सोचिए, अगर किसी देश में महिलाओं के लिए सबसे जरूरी चीजों में से एक सैनेटरी पैड को ही बैन कर दिया जाए तो क्या होगा? और अगर इसकी वजह यह बताई जाए कि विद्रोही लड़ाके इसका इस्तेमाल फर्स्ट एड के लिए कर सकते हैं, तो शायद यकीन करना भी मुश्किल हो जाए. लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश है, जहां फिलहाल यही हो रहा है.
यह फैसला लाखों महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है. कई महिलाएं अब पुराने कपड़ों, पत्तों और यहां तक कि अखबारों का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं. इससे संक्रमण और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है.
आखिर कौन सा है यह देश?
यह देश है म्यांमार. दक्षिण-पूर्व एशिया का यह देश 2021 में सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा किए जाने के बाद से लगातार गृहयुद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहा है. सेना और विद्रोही समूहों के बीच संघर्ष जारी है और इसी संघर्ष के बीच अब सैनेटरी पैड भी विवाद का विषय बन गए हैं.
द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि म्यांमार की सैन्य सरकार ने कई इलाकों में सैनेटरी पैड की सप्लाई रोक दी है. सरकार का तर्क है कि विद्रोही संगठन और पीपुल्स डिफेंस फोर्स (PDF) के लड़ाके इनका इस्तेमाल घायल लोगों के इलाज, खून रोकने और जूतों में लगाने के लिए कर सकते हैं.
विशेषज्ञ बोले- यह तर्क बिल्कुल गलत
हालांकि मेडिकल एक्सपर्ट्स इस दावे को बेतुका बता रहे हैं. मेडिकल सहायता से जुड़ी संस्थाओं का कहना है कि सैनेटरी पैड गोली लगने या गंभीर घावों के इलाज के लिए उपयुक्त नहीं होते.
विशेषज्ञों के मुताबिक, पैड न तो घाव पर ठीक से टिक पाते हैं और न ही इतने खून को नियंत्रित कर सकते हैं कि उन्हें युद्धक्षेत्र में प्रभावी फर्स्ट एड माना जाए.
महिलाओं के सामने खड़ी हो गई नई मुसीबत
सैनेटरी पैड की कमी का सबसे बड़ा असर महिलाओं और किशोरियों पर पड़ रहा है. कई इलाकों में महिलाएं मजबूरी में कपड़े के टुकड़े, पत्ते और अखबार जैसी असुरक्षित चीजों का इस्तेमाल कर रही हैं.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI), रिप्रोडक्टिव सिस्टम से जुड़ी बीमारियां और कई अन्य संक्रमण हो सकते हैं. पहले से कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था वाले देश में इन बीमारियों का इलाज भी आसान नहीं है.
तीन गुना तक बढ़ गई कीमत
जहां सैनेटरी पैड उपलब्ध हैं, वहां उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पैकेट की कीमत 3,000 क्यात से बढ़कर 9,000 क्यात तक पहुंच गई है. यह रकम म्यांमार के न्यूनतम दैनिक वेतन से भी ज्यादा है.ऐसे में गरीब परिवारों की महिलाओं के लिए सैनेटरी पैड खरीदना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है.
क्या महिलाओं को घरों तक सीमित करना है मकसद?
महिला अधिकार संगठनों का मानना है कि यह सिर्फ सप्लाई रोकने का मामला नहीं है. उनका आरोप है कि सरकार महिलाओं की आवाजाही और सार्वजनिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी को सीमित करना चाहती है.
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कई महिलाओं ने बताया है कि पैड की कमी और पीरियड्स के दौरान होने वाली परेशानियों की वजह से वे घर से बाहर निकलने से बच रही हैं. इससे उनकी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी कमी आ रही है.
संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा मामला
स्थानीय महिला संगठनों ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचाया है. उनका कहना है कि सैनेटरी पैड जैसी बुनियादी जरूरत की चीज पर रोक लगाना मानवाधिकारों का उल्लंघन है.
कार्यकर्ताओं का कहना है कि युद्ध और राजनीतिक संघर्ष का सबसे ज्यादा खामियाजा आम नागरिकों, खासकर महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है. एक तरफ देश गृहयुद्ध से जूझ रहा है, दूसरी तरफ महिलाओं को अपनी सबसे बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.
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म्यांमार का यह मामला दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि शायद ही किसी ने सोचा होगा कि किसी देश में सैनेटरी पैड जैसी सामान्य चीज भी कभी राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्ध रणनीति का हिस्सा बना दी जाएगी.
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