मैरिटल रेप पर SC के फैसले के मायने क्या? गर्भपात पर जजमेंट से विवाहित, अविवाहितों के लिए क्या कुछ बदलेगा

गर्भपात पर गुरुवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने अविवाहित और विवाहित महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के पक्ष में खुलकर पैरवी की है. अदालत ने सिंगल महिलाओं को 24 हफ्ते तक गर्भपात कराने की अनुमति दी है तो विवाहित महिलाओं की यौन स्वायतता के हक में कई टिप्पणियां की है और मैरिटल रेप को MTP एक्ट के तहत रेप की कैटेगरी में रखा है.

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aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 सितंबर 2022,
  • अपडेटेड 2:10 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने देश में गर्भपात को लेकर एक बेहद अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा है कि भारत में अविवाहित महिलाओं को भी MTP एक्ट के तहत गर्भपात का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट के तहत सभी महिलाओं को चाहें वो विवाहित हों या अविवाहित उन्हें 24 सप्ताह तक के गर्भ के सुरक्षित गर्भपात का कानूनी अधिकार है. महिलाओं के प्रजनन और दैहिक स्वायतता की पूरजोर पैरवी करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक महिला से 24 सप्ताह के गर्भ को गर्भपात कराने का अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं छीना जा सकता है क्योंकि वह विवाहित नहीं है. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एएस बोपन्‍ना और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने कहा कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा. 

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सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सामाजिक और कानूनी असर क्या होगा ये हम समझते हैं. 


अविवाहित और सिंगल महिलाओं को मिला 24 हफ्ते तक गर्भपात का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने अविवाहित और सिंगल महिलाओं 24 हफ्ते तक गर्भपात का सुरक्षित और कानूनी अधिकार दिया है.  जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एएस बोपन्‍ना और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने MTP एक्ट की व्याख्या करते हुए कहा कि विवाहित महिलाओं की तरह अविवाहित और सिंगल महिलाओं को भी अधिकार होगा कि वे 24 हफ्ते तक के गर्भ गर्भपात करवा सकें. बता दें कि सामान्य मामलों में 20 हफ्ते से अधिक और 24 हफ्ते से कम के गर्भ के एबॉर्शन का अधिकार अब तक विवाहित महिलाओं को ही था. अब अविवाहित, सिंगल और लिव- इन में रहने वाली महिलाओं को भी ये अधिकार मिल गया है. 

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अविवाहित महिलाओं को भी MTP एक्ट के तहत गर्भपात का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला 

कानून का लाभ पितृसत्तात्मक रुढ़ियों के आधार पर तय नहीं होगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कानून का लाभ संकीर्ण पितृसत्तात्मक रूढ़ियों के आधार पर तय नहीं करना चाहिए. इससे से कानून की आत्मा ही खत्म हो जाएगी. कोर्ट ने कहा कि 20-24 सप्ताह के बीच का गर्भ रखने वाली सिंगल या अविवाहित गर्भवती महिलाओं को गर्भपात करने से रोकना, जबकि विवाहित महिलाओं को ऐसी स्थिति में गर्भपात की अनुमति देना संविधान के अनुच्छेद 14 की आत्मा का उल्लंघन होगा.


कोर्ट के अनुसार महिला की वैवाहिक स्थिति उससे एक अवांछित गर्भ को खत्म करने के अधिकार को नहीं छीन सकती है. महिला चाहे विवाहित है या फिर अविवाहित उसे MTP एक्ट के तहत 24 हफ्ते तक के गर्भ को गर्भपात कराने का अधिकार उसे है.

महिलाओं के यौन अधिकारों की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गर्भपात कानूनों के तहत विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच का अंतर "कृत्रिम और संवैधानिक रूप से अस्थिर" है और इस रूढ़ि को कायम रखता है कि केवल विवाहित महिला ही यौन रूप से सक्रिय होती है. SC ने कहा है कि प्रजनन अधिकारों का दायरा महिलाओं के बच्चे पैदा करने या न करने के अधिकार तक ही सीमित नहीं है. इसमें स्वतंत्रता का पक्ष भी शामिल है जो महिलाओं को अपने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित सभी मामलों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बनाता है. 

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अदालत ने कहा कि प्रजनन अधिकार में शिक्षा का अधिकार और गर्भनिरोधक और यौन स्वास्थ्य के बारे में जानकारी शामिल है, यह तय करने का अधिकार कि कौन से गर्भ निरोधकों का उपयोग करना है, यह चुनने का अधिकार कि कब बच्चे पैदा करना है, कितने बच्चे पैदा करना है, सुरक्षित और कानूनी गर्भपात का अधिकार भी शामिल है. इन अधिकारों से संबंधित निर्णय लेने के लिए महिलाओं को भी स्वायत्तता होनी चाहिए. 

मैरिटल रेप भी रेप की कैटेगरी में आएगा

अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि MTP एक्ट के दायरे में वैवाहिक रेप भी आएगा. इस पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने कहा विवाहित महिलाएं भी सेक्सुअल असॉल्ट से पीड़ित की कैटेगरी में आ सकती हैं. अदालत ने कहा कि एक महिला अपने पति के साथ गैर सहमति से बने  यौन संबंधों की वजह से गर्भवती हो सकती है. ऐसी महिलाएं   MTP एक्ट Rule 3B(a) के दायरे में आएंगी. ऐसी विवाहित महिलाएं 24 हफ्ते तक के गर्भ का गर्भपात MTP एक्ट के तहत करवा सकती हैं. 

अदालत ने कहा कि करीबी पार्टनर द्वारा हिंसा वास्तविकता है. और यौन व्यवहारों के दौरान ये हिंसा रेप का रूप ले सकती है. ये गलत धारणा है कि सेक्स और लिंग से जुड़ी हिंसा के लिए सिर्फ अजनबी ही जिम्मेदार हैं. 

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नाबालिग लड़कियों के अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नाबालिग लड़की सहमति से संबंध बनाती है और उसे 24 सप्ताह के अंदर ही गर्भपात कराने की नौबत आती है तो वो ऐसा करा सकती है. नाबालिगों की पहचान सुरक्षित रखने के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया है कि डॉक्टर उसकी पहचान को जाहिर नहीं कर सकते हैं. 

 

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