मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के छिछावली गांव के रहने वाले गिरवर सिंह तोमर ने 1991 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में हवलदार के तौर पर नौकरी शुरू की थी. वर्दी पहनकर देश की सेवा करने का सपना था. करीब आठ साल तक उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई, लेकिन एक वरिष्ठ अधिकारी से हुए विवाद ने उनकी जिंदगी का रास्ता बदल दिया.
दरअसल, विवाद के बाद गिरवर सिंह के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई. इसके बाद 1999 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. अचानक नौकरी और वर्दी दोनों छिन गए. वह वापस अपने गांव मुरैना लौट आए. सामने एक ऐसी जिंदगी थी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.
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नौकरी छूटी तो मंदिर में शुरू की साधना
नौकरी जाने के बाद गिरवर सिंह की जिंदगी धीरे-धीरे आध्यात्मिक रास्ते पर बढ़ने लगी. उन्होंने मंदिर में रहकर पूजा-पाठ और साधना शुरू कर दी. बाद में वह गुफा मंदिर पहुंचे. यहीं उनकी पहचान गिरवर दास महाराज के नाम से होने लगी और उन्होंने संत का जीवन अपना लिया.
वक्त बीतता गया और मंदिर की सेवा उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई. करीब दो दशक तक वह मंदिर सेवा से जुड़े रहे. बाहर से देखने पर उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी, लेकिन मन के किसी कोने में सीआरपीएफ की वर्दी और अपनी नौकरी वापस पाने की इच्छा अब भी जिंदा थी.
गिरवर सिंह ने हार मानने के बजाय अपनी लड़ाई अदालत में जारी रखी. 1999 में ही उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. एक तरफ वह मंदिर में साधना कर रहे थे, दूसरी तरफ अपनी नौकरी और सम्मान वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे.
आठ साल बाद आया फैसला, फिर भी नहीं मिली राहत
करीब आठ साल की कानूनी लड़ाई के बाद 2007 में हाईकोर्ट ने गिरवर सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया. उन्हें उम्मीद थी कि अब उनकी नौकरी वापस मिल जाएगी, लेकिन उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. सीआरपीएफ की ओर से हाईकोर्ट के फैसले पर रोक (Stay) ले ली गई.
इसके बाद मामला फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया में चला गया. गिरवर सिंह ने भी अपना संघर्ष जारी रखा. उन्होंने हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ (Double Bench) में अपील की. कई साल तक सुनवाई चलती रही और वह लगातार अपनी नौकरी वापस पाने की कोशिश करते रहे.
आखिरकार अगस्त 2025 में उनकी लंबी लड़ाई को बड़ी कामयाबी मिली. हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए नौकरी बहाल करने का आदेश दिया. लेकिन आदेश मिलने के बाद भी उन्हें तुरंत सेवा में नहीं लिया गया. इसके बाद उन्होंने अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजकर नियुक्ति की मांग जारी रखी.
26 साल बाद फिर पहनी वही वर्दी
जिस दिन का गिरवर सिंह को वर्षों से इंतजार था, वह आखिरकार अगस्त 2026 में आया. सीआरपीएफ में उनकी वापसी हुई और उन्हें छत्तीसगढ़ के बीजापुर में तैनाती दी गई. नियुक्ति का आदेश मिलते ही वह बीजापुर पहुंचे और ड्यूटी ज्वाइन कर ली.
एक समय जिस वर्दी को उनसे छीन लिया गया था, 26 साल बाद वही वर्दी उन्होंने दोबारा पहन ली. इस पल में उनके लिए सिर्फ नौकरी की वापसी नहीं थी, बल्कि वर्षों के संघर्ष, इंतजार और उम्मीद की जीत भी थी.
गिरवर सिंह की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि नौकरी जाने के बाद उन्होंने जिंदगी का एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना. वह करीब दो दशक तक मंदिर में संत के रूप में रहे और गिरवर दास महाराज के नाम से पहचाने गए. इसके बावजूद उन्होंने अपने पुराने हक की लड़ाई नहीं छोड़ी.
संत से फिर बने जवान, संघर्ष ने बदली जिंदगी
मुरैना के छिछावली गांव से शुरू हुई यह कहानी अब बीजापुर की ड्यूटी तक पहुंच चुकी है. 1991 में सीआरपीएफ में हवलदार के तौर पर शुरुआत, 1999 में बर्खास्तगी, मंदिर में साधना, लंबी अदालत की लड़ाई और फिर अगस्त 2026 में नौकरी की बहाली. गिरवर सिंह की जिंदगी का यह सफर कई उतार-चढ़ाव से होकर गुजरा है.
उन्होंने करीब 26 साल तक अपनी वर्दी वापस पाने का इंतजार किया. इस दौरान उन्होंने संत का जीवन भी जिया और अदालत में अपना संघर्ष भी जारी रखा. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और वह फिर से उसी बल का हिस्सा बन गए, जिसमें कभी उन्होंने देश की सेवा शुरू की थी.
अब गिरवर सिंह तोमर एक बार फिर सीआरपीएफ की वर्दी में देश की सेवा कर रहे हैं. उनके लिए यह सिर्फ नौकरी में वापसी नहीं, बल्कि उस उम्मीद की जीत है जिसे उन्होंने इतने लंबे समय तक अपने भीतर जिंदा रखा. मंदिर के संत गिरवर दास महाराज से फिर सीआरपीएफ जवान बने गिरवर सिंह की यह कहानी लंबे संघर्ष के बाद मिली मंजिल की कहानी है.
हेमंत शर्मा