आज भारत में आरक्षण को लेकर अक्सर बहस होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी कोटा सिस्टम लागू है? वहां भी लोगों को रिजर्वेशन का लाभ दिया जाता है, लेकिन वहां का कोटा सिस्टम कास्ट बेस्ड नहीं है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर वहां किस आधार पर रिजर्वेशन लागू है.
पाकिस्तान में आरक्षण जाति के बजाय क्षेत्र, प्रांत और शहरी-ग्रामीण आधार पर दिया जाता है. यह व्यवस्था आज की नहीं, बल्कि देश बनने के तुरंत बाद शुरू हो गई थी. आइए जानते हैं कि पाकिस्तान का कोटा सिस्टम कैसे काम करता है और इसे क्यों लागू किया गया था.
पाकिस्तान में सरकारी नौकरियों और सिविल सेवाओं में कोटा सिस्टम की शुरुआत 1948 में हुई थी. उस समय देश के अलग-अलग हिस्सों को उनकी आबादी और राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सरकारी सेवाओं में हिस्सेदारी दी गई थी.
शुरुआत में किसे कितना मिला था?
पाकिस्तान बनने के बाद उस समय के पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 56.75 फीसदी थी. इसके बावजूद उसे सरकारी सेवाओं में केवल 42 फीसदी हिस्सा दिया गया. यही असंतोष बाद में पूर्वी पाकिस्तान और केंद्र सरकार के बीच तनाव की एक वजह भी बना.
इसी तरह 1951 में कराची की आबादी करीब 10 लाख थी, लेकिन उसे सरकारी नौकरियों में सिर्फ 2 फीसदी कोटा मिला. वहीं देश विभाजन के बाद पाकिस्तान पहुंचे प्रवासियों के लिए 15 फीसदी कोटा तय किया गया.
पंजाब को उसकी लगभग 28 फीसदी आबादी के मुकाबले 24 फीसदी हिस्सा मिला, जबकि अन्य प्रांतों और पूर्व रियासतों को कुल मिलाकर 17 फीसदी कोटा दिया गया.
1949 में आया नया नियम
पाकिस्तान के ट्रिब्यून एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 1949 में कोटा सिस्टम में बदलाव किया गया और पहली बार 20 फीसदी सीटें 'मेरिट' यानी योग्यता के आधार पर भरने का प्रावधान किया गया. इसके बाद 1956 के संविधान में इस व्यवस्था को अगले 15 वर्षों के लिए जारी रखा गया. 1962 के संविधान में भी इसे बरकरार रखा गया.
सिंध में क्यों बना ग्रामीण और शहरी कोटा?
बाद में जनरल याह्या खान के शासनकाल में सिंध प्रांत के लिए अलग व्यवस्था बनाई गई. इसमें सरकारी नौकरियों में ग्रामीण सिंध को 60 फीसदी और शहरी सिंध को 40 फीसदी प्रतिनिधित्व दिया गया.
1973 के संविधान में पहले से लागू कोटा सिस्टम को कानूनी संरक्षण दिया गया और विभिन्न प्रांतों की हिस्सेदारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया. इसी दौरान उत्तरी क्षेत्र, फाटा और आजाद कश्मीर को भी कोटा सूची में शामिल किया गया.कराची का अलग कोटा खत्म कर उसे शहरी सिंध में मिला दिया गया.
महिलाओं और दिव्यांगों को भी मिला आरक्षण
1990 के दशक में पाकिस्तान ने महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए भी सरकारी सेवाओं में विशेष कोटा लागू किया. इसके बाद कोटा सिस्टम सिर्फ क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा.
क्या अब यह व्यवस्था पुरानी पड़ रही है?
कई विशेषज्ञों का मानना है कि विशेष रूप से सिंध में ग्रामीण और शहरी कोटे का अंतर अब खत्म कर देना चाहिए. फेडरल प्रतियोगी परीक्षाओं के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कई वर्षों में ग्रामीण सिंध के उम्मीदवारों का प्रदर्शन शहरी सिंध के मुकाबले बेहतर रहा है.
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2009 से 2015 के बीच ग्रामीण सिंध से परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों में 7 से 12 फीसदी तक अभ्यर्थी अंतिम रूप से सफल हुए. वहीं शहरी सिंध में यह आंकड़ा कई वर्षों में 3 से 8 फीसदी के बीच ही रहा. मतलब ग्रामीण सिंध से सिविल सर्विस पास करने वाले उम्मीदवारों का अनुपात शहरी सिंध की तुलना में बेहतर है.
बड़ी संख्या में खाली रह जाती हैं सीटें
आंकड़े यह भी बताते हैं कि सिंध में कोटा होने के बावजूद बड़ी संख्या में सरकारी पद खाली रह जाते हैं.2005 में 25 में से 20 सीटें खाली रहीं. 2008 में 99 में से 88 सीटें नहीं भर सकीं. 2010 में 66 में से 57 सीटें खाली रहीं. 2015 में 95 में से 31 पद खाली रह गए.इन खाली पदों में बड़ी संख्या शहरी सिंध के हिस्से की रही.
आखिर क्यों लागू किया गया था कोटा सिस्टम?
पाकिस्तान में कोटा सिस्टम का मूल उद्देश्य देश के अलग-अलग क्षेत्रों को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देना था, ताकि अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों के लोगों को भी अवसर मिल सकें.
हालांकि समय के साथ इस व्यवस्था को लेकर बहस बढ़ी है. कुछ लोग इसे क्षेत्रीय संतुलन के लिए जरूरी मानते हैं, जबकि दूसरे पक्ष का तर्क है कि अब ज्यादा जोर योग्यता आधारित चयन पर होना चाहिए.
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फिलहाल पाकिस्तान में कोटा सिस्टम देश की प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है और यह आज भी सरकारी नौकरियों में भर्ती को प्रभावित करता है. पाकिस्तान की सैन्य और नागरिक दोनों सरकारों द्वारा अपनाई गई और विभिन्न संविधानों के तहत बनाई गई नीतियों में अब वहां क्षेत्र के आधार पर रिजर्वेशन का सिस्टम लागू है.
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