मेट्रो की तरह प्लेटफॉर्म के लेवल में क्यों नहीं होती रेलवे की ट्रेन?

रेलवे अब यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लिए हाई लेवल प्लेटफॉर्म बनाने पर जोर दे रहा है. साथ ही चलती ट्रेन में चढ़ने-उतरने से होने वाले हादसों को रोकने के लिए जागरूकता अभियान और अनाउंसमेंट भी किए जाते हैं.

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मेट्रो की तरह भारतीय रेलवे में ट्रेन और प्लेटफॉर्म का लेवल एक जैसा क्यों नहीं होता? ( Photo: ITG) मेट्रो की तरह भारतीय रेलवे में ट्रेन और प्लेटफॉर्म का लेवल एक जैसा क्यों नहीं होता? ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:35 PM IST

अगर आपने कभी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन पकड़ी है तो आपने एक बात जरूर महसूस की होगी. ट्रेन के कोच से नीचे उतरते समय प्लेटफॉर्म और ट्रेन के फर्श के बीच थोड़ा गैप रहता है. कई बार यह गैप इतना ज्यादा होता है कि यात्रियों को ट्रेन में चढ़ने या उतरने में परेशानी होती है. वहीं, मेट्रो में ट्रेन और प्लेटफॉर्म का लेवल लगभग बराबर दिखाई देता है. ऐसे में सवाल उठता है कि रेलवे की ट्रेन का फ्लोर प्लेटफॉर्म के बराबर क्यों नहीं होता?

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दरअसल, इसके पीछे रेलवे की व्यवस्था, अलग-अलग तरह के कोच और देशभर के स्टेशनों की अलग-अलग संरचना बड़ी वजह है. रेलवे स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म की ऊंचाई हर जगह एक जैसी नहीं होती. रेलवे के नियमों के मुताबिक अलग-अलग श्रेणी के स्टेशनों पर रेल लेवल, मीडियम लेवल और हाई लेवल प्लेटफॉर्म बनाए जाते हैं.

प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच गैप क्यों होता है?
भारतीय रेलवे का नेटवर्क बहुत बड़ा है और इसमें अलग-अलग समय में बनाए गए हजारों स्टेशन और कई तरह के कोच शामिल हैं. सभी ट्रेनों के कोच और सभी प्लेटफॉर्म की ऊंचाई हमेशा एक जैसी नहीं रही है. यही वजह है कि कई जगह ट्रेन के फर्श और प्लेटफॉर्म के बीच ऊंचाई का अंतर दिखाई देता है. रेलवे के मुताबिक अगर यात्री ट्रेन के पूरी तरह रुकने के बाद चढ़ते या उतरते हैं तो यह गैप अपने आप में दुर्घटना का कारण नहीं बनता. समस्या तब पैदा होती है जब यात्री चलती ट्रेन में चढ़ने या उतरने की कोशिश करते हैं. ऐसा करना बेहद खतरनाक हो सकता है.

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अब हाई लेवल प्लेटफॉर्म पर रेलवे का जोर
यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रेलवे ने अप्रैल 2018 में प्लेटफॉर्म की ऊंचाई से जुड़े नियमों में बदलाव किया था. इसके तहत ब्रॉड गेज रेलवे स्टेशनों पर हाई लेवल प्लेटफॉर्म बनाने का फैसला लिया गया. पहले हाई लेवल प्लेटफॉर्म की सुविधा मुख्य रूप से कुछ विशेष श्रेणी के स्टेशनों पर ही दी जाती थी. अब रेलवे की कोशिश है कि जरूरत के अनुसार ज्यादा से ज्यादा स्टेशनों पर हाई लेवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया जाए. रेलवे ने यह भी तय किया कि नए कामों में प्लेटफॉर्म को केवल मीडियम लेवल तक उठाने के बजाय हाई लेवल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दी जाएगी. साल 2018-19 में रेलवे ने सुरक्षा से जुड़े कामों के लिए 6,200 करोड़ रुपये के अंब्रेला वर्क्स को मंजूरी दी थी. इसमें फुट ओवरब्रिज और हाई लेवल प्लेटफॉर्म बनाने के काम भी शामिल थे.

यात्रियों को बार-बार दी जाती है चेतावनी
रेलवे स्टेशनों पर लगातार अनाउंसमेंट के जरिए यात्रियों से कहा जाता है कि वे चलती ट्रेन में चढ़ने या उतरने की कोशिश न करें. रेलवे समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाता है. इसके अलावा चलती ट्रेन में चढ़ने-उतरने, फुटबोर्ड पर यात्रा करने और ट्रेन की छत पर सफर करने जैसे खतरनाक तरीकों के खिलाफ अभियान चलाया जाता है. नियम तोड़ने वाले यात्रियों के खिलाफ रेलवे एक्ट, 1989 के तहत कार्रवाई भी की जा सकती है.

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मुंबई में प्लेटफॉर्म की ऊंचाई बढ़ाई गई
मुंबई के उपनगरीय रेलवे सेक्शन में ट्रेन और प्लेटफॉर्म के बीच ऊंचाई के अंतर को कम करने के लिए प्लेटफॉर्म की ऊंचाई बढ़ाने का फैसला भी लिया गया था. यहां यात्री प्लेटफॉर्म की ऊंचाई को 760-840 मिलीमीटर से बढ़ाकर 840-920 मिलीमीटर करने का काम किया गया. इस योजना के तहत सेंट्रल रेलवे के 83 प्लेटफॉर्म और वेस्टर्न रेलवे के 168 प्लेटफॉर्म को ऊंचा किया गया. इनमें चर्चगेट-विरार सेक्शन के 145 और विरार-दहानू रोड सेक्शन के 23 प्लेटफॉर्म शामिल थे. कुछ प्लेटफॉर्म को भविष्य की रेल परियोजनाओं के कारण नहीं उठाया जाना था.

फिर मेट्रो जैसा लेवल क्यों नहीं?
मेट्रो सिस्टम शुरू से ही एक खास डिजाइन और तय मानकों के हिसाब से बनाया जाता है. उसके स्टेशन, प्लेटफॉर्म और कोच एक-दूसरे के अनुरूप डिजाइन किए जाते हैं. इसके उलट भारतीय रेलवे का नेटवर्क बहुत पुराना और विशाल है. इसमें अलग-अलग समय पर बने स्टेशन, अलग-अलग ऊंचाई वाले प्लेटफॉर्म और कई तरह के कोच शामिल हैं. इसलिए रेलवे में हर जगह मेट्रो की तरह ट्रेन और प्लेटफॉर्म को बिल्कुल एक ही लेवल पर रखना आसान नहीं है. हालांकि रेलवे लगातार प्लेटफॉर्म की ऊंचाई बढ़ाने और यात्रियों की सुविधा व सुरक्षा बेहतर करने पर काम कर रहा है.

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