यहां शव को काटकर गिद्धों को खिलाते हैं, ऐसे करते हैं अंतिम संस्कार

भारत के पड़ोस में एक ऐसा इलाका है, जहां मौत के बाद शव को गिद्धों के हवाले कर दिया जाता है. इससे पहले शव को छोटे- छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. इस रस्म को वहां के लोग काफी पवित्र मानते हैं.

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मृतक की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है ऐसा अंतिम संस्कार (Photo - AI Generated) मृतक की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है ऐसा अंतिम संस्कार (Photo - AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:06 PM IST

दुनिया में अंतिम संस्कार के कई तरीके हैं. कहीं शव को जलाया जाता है, कहीं दफनाया जाता है और कहीं समुद्र में प्रवाहित किया जाता है. लेकिन भारत के करीब एक ऐसा इलाका भी है, जहां मौत के बाद शव को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर गिद्धों के सामने छोड़ दिया जाता है. इतना ही नहीं, उससे पहले शव को काटा भी जाता है ताकि पक्षी उसे आसानी से खा सकें.

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पहली नजर में यह परंपरा बेहद अजीब और डरावनी लग सकती है, लेकिन वहां के लोगों के लिए यह एक पवित्र धार्मिक रस्म है. उनका मानना है कि इससे मृत व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति मिलती है और वह अगले जन्म की यात्रा पर निकल जाती है.

आखिर कहां निभाई जाती है यह परंपरा?
यह परंपरा तिब्बत में निभाई जाती है. इसे 'स्काई बुरियल' या 'आकाशीय अंतिम संस्कार' कहा जाता है. तिब्बती बौद्ध धर्म में यह सदियों पुरानी परंपरा है और आज भी कई इलाकों में इसका पालन किया जाता है.

तिब्बत के लोगों का मानना है कि मृत्यु के बाद शरीर सिर्फ एक खाली खोल रह जाता है. आत्मा शरीर छोड़ चुकी होती है, इसलिए शरीर को प्रकृति को लौटा देना सबसे बड़ा दान माना जाता है.

मौत के बाद क्या किया जाता है?
किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद उसके शव को सफेद कपड़े में लपेटकर घर के एक कोने में रखा जाता है. आमतौर पर तीन से पांच दिन तक शव वहीं रहता है.

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इस दौरान बौद्ध भिक्षु और लामा धार्मिक मंत्रों का जाप करते हैं. माना जाता है कि इससे मृतक की आत्मा को शांति मिलती है और उसे स्वर्ग की ओर जाने का रास्ता मिलता है.

फिर पहाड़ों पर ले जाया जाता है शव
शुभ दिन तय होने के बाद शव को पहाड़ों में बने विशेष स्काई बुरियल स्थल पर ले जाया जाता है. ये जगहें आमतौर पर आबादी से काफी दूर होती हैं. अंतिम संस्कार से पहले शव को भ्रूण जैसी मुद्रा में मोड़ा जाता है. यानी शरीर को इस तरह रखा जाता है जैसे कोई बच्चा मां के गर्भ में होता है. सुबह-सुबह शव को पहाड़ की चोटी पर पहुंचाया जाता है, जहां विशेष रूप से प्रशिक्षित लोग इस रस्म को पूरा करते हैं.

क्यों काटा जाता है शव?
स्काई बुरियल का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यहीं से शुरू होता है. विशेष कर्मकांड करने वाले लोग शव को छोटे-छोटे हिस्सों में काटते हैं ताकि गिद्ध उसे आसानी से खा सकें.

इसके बाद आसपास मौजूद गिद्धों को बुलाया जाता है. कुछ ही देर में दर्जनों गिद्ध वहां पहुंच जाते हैं और शव को खा जाते हैं.जब शरीर का मांस खत्म हो जाता है, तब बची हुई हड्डियों को पीसकर जौ के आटे (त्साम्पा) के साथ मिलाया जाता है और गिद्धों को खिला दिया जाता है.

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गिद्धों को इतना महत्व क्यों दिया जाता है?
तिब्बती बौद्ध धर्म में गिद्धों को पवित्र पक्षी माना जाता है. लोगों का विश्वास है कि यदि गिद्ध शव को पूरी तरह खा लें तो इसका मतलब है कि मृत व्यक्ति ने अच्छा जीवन जिया था और उसकी आत्मा को शांति मिल गई है.वहां के लोग गिद्धों को धरती और स्वर्ग के बीच संदेशवाहक की तरह देखते हैं, जो आत्मा को अगले संसार तक पहुंचाने में मदद करते हैं.

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ऐसे अंतिम संस्कार के रस्म के पीछे धार्मिक मान्यताओं के अलावा भौगोलिक हलाात भी एक बड़ी वजह बताई जाती है. तिब्बत का बड़ा हिस्सा ऊंचे पहाड़ों और चट्टानी जमीन से घिरा हुआ है.ऐसी जगहों पर कब्र खोदना बेहद मुश्किल होता है. वहीं लकड़ी की कमी के कारण शवों का दाह संस्कार करना भी आसान नहीं होता. इसलिए सदियों पहले यह परंपरा विकसित हुई और बाद में धार्मिक विश्वासों का हिस्सा बन गई.

इस रस्म को देखने की इजाजत नहीं होती
स्काई बुरियल को बेहद पवित्र माना जाता है. यही वजह है कि बाहरी लोगों और पर्यटकों को इस समारोह में शामिल होने की अनुमति नहीं होती. यहां तक कि मृतक के परिवार के सदस्य भी आमतौर पर अंतिम प्रक्रिया के दौरान मौजूद नहीं रहते. माना जाता है कि किसी बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी आत्मा की यात्रा में बाधा डाल सकती है.

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दुनिया के कई हिस्सों में अंतिम संस्कार के अलग-अलग तरीके हैं, लेकिन तिब्बत का स्काई बुरियल सबसे अनोखी और रहस्यमयी परंपराओं में गिना जाता है.जहां अधिकांश लोग मौत के बाद शव को मिट्टी या अग्नि को सौंपते हैं, वहीं तिब्बत में उसे आकाश के जीवों यानी गिद्धों को समर्पित कर दिया जाता है. वहां के लोगों के लिए यह सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र को स्वीकार करने का एक आध्यात्मिक तरीका है.

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