आज जब बारिश की पहली बूंद जमीन पर गिरती है, तो कहीं बच्चे भीगने के लिए छत पर दौड़ पड़ते हैं, कहीं किसान आसमान की ओर उम्मीद से देखते हैं और कहीं सड़कें पानी से भर जाती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि धरती पर पहली बारिश कैसी रही होगी? उस वक्त न कोई इंसान था, न पेड़-पौधे, न शहर और न ही बारिश को महसूस करने वाला कोई जीव. धरती खुद भी आज जैसी नहीं थी- चारों तरफ तपती चट्टानें, ज्वालामुखी और भाप का माहौल था. फिर इसी उबलती हुई धरती पर एक दिन आसमान से पानी की बूंदें गिरनी शुरू हुईं. लेकिन ये घटना आखिर कब हुई थी? क्या वैज्ञानिकों के पास धरती की पहली बारिश का कोई सबूत है? चलिए जानते हैं.
इस सवाल का जवाब करीब 4 अरब साल पुरानी एक बेहद छोटी सी चट्टान में छिपा मिला था. 2024 में सामने आई एक रिसर्च ने ऐसे सबूत दिए, जिनसे पता चलता है कि धरती के बेहद शुरुआती दौर में ही बारिश और मीठे पानी से जुड़ा वॉटर साइकल एक्टिव हो चुका था. यानी जिस बारिश को हम आज मौसम की सामान्य घटना समझते हैं, उसकी कहानी शायद धरती के इतिहास के बिल्कुल शुरुआती पन्नों में लिखी जा चुकी थी.
जब धरती एक तपता हुआ गोला थी
धरती का जन्म करीब 4.54 अरब साल पहले हुआ था. शुरुआत में यह आज की खूबसूरत नीली धरती जैसी बिल्कुल नहीं थी. इसकी सतह बेहद गर्म थी और जगह-जगह ज्वालामुखी सक्रिय थे. धरती के शुरुआती वातावरण में कई तरह की गैसें थीं. ज्वालामुखीय गतिविधियों के कारण बड़ी मात्रा में वॉटर वेपर भी वातावरण में पहुंचती रही. जब तापमान कम हुआ तो वातावरण में मौजूद वॉटर वेपर कंडेश्न्ड होने लगी. बादल बने और फिर पानी बूंदों के रूप में धरती की सतह पर गिरने लगा.यही वह प्रक्रिया थी, जिसने आगे चलकर अर्थ वॉटर साइकिल की नींव रखी.
लेकिन वैज्ञानिकों को कैसे पता चला?
यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है. 2024 में कर्टिन विश्वविद्यालय (Curtin University) समेत वैज्ञानिकों की एक इंटरनेशनल टीम ने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के जैक हिल्स (Jack Hills) इलाके से मिले बेहद पुराने जिरकॉन (Zircon) क्रिस्टल की स्टडी की. ये क्रिस्टल अरबों साल पुराने हैं और इनमें उस समय के वातावरण से जुड़े रासायनिक संकेत आज भी सुरक्षित हैं.
वैज्ञानिकों ने इन जिरकॉन क्रिस्टलों में मौजूद ऑक्सीजन आइसोटोप की स्टडी की. रिसर्च में ऐसे संकेत मिले जो बताते हैं कि करीब 4 अरब साल पहले धरती की सतह पर मीठा पानी मौजूद था और वह चट्टानों के साथ संपर्क में था. इसका मतलब यह हुआ कि उस समय तक धरती पर सिर्फ पानी ही नहीं था, बल्कि वॉटर साइकिल जैसे प्रोसेस भी शुरू हो चुके थे. यह रिसर्च जून 2024 में नेचर जियोसाइंस (Nature Geoscience) में प्रकाशित हुई थी.
वैज्ञानिकों के पास ऐसी कोई बूंद नहीं है जिसे देखकर वे कह सकें कि यही धरती पर गिरी पहली बारिश की बूंद थी. लेकिन पुराने जिरकॉन में मिले ऑक्सीजन आइसोटोप के संकेत बताते हैं कि करीब 4 अरब साल पहले या उससे भी पहले बारिश से जुड़ा वॉटर साइकिल सक्रिय रहा होगा. रिसर्च के मुताबिक, मीठे पानी का धरती की उभरी हुई महाद्वीपीय सतह (Continental Surface ) से संपर्क करीब 4 अरब साल पहले शुरू हो चुका था.
यानी जिस बारिश को हम आज रोजमर्रा की चीज समझते हैं, उसकी कहानी शायद धरती के इतिहास के बिल्कुल शुरुआती दौर में ही शुरू हो गई थी.
बारिश हुई तो समुद्र कैसे बने?
अब अगला सवाल आता है कि इतना पानी आया कहां से? शुरुआती धरती पर ज्वालामुखीय गतिविधियों से वॉटर वेपर वातावरण में पहुंचती रही. इसके अलावा पानी से भरपूर एस्टेरॉइड और शुरुआती सोलर सिस्टम के दूसरे पिंडों ( Celestial object) ने भी धरती के जल भंडार ( water reservoir) में योगदान दिया हो सकता है. जब धरती ठंडी हुई और बारिश शुरू हुई, तो पानी चट्टानों, गड्ढों और निचले इलाकों में जमा होने लगा. इसके बाद समय बीतता गया. बारिश होती रही, पानी बहता रहा और धरती के अलग-अलग हिस्सों में जल स्रोत बनते गए. धीरे-धीरे बड़े जल निकाय विकसित हुए और आगे चलकर समुद्रों और महासागरों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई.
पहली बारिश सिर्फ बारिश नहीं थी
सबसे दिलचस्प बात यह है कि धरती पर बारिश सिर्फ पानी लेकर नहीं आई थी. पानी ने आगे चलकर जीवन के लिए जरूरी परिस्थितियां बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. 2024 की रिसर्च में भी वैज्ञानिकों ने बताया कि शुरुआती धरती पर महाद्वीपीय सतह, मीठे पानी और वॉटर साइकिल की मौजूदगी ने जीवन के लिए अनुकूल वातावरण बनने में मदद की हो सकती है.
सोचिए, आज जिस बारिश में हम छाता लेकर निकलते हैं, उसकी जड़ें करीब 4 अरब साल पुराने उस दौर में छिपी हैं, जब धरती पर जीवन का नामोनिशान तक नहीं था. तब आसमान से गिरने वाली पहली बूंद को देखने वाला कोई नहीं था. लेकिन वही पानी धीरे-धीरे जमा हुआ, समुद्र बने, वॉटर साइकिल चलता रहा और अरबों साल की इस लंबी कहानी के बाद धरती पर जीवन पनपा. यानी धरती की पहली बारिश सिर्फ आसमान से गिरा पानी नहीं थी. वह उस नीली धरती की शुरुआत थी, जिसे आज हम अपना घर कहते हैं.
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