दिल्ली का जंतर-मंतर... आज जब भी किसी बड़े प्रदर्शन, धरने या आंदोलन की बात होती है तो सबसे पहले इसी जगह का नाम सामने आता है. कभी किसान, कभी पहलवान, कभी छात्र तो कभी राजनीतिक संगठन—अलग-अलग मुद्दों को लेकर यहां प्रदर्शन होते रहे हैं. हाल में 'कॉकरोच जनता पार्टी' यानी CJP के प्रदर्शन ने एक बार फिर जंतर-मंतर को चर्चा में ला दिया.
लेकिन क्या जंतर-मंतर हमेशा से दिल्ली का सबसे बड़ा प्रदर्शन स्थल था? जवाब है- नहीं. एक समय था जब दिल्ली में बड़े आंदोलन जंतर-मंतर पर नहीं, बल्कि बोट क्लब* के आसपास हुआ करते थे.
बोट क्लब संसद और नॉर्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक के बेहद करीब है. राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और संसद भवन, सबकुछ बोट क्लब से सटे हुए हैं. इस वजह से यह जगह प्रदर्शनकारियों के लिए काफी अहम थी. फिर ऐसा क्या हुआ कि बोट क्लब से प्रदर्शनों का ठिकाना जंतर-मंतर पहुंच गया?
पहले बोट क्लब पर जुटती थी बड़ी भीड़
आज जिस जंतर-मंतर को प्रदर्शन की जगह के तौर पर जाना जाता है, वहां 1990 के दशक की शुरुआत से पहले ऐसी हलचल नहीं होती थी. उस दौर में दिल्ली में बड़े प्रदर्शन के लिए बोट क्लब एक प्रमुख जगह थी. बोट क्लब की पहचान सबसे ज्यादा 1988 के किसान आंदोलन से बनी.
25 अक्टूबर से शुरू हुए इस आंदोलन में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की अगुआई में करीब 5 लाख किसान दिल्ली पहुंचे थे. करीब एक हफ्ते तक किसानों ने बोट क्लब के लॉन पर डेरा डाले रखा. इतनी बड़ी संख्या में किसानों के पहुंचने से राजधानी के बीचोबीच, राजनीतिक और रणनीतिक महत्व वाला ये पूरा इलाका अस्त- व्यस्त हो गया था. जब तक आंदोलन चला, तब तक दिल्ली की पूरी ट्रैफिक चौपट हो गई थी. एक साथ इतने सारे लोगों के डेरा डाल देने से आसपास का इलाका तहस- नहस हो गया था और गंदगी से भर चुका था.
यह प्रदर्शन इतना बड़ा था कि इसकी गूंज केंद्र सरकार तक पहुंची. आखिरकार राजीव गांधी सरकार की ओर से कुछ मांगों पर भरोसा दिए जाने के बाद किसानों ने अपना आंदोलन खत्म किया.लेकिन इस प्रदर्शन ने सरकारों को यह भी दिखा दिया कि संसद के इतने करीब बड़ी संख्या में लोगों का जुटना कितना बड़ा राजनीतिक दबाव बना सकता है.
फिर बोट क्लब पर प्रदर्शन क्यों बंद हुए?
इसके बाद देश में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन का दौर आया. पहले से ही बड़े किसान आंदोलन का सामना कर चुकी कांग्रेस सरकार ने बोट क्लब पर होने वाली सभाओं और प्रदर्शनों पर रोक लगा दी. सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला दिया. वहीं ऐसे महत्वपूर्ण इलाके में भीड़ को कंट्रोल करना भी काफी मुश्किल था.
सरकारों के सामने अब सवाल था कि राजधानी में विरोध-प्रदर्शन के लिए ऐसी जगह कहां हो, जहां लोगों को अपनी बात रखने का मौका भी मिले और भीड़ को नियंत्रित करना भी आसान हो.यहीं से जंतर-मंतर की कहानी शुरू होती है.
1993 के बाद जंतर-मंतर बना प्रदर्शन का ठिकाना
करीब 1993 से जंतर-मंतर धीरे-धीरे दिल्ली के प्रमुख प्रदर्शन स्थल के रूप में सामने आया. इसके पीछे एक बड़ी वजह इसकी लोकेशन थी. यह संसद से बहुत दूर नहीं था, लेकिन बोट क्लब की तरह यहां बहुत बड़ी भीड़ जमा करना आसान नहीं था. जंतर-मंतर के आसपास आने-जाने के मुख्य रास्ते भी सीमित थे. ऐसे में प्रशासन के लिए भीड़ को नियंत्रित करना आसान था.
यानी प्रदर्शनकारियों को दिल्ली के सत्ता केंद्र के करीब अपनी आवाज उठाने की जगह मिल गई और प्रशासन के लिए इसे संभालना भी आसान रहा. धीरे-धीरे जंतर-मंतर की पहचान ही ऐसी जगह के तौर पर बन गई, जहां देश के किसी भी हिस्से से आए लोग अपनी मांगों को लेकर धरना दे सकते थे.
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर भी लगी थी रोक
ऐसा नहीं है कि जंतर-मंतर को लेकर हमेशा सब कुछ सामान्य रहा हो. अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT ने यहां प्रदर्शन पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाया.
इसके पीछे स्थानीय लोगों की शिकायतें थीं. उनका कहना था कि प्रदर्शनों की वजह से शोर और गंदगी जैसी समस्याएं होती हैं. NGT ने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में भेजने की बात कही, जो जंतर-मंतर से करीब 4 किलोमीटर दूर है.
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि जंतर-मंतर को आधिकारिक तौर पर प्रदर्शन स्थल घोषित करने वाला कोई कार्यकारी आदेश नहीं है. दिल्ली के मास्टर प्लान में इस इलाके को रिहायशी क्षेत्र के तौर पर भी दिखाया गया था. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ.
जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब इलाके में प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक लगाने से इनकार कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि प्रदर्शनों के तरीके और वहां जुटने वाली भीड़ की संख्या को लेकर नियम बनाए जा सकते हैं. यानी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ.
आखिर जंतर-मंतर ही क्यों?
इसकी वजह सिर्फ इतिहास नहीं है. जंतर-मंतर संसद और दिल्ली के सत्ता केंद्र के करीब है. यहां प्रदर्शन करने से आंदोलनकारियों को अपनी आवाज देश के राजनीतिक केंद्र तक पहुंचाने का मौका मिलता है.
साथ ही, बोट क्लब के मुकाबले यहां भीड़ को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए आसान माना जाता रहा है. यही वजह है कि 1990 के दशक से जंतर-मंतर धीरे-धीरे दिल्ली में विरोध की आवाज उठाने वाली जगह बन गया.
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आज कोई छात्र अपनी परीक्षा से जुड़ी मांग लेकर यहां आता है, कोई किसान कर्ज और फसल का मुद्दा उठाता है, कोई सामाजिक कार्यकर्ता सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करता है तो कभी देश के बड़े खिलाड़ी भी न्याय की मांग लेकर यहां बैठते हैं.
यानी जंतर-मंतर हमेशा से प्रदर्शन की जगह नहीं था. पहले दिल्ली के बड़े आंदोलन बोट क्लब पर होते थे. लेकिन जब वहां प्रदर्शनों पर रोक और नियंत्रण बढ़ा, तो जंतर-मंतर ने धीरे-धीरे उस जगह की भूमिका संभाल ली.
और पिछले तीन दशकों में हुए बड़े आंदोलनों ने इसे सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक के पास की सड़क नहीं रहने दिया, बल्कि दिल्ली में विरोध और अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की सबसे पहचानी जाने वाली जगहों में शामिल कर दिया.
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