शाहजहां बनते ही लुटा दिए थे करोड़ों, दान में दे दिए थे लाखों बीघा जमीन

जिस दिन शाहजहां गद्दी पर बैठा था. उस दिन ऐसा बड़ा जश्न मना कि तब करोड़ों रुपये सिर्फ दान में बांट दिए गए और लाखों बीघा जमीन भी लोगों को दान में दिया गया. गद्दी पर बैठने के बाद ही उसे शाहजहां नाम दिया गया.

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गद्दी पर बैठने का शाहजहां ने ऐसा जश्न मनाया जैसा किसी मुगल बादशाह ने पहले कभी नहीं किया होगा. (Photo - AI Generated) गद्दी पर बैठने का शाहजहां ने ऐसा जश्न मनाया जैसा किसी मुगल बादशाह ने पहले कभी नहीं किया होगा. (Photo - AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:23 PM IST

मुगल बादशाह शाहजहां को उनकी हुकूमत से ज्यादा उनके प्यार के लिए जाना जाता है. क्योंकि, उनकी प्यार की निशानी ताजमहल, जो उन्होंने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में बनवाया था. उनकी मोहब्बत की कहानी आज भी बयां करती है. ताजमहल के अलावा भी उसने कुछ ऐसे काम किए, जिसके बारे में काफी कम लोगों को पता है. 

शाहजहां का नाम खुर्रम था. पूरा नाम - शहाब-उद-दीन मुहम्मद खुर्रम था. शाहजहां उनका टाइटल था. जब वह गद्दी पर बैठा तब उन्हें यह टाइटल मिला. खुर्रम से शाहजहां बनने के जश्न उसने इस तरीके से मनाया जैसा शायद ही किसी मुगल बादशाह ने किया होगा.  

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4 लाख बीघा दान कर दिए थे
ज़फरनामा शाहजहां के मुताबिक, साल 1628 में 36 साल की उम्र में  शहाब-उद-दीन मुहम्मद खुर्रमने शाहजहां की उपाधि धारण की और गद्दी पर बैठे. आसिफ ख़ान उनके मंत्री बने. तब एक बड़ा जश्न मनाया गया. शाहजहां बनते ही बादशाह ने एक करोड़ अस्सी लाख रुपये नकद व माल के रूप में और चार लाख बीघा जमीन और एक सौ बीस गांव दान और ईनाम दिए."

इस खुशी में इसी तरह के समारोह बेगम मुमताज महल ने आयोजित करवाए.  उन्होंने जवाहरात, सोने और चांदी के फूल से शाहजहां की नजर उतारी और उसे दान कर दिया. 
बादशाह ने दो लाख अशर्फ़ियां और कुछ लाख रुपये मुमताज महल को दिए और दस लाख रुपये सालाना वजीफा तय किया. 

दूसरी बेगम साहिबा को एक लाख अशर्फी और चार लाख रुपये दिए गए और छह लाख रुपये सालाना तय  किए गए. मेहर शाही मुमताज महल को सौंप दी गई. इसके अलावा बहुत ज़्यादा आय वाली ज़मीने और संपत्तियां भी दी गईं.

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शाहजहां और मुमताज महल की शादी
शाहजहां और मुमताज महल की शादी का किस्सा भी काफी दिलचस्प है.  जहांगीर की पत्नी नूरजहां ने अपनी भतीजी के साथ शहज़ादा ख़ुर्रम की शादी तय की थी.  दरबारी ज्योतिषियों ने शादी के लिए जो शुभ तिथि चुनी थी. उसके लिए मंगनी के बाद पांच साल तक इंतजार करना पड़ा. साल 1607 में होने वाली मंगनी के बाद साल 1612 में दोनों की शादी ख़ूब शानो शौकत से हुई.

यह भी पढ़ें: क्यों शाहजहां ने नहीं की थी अपनी तीनों बेटियों की शादी? उन्हें कैसे रखता था

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुइन-उल-आसार में लिखा है कि शादी समारोह एतेमाद-उद-दौला मिर्ज़ा ग़यास के घर पर हुआ और उससे जुड़ी सारी रस्में वहीं निभाई गईं. जहांगीर ने ख़ुद दूल्हे की पगड़ी पर मोतियों का हार बांधा और मेहर की रकम 5 लाख रुपये तय की गई. ख़ुर्रम की उम्र बीस साल एक महीने आठ दिन थी और बेगम की उम्र उन्नीस साल और एक दिन थी.

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