बेटी ने नेपाल से ऑनलाइन खाते में 5100 रुपए ट्रांसफर कर दिए. कहा कि सारा काम अच्छे से करा देना. पिता का दाह-संस्कार हुआ, पर कोई अपना कंधा देने वाला नहीं था. बेटियां अपने-अपने मोबाइल की चमचमाती स्क्रीन पर वीडियो कॉल के जरिए पिता की जलती चिता को देखती रहीं. जब आश्रम वालों ने पूछा कि अस्थियां कब ले जाओगी, तो जवाब आया- "समय नहीं है, आप ही गंगा में प्रवाहित कर दीजिए, बस वीडियो बनाकर भेज दीजिएगा."
ज़रा सोचिए, क्या यह सिर्फ एक बुजुर्ग की मौत है? या यह उस ममता, उस त्याग और उस पिता के भरोसे की मौत है जिसने अपनी पूरी जिंदगी बेटियों को अपने पैर पर खड़ा होने लायक बनाने में लगा दी? पैसे देकर पिता का अंतिम संस्कार और व्हाट्सएप कॉल पर अस्थि विसर्जन का वीडियो, क्या व्यस्तताओं ने हमारी संवेदनाओं को इतना खोखला कर दिया है कि हम उस इंसान के लिए दो दिन का वक्त नहीं निकाल सके जिसने हमें जिंदगी दी?
2. आगरा में बेटी की बलि, फिर लाश के पैर छूकर माफी
अभी हम सोनीपत के उस वृद्धाश्रम के सन्नाटे से उबर भी नहीं पाए थे कि आगरा से एक और रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर आती है. दक्षिण दिल्ली के तिगड़ी इलाके में रहने वाला लखपत अपनी 18 साल की बेटी को दवा दिलाने के बहाने आगरा के बासौनी क्षेत्र में लाता है. बेटी को क्या मालूम था कि जिस पिता के हाथ को थामकर उसने चलना सीखा था, वही हाथ उसे मौत के घाट उतारने वाले हैं.
बेटी का कसूर सिर्फ इतना था कि वह बिना शादी के गर्भवती हो गई थी. हमारे समाज की तथाकथित 'इज्जत' और 'नाक बचाने' का भूत पिता के सिर पर ऐसा सवार हुआ कि उसने अपने दामाद के साथ मिलकर अपनी ही बेटी को चंबल में डुबो कर मार डाला. बेटी तड़पती रही, अपनी जान की भीख मांगती रही होगी, पर पिता के दिल में बाप की जगह समाज का जल्लाद बैठा था.
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. हत्या करने के बाद उस पिता ने जो किया, वह अपराध-बोध का एक ऐसा विकृत रूप है जिसे देखकर रूह कांप जाती है. बेटी की लाश चंबल के पानी में बह रही थी और पिता उसके पैर छूकर माफी मांग रहा था. और उसका दामाद इसका वीडियो बना रहा था. फिर दिल्ली लौटकर खुद थाने में बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. बाद में जब पुलिस ने कड़ाई से पूछताछ की, तो सच बाहर आ गया.
गौर कीजिए इस विरोधाभास पर. हत्या से पहले समाज का खौफ इतना बड़ा था कि अपनी ही औलाद का कत्ल कर दिया. और हत्या के बाद आत्मा पर अपराध-बोध का ऐसा बोझ कि लाश के पैर छूकर माफी मांग रहा है. यह कौन सी मर्यादा है? यह कौन सी सामाजिक प्रतिष्ठा है जो एक जिंदा इंसान की जान से ज्यादा कीमती हो जाती है?
दो अलग ध्रुव, पर एक ही कड़वी हकीकत
अगर हम इन दोनों घटनाओं को एक साथ रखकर देखें, तो पहली नज़र में दोनों बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं. एक तरफ हरियाणा का एक पिता है जिसे उसकी बेटियों ने उपेक्षित करके मरने के लिए छोड़ दिया. दूसरी तरफ दिल्ली का एक पिता है जिसने अपनी ही बेटी की जान ले ली. एक जगह बेटियां कसूरवार दिखती हैं, तो दूसरी जगह पिता कातिल बनकर खड़ा है. एक तरफ मॉडर्न लाइफ की कथित व्यस्तताएं कसूरवार दिखती हैं, तो दूसरी तरफ पिछड़ी-दकियानूसी सोच हत्यारी नजर आती है.
लेकिन अगर हम गहराई में उतरें, तो पाएंगे कि इन दोनों घटनाओं की जड़ें हमारे समाज की सड़ी-गली मान्यताओं और दरकते रिश्तों में ही फैली हैं. दोनों ही घटनाओं में 'बाप-बेटी का रिश्ता' छिन्न-भिन्न हुआ है. दोनों ही जगहों पर ‘अंतिम संस्कार’ के नाम पर मर्यादा तार-तार हुई है. एक जगह 5100 रुपए भेजकर वीडियो कॉल पर पिता की चिता को जलते देखा गया, तो दूसरी जगह चंबल के ठंडे पानी में बेटी की लाश को बहाकर उसके पैर छुए गए. दोनों ही तस्वीरों में 'अपराध-बोध' की एक गहरी और डरावनी परत मौजूद है.
'मालिकाना हक' की घटिया सोच
आगरा की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे समाज में आज भी बेटी को एक स्वतंत्र इंसान नहीं, बल्कि पिता या पति की 'अमानत' या 'संपत्ति' समझा जाता है. एक पिता यह मान बैठता है कि बेटी के शरीर, उसकी पसंद, उसकी गलतियों और उसकी जिंदगी पर पहला और आखिरी हक उसी का है. जब 18 साल की बेटी समाज के बनाए नियमों से परे जाकर गर्भवती हुई, तो पिता के पास उसे समझाने, संभालने या उसका सहारा बनने का विकल्प था. लेकिन उसने चुना उसे मौत देने का रास्ता. क्यों? क्योंकि 'लोग क्या कहेंगे', समाज का यह अदृश्य दबाव इतना भयानक है कि इंसान अपनी ही औलाद का खून बहाने में नहीं हिचकिचाता. वह पिता यह भूल गया कि वह बेटी के शरीर का मालिक नहीं था. वह सिर्फ उसका अभिभावक था. लेकिन झूठी गैरत ने एक बाप को जल्लाद बना दिया, और कत्ल करने के बाद जब बाप का दिल जागा, तो वह पैर छूकर माफी मांगने का नाटक करने लगा.
करियर, आधुनिकता और संवेदनाओं का बंजरपन
दूसरी तरफ, सोनीपत की घटना आधुनिकता और तथाकथित 'सफलता' के उस भयानक रूप को दिखाती है जहां इंसान पढ़ा-लिखा तो बन जाता है, लेकिन उसके अंदर का इंसान मर जाता है. शिवचरण जी की तीनों बेटियां पढ़ी-लिखी थीं, शिक्षिकाएं थीं. वे समाज को संस्कार और शिक्षा देने का काम कर रही थीं. लेकिन अपने ही पिता के लिए उनके पास न समय था और न संवेदना.
हम अक्सर कहते हैं कि बच्चों को पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहिए. लेकिन क्या हमने उन्हें यह सिखाया कि जब माता-पिता के पैर कांपने लगें, तो उनका सहारा कैसे बना जाता है? आज का इंसान अपनी भागदौड़, अपनी सहूलियत और अपने करियर में इतना अंधा हो चुका है कि उसे जन्म देने वाले मां-बाप बोझ लगने लगते हैं. ₹5100 का ऑनलाइन पेमेंट और वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार इस बात का सबूत है कि हमने तकनीक को अपना दिल सौंप दिया है और अपनी आत्मा को नीलाम कर दिया है.
क्या दोनों घटनाओं का अंत बदल नहीं सकता था?
दिल कहता है कि काश इन दोनों घटनाओं का अंत ऐसा न हुआ होता. काश, शिवचरण जी को अपनी जिंदगी के आखिरी डेढ़ साल किसी वृद्धाश्रम के पराए कमरे में न बिताने पड़ते. काश, जब उनकी आंखें बंद हो रही होतीं, तो उनकी बेटियों के हाथ उनके माथे पर होते. काश, वे बेटियां अपने पिता के अहसानों को याद रखकर उनकी आखिरी सांस तक उनका साया बनी रहतीं.
और काश! आगरा की उस 18 साल की मासूम लड़की को चंबल की लहरों में अपनी जान न गंवानी पड़ती. काश, उसका पिता अपनी झूठी आन-बान-शान को किनारे रखकर बेटी के गले लगता. उससे कहता- "तु चिंता मत कर, तू मेरी बेटी है. दुनिया जो कहे सो कहे, मैं तेरे साथ खड़ा हूं." अगर वह पिता यह समझ पाता कि बेटी कोई सामान नहीं है जिस पर उसका मालिकाना हक हो, तो आज वह लड़की जिंदा होती और वह पिता सलाखों के पीछे नहीं होता.
बदलाव की शुरुआत कहां से हो?
अगर हम वाकई चाहते हैं कि ऐसी दर्दनाक कहानियां दोबारा न लिखी जाएं, तो समाज के तौर पर हमें अपने सोचने का नजरिया बदलना होगा. बच्चों को सिर्फ सफल नहीं, संवेदनशील बनाएं. उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर या टीचर बनाने के साथ-साथ उन्हें बेहतर इंसान बनाना बेहद जरूरी है. उन्हें यह सिखाइए कि रिश्तों की कीमत किसी नौकरी या पैसे से कहीं ज्यादा होती है. माता-पिता कोई 'यूज एंड थ्रो' की वस्तु नहीं हैं जिन्हें बूढ़ा होने पर आश्रम में छोड़ दिया जाए.
दूसरी तरफ सबक माता-पिता के लिए भी है. वे अपने बच्चों की परवरिश 'लोग क्या कहेंगे' के खौफ में न करें. तभी समाज की बेतुकी मान्यताओं और खोखली इज्जत के लिए अपनी औलाद की बलि देना बंद करना होगा. बेटियों को अपनी संपत्ति या किसी और की अमानत समझना बंद कीजिए. वे स्वतंत्र नागरिक हैं, उनके अपने अधिकार हैं, अपनी भावनाएं हैं. पिता का काम उन्हें सही मार्गदर्शन देना है, उनकी जिंदगी का फैसला करने के नाम पर उनकी जान लेना नहीं.
धीरेंद्र राय