अगर कोई आपसे कहे कि आप किसी बड़े विदेशी जहाज में इस्तेमाल हुआ सोफा, बेड, कुर्सी, डाइनिंग टेबल, स्टील के बर्तन, एयर कंडीशनर, लकड़ी के दरवाजे, खिड़कियां, लाइट, फर्नीचर और यहां तक कि होटल जैसी सजावट का सामान भी खरीद सकते हैं, तो शायद आपको यकीन न हो. लेकिन भारत में एक ऐसी जगह है, जहां यह सब बिल्कुल संभव है. इस जगह का नाम है अलंग, जो गुजरात के भावनगर जिले में स्थित है. यह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग केंद्र माना जाता है.
जहाज से आखिर क्या-क्या निकलता है?
बहुत से लोग सोचते हैं कि पुराने जहाजों से सिर्फ लोहे का कबाड़ निकलता होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. एक बड़ा जहाज किसी चलती-फिरती इमारत या होटल से कम नहीं होता. इन जहाजों के अंदर बेडरूम, डाइनिंग हॉल, ऑफिस, रसोई, स्टोर रूम और रहने की पूरी व्यवस्था होती है. इसलिए जब इन्हें तोड़ा जाता है, तो इनमें से बड़ी मात्रा में उपयोगी सामान निकलता है.
इनमें मजबूत सोफा, बेड, कुर्सियां, डाइनिंग टेबल, अलमारी, सागौन की लकड़ी, दरवाजे, खिड़कियां, स्टील के बर्तन, एयर कंडीशनर, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, पंखे, लाइट, बिजली की फिटिंग, कारपेट, पर्दे, सीढ़ियां, पाइप, मशीनें और कई दूसरी चीजें शामिल होती हैं. खासकर विदेशी क्रूज जहाजों से निकला फर्नीचर काफी शानदार और मजबूत होता है. यही वजह है कि लोग इन्हें खरीदने के लिए दूर-दूर से अलंग पहुंचते हैं.
जहाज से निकला सामान इतना सस्ता क्यों बिकता है?
यह सवाल लगभग हर किसी के मन में आता है कि लाखों रुपये का सामान आखिर हजारों रुपये में कैसे मिल जाता है. असल वजह यह है कि जहाज मालिकों का मकसद पुराने फर्नीचर से कमाई करना नहीं होता. उनका मुख्य उद्देश्य जहाज को सुरक्षित तरीके से तोड़ना और उसमें मौजूद स्टील और दूसरी धातुओं को रीसाइक्लिंग के लिए तैयार करना होता है.
अगर जहाज से निकले फर्नीचर और दूसरी चीजों को लंबे समय तक गोदाम में रखा जाए, तो स्टोरेज और रखरखाव का खर्च बढ़ जाता है. इसलिए इन्हें जल्दी और कम कीमत पर बेच दिया जाता है. दूसरी वजह यह है कि यह सामान पहले इस्तेमाल किया जा चुका होता है. हालांकि इसकी क्वालिटी काफी अच्छी होती है, लेकिन सेकेंड हैंड होने की वजह से इसकी कीमत कम रखी जाती है. यही कारण है कि जहाज से निकला मजबूत और टिकाऊ सामान बाजार में नई कीमत से काफी कम दाम पर मिल जाता है,
कौन खरीदता है यह सामान?
अलंग में रोज देशभर से व्यापारी पहुंचते हैं. होटल, रेस्टोरेंट, रिसॉर्ट, फार्महाउस, ऑफिस, गोदाम और इंटीरियर डिजाइन से जुड़े लोग यहां से बड़ी मात्रा में सामान खरीदते हैं. इसके अलावा आम लोग भी यहां से फर्नीचर, लकड़ी, बर्तन और सजावट का सामान खरीदते हैं. दुकानदारों का कहना है कि कई ग्राहक खासतौर पर विदेशी जहाजों से निकला सामान ही मांगते हैं. उनका मानना होता है कि विदेशी जहाजों में इस्तेमाल हुआ फर्नीचर ज्यादा मजबूत और लंबे समय तक चलने वाला होता है.
सामान बेचने से पहले उसकी अच्छी तरह जांच की जाती है. जरूरत पड़ने पर उसे साफ किया जाता है, मरम्मत की जाती है और फिर बाजार में बेचा जाता है. जहाज से निकला सोफा, बेड, कुर्सी, फर्नीचर, बर्तन और दूसरी चीजें सस्ती इसलिए मिलती हैं क्योंकि उन्हें फेंकने के बजाय दोबारा इस्तेमाल के लिए बाजार में उतारा जाता है. गुजरात का अलंग इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा केंद्र है, जहां दुनिया भर से पुराने जहाज पहुंचते हैं. यहां जहाजों को वैज्ञानिक तरीके से तोड़ा जाता है, उपयोगी सामान अलग किया जाता है और फिर उसे नए रूप में बाजार तक पहुंचाया जाता है.
दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग देश
अलंग ने न सिर्फ भारत को दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग देश बनाया है, बल्कि हजारों लोगों को रोजगार दिया है, सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी की है, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया है और भारत की वैश्विक पहचान भी मजबूत की है. यही कारण है कि आज अलंग को सिर्फ शिप ब्रेकिंग यार्ड नहीं, बल्कि संसाधनों को नया जीवन देने वाली दुनिया की सबसे बड़ी रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री कहा जाता है.
एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में भारत ने जहाज रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. मेरिटाइम इंडिया विजन 2030 के तहत जो लक्ष्य वर्ष 2030 तक हासिल करना था, भारत ने उसे तय समय से पांच साल पहले ही पूरा कर लिया है. इस सफलता में सबसे बड़ी भूमिका गुजरात के अलंग शिप रीसाइक्लिंग यार्ड की रही है. आज भारत 35.4 प्रतिशत वैश्विक हिस्सेदारी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग देश बन चुका है.
संयुक्त राष्ट्र की व्यापार और विकास संस्था यूएनसीटीएडी (UNCTAD) के अनुसार, साल 2025 में भारत के शिप रीसाइक्लिंग सेक्टर में 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इतना ही नहीं, जहाजों को तोड़कर दोबारा इस्तेमाल करने की भारत की क्षमता भी 18.6 लाख ग्रॉस टन से बढ़कर 29.9 लाख ग्रॉस टन हो गई है. इसका मतलब है कि अब भारत पहले से कहीं अधिक पुराने जहाजों को सुरक्षित तरीके से रिसाइकिल कर सकता है.
आखिर अलंग क्यों है इतना खास?
गुजरात के भावनगर जिले में अरब सागर के किनारे स्थित अलंग पिछले कई दशकों से दुनिया भर के पुराने जहाजों का अंतिम ठिकाना बना हुआ है. यहां समुद्र का तट ऐसा है कि बड़े-बड़े जहाज आसानी से किनारे तक लाए जा सकते हैं. इसी वजह से दुनिया के कई देशों की शिपिंग कंपनियां अपने पुराने और रिटायर हो चुके जहाज अलंग भेजती हैं.
आज अलंग में 115 शिप रीसाइक्लिंग यार्ड काम कर रहे हैं. यहां हर साल सैकड़ों जहाजों को वैज्ञानिक तरीके से तोड़ा जाता है. पहले जहाज से ईंधन और खतरनाक पदार्थों को सुरक्षित तरीके से निकाला जाता है. इसके बाद स्टील, मशीनें, पाइप, फर्नीचर, लकड़ी, बिजली का सामान, केबल और दूसरी उपयोगी चीजों को अलग किया जाता है ताकि उनका दोबारा इस्तेमाल किया जा सके.
अलंग का कारोबार कितना बड़ा है?
अलंग सिर्फ जहाज तोड़ने की जगह नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में से एक बन चुका है. जब यहां काम पूरी क्षमता से चलता है, तो इसका सालाना कारोबार करीब 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है. इतना ही नहीं, इस उद्योग से सरकार को हर साल करीब 1,500 से 1,600 करोड़ रुपये का राजस्व भी मिलता है.
इसके अलावा शिप रीसाइक्लिंग से जुड़े कई दूसरे उद्योग भी चलते हैं. जहाज से निकला स्टील स्टील फैक्ट्रियों में जाता है. लकड़ी फर्नीचर उद्योग में इस्तेमाल होती है. मशीनें और उपकरण दोबारा बेचे जाते हैं. इससे पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है.
हजारों लोगों को मिला रोजगार
अलंग की सबसे बड़ी ताकत इसका रोजगार है. यहां 15,000 से 20,000 लोग सीधे शिप रीसाइक्लिंग उद्योग में काम करते हैं. इसके अलावा अलंग के आसपास करीब 10 किलोमीटर के इलाके में हजारों छोटे व्यापारी जहाजों से निकला सामान खरीदकर उसे नया रूप देते हैं. कोई लकड़ी बेचता है, कोई फर्नीचर की मरम्मत करता है, कोई मशीनें ठीक करता है और कोई पुराने सामान को सजाकर दोबारा बाजार में बेचता है. इस तरह यह उद्योग लाखों लोगों की आजीविका का सहारा बन चुका है.
यह सिर्फ रीसाइक्लिंग नहीं, चीजों को नया जीवन देना है. अलंग से जुड़े उद्योगपति इस काम को सिर्फ जहाज तोड़ना नहीं मानते. उनका कहना है कि यह रीसाइक्लिंग नहीं, बल्कि चीजों का रीइनकारनेशन है. जहाज से निकलने वाली लगभग हर उपयोगी चीज का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है. यही वजह है कि यहां निकलने वाला कचरा 0.05 प्रतिशत से भी कम रहता है. दूसरे शब्दों में कहें तो जहाज का लगभग हर हिस्सा किसी न किसी रूप में दोबारा उपयोग में आ जाता है.
पर्यावरण की सुरक्षा पर भी पूरा ध्यान
पहले जहाज तोड़ने के काम को प्रदूषण फैलाने वाला उद्योग माना जाता था, लेकिन अब हालात काफी बदल चुके हैं. भारत में शिप रीसाइक्लिंग अधिनियम, 2019 लागू है. इसके तहत जहाजों को तोड़ते समय कर्मचारियों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सख्त नियमों का पालन करना जरूरी है.
इसके अलावा भारत हांगकांग इंटरनेशनल कन्वेंशन के मानकों का भी पालन कर रहा है. सरकार ने अलंग के आधुनिकीकरण पर करीब 53.5 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इससे यहां आधुनिक मशीनें, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और पर्यावरण अनुकूल सुविधाएं विकसित की गई हैं. इसी वजह से अब अलंग को दुनिया के सबसे सुरक्षित शिप रीसाइक्लिंग केंद्रों में गिना जाने लगा है.
यूरोप के जहाज भी अब अलंग आ रहे
बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन होने के कारण अब यूरोप के कई देश भी अपने पुराने जहाज अलंग भेज रहे हैं. पहले कई विदेशी कंपनियां भारत आने से हिचकिचाती थीं, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. अलंग की आधुनिक व्यवस्था ने विदेशी कंपनियों का भरोसा जीता है. आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से जहाज यहां रीसाइक्लिंग के लिए पहुंच रहे हैं.
कर्मचारियों को भी मिलती हैं बेहतर सुविधाएं
अलंग में काम करने वाले कई कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें कंपनी की ओर से रहने और खाने की सुविधा दी जाती है. उन्हें समय पर वेतन मिलता है. इसके अलावा साल में करीब 40 दिन की छुट्टी भी दी जाती है और इस दौरान उनका वेतन नहीं काटा जाता. कर्मचारियों को बोनस और दूसरी सुविधाएं भी मिलती हैं. यही वजह है कि हजारों परिवारों की रोजी-रोटी इस उद्योग से जुड़ी हुई है.
भारत की बढ़ती वैश्विक पहचान
आज अलंग सिर्फ गुजरात या भारत की पहचान नहीं रह गया है, बल्कि पूरी दुनिया में इसका नाम लिया जाता है. हरित और सुरक्षित शिप रीसाइक्लिंग तकनीक अपनाकर भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि पुराने जहाजों को भी पर्यावरण की सुरक्षा के साथ दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है. यही वजह है कि भारत आज 35.4 प्रतिशत वैश्विक हिस्सेदारी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग देश बन चुका है.
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