Psychology Facts: सब दशहरा मेला घूमने जाते हैं, आपका मन घर पर ही लगता है? जानें इसकी वजह

दशहरा मेले में घूमने के बजाय घर पर रहना पसंद करने वाले लोग जरूरी नहीं कि बोरिंग या इंट्रोवर्ट हों. मनोविज्ञान के नजरिए से समझिए कि कुछ लोगों को भीड़ के बजाय घर की शांति क्यों पसंद आती है और अकेले समय बिताना उनके स्वभाव के बारे में क्या बताता है.

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अगर कोई व्यक्ति कभी-कभी बाहर जाने के बजाय घर पर रहना पसंद करता है, तो यह सामान्य बात हो सकती है. ( Photo: ITG) अगर कोई व्यक्ति कभी-कभी बाहर जाने के बजाय घर पर रहना पसंद करता है, तो यह सामान्य बात हो सकती है. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:06 PM IST

दशहरा आते ही बाजार सजने लगते हैं, जगह-जगह मेले लगते हैं और शाम होते ही परिवारों और दोस्तों की भीड़ सड़कों पर नजर आने लगती है. कोई रावण दहन देखने की तैयारी करता है, तो कोई मेले में झूले झूलने और चाट-पकौड़े खाने का प्लान बनाता है. लेकिन इसी बीच कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें बाहर जाने का खास मन नहीं करता. वे घर पर रहकर फिल्म देखना, पसंद का खाना खाना या बस आराम करना पसंद करते हैं.

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ऐसे लोगों को कई बार दोस्त और परिवार वाले कहते हैं कि तुम कहीं घूमने क्यों नहीं जाते, तुम्हें त्योहार मनाने का मन नहीं करता क्या? लेकिन हर बार घर पर रुकने की वजह आलस या लोगों से दूरी बनाना नहीं होती. कई बार इंसान की पसंद, मानसिक थकान और सुकून पाने का तरीका दूसरों से अलग होता है. सवाल यह है कि जो लोग दशहरा मेले की रौनक छोड़कर घर पर रहना पसंद करते हैं, उनके स्वभाव और भावनाओं के बारे में क्या समझा जा सकता है?

इन्हें भीड़ से ज्यादा सुकून पसंद हो सकता है
कुछ लोगों के लिए मेले की रौनक खुशी का कारण होती है, जबकि दूसरे लोगों को वही भीड़, शोर और भागदौड़ थका सकती है. वे त्योहार का आनंद तो लेना चाहते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि इसके लिए उन्हें घर से बाहर ही जाना पड़े. ऐसे लोग घर पर अपनी पसंद के म्यूजिक सुन सकते हैं, परिवार के साथ समय बिता सकते हैं या अकेले बैठकर आराम कर सकते हैं. उनके लिए खुशी का मतलब हर बार कुछ नया करना या लोगों के बीच मौजूद रहना नहीं होता. कई बार उन्हें अपने कमरे में बैठकर चाय पीने और मनपसंद फिल्म देखने में ही उतना सुकून मिल जाता है, जितना दूसरों को मेले में घूमकर मिलता है.

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क्या ऐसे लोग इंट्रोवर्ट स्वभाव के होते हैं?
साइकोलॉजी में  इंट्रोवर्ट स्वभाव यानी इंट्रोवर्जन का संबंध इस बात से है कि कोई व्यक्ति सामाजिक मेलजोल और अकेले समय बिताने को किस तरह अनुभव करता है. कुछ लोगों को लगातार लोगों के बीच रहने के बाद अकेले समय बिताना अच्छा लगता है. इससे उन्हें खुद को संभालने और दोबारा तरोताजा महसूस करने का मौका मिलता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि घर पर रहने वाला हर व्यक्ति  इंट्रोवर्ट स्वभाव का ही होता है.

कोई व्यक्ति दोस्तों के साथ घूमना पसंद कर सकता है, लेकिन किसी खास दिन थकान या दूसरी जिम्मेदारियों की वजह से बाहर न जाने का फैसला भी कर सकता है. इसलिए सिर्फ दशहरा मेला घूमने से मना करने पर किसी के स्वभाव के बारे में पक्का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा.

कभी-कभी घर पर रहना खुद को समय देने का तरीका होता है
दिनभर की नौकरी, घर की जिम्मेदारियां, पैसों की चिंता और लगातार भागदौड़ इंसान को मानसिक रूप से थका सकती हैं. ऐसे में त्योहार की छुट्टी मिलने पर हर कोई घूमने नहीं जाना चाहता. कुछ लोग बस चाहते हैं कि एक दिन उन्हें किसी चीज की जल्दी न हो और वे अपनी मर्जी से समय बिता सकें. ऐसे में घर पर रहना उनके लिए खुद को समय देने का तरीका हो सकता है. उन्हें हर वक्त खुश दिखने, दूसरों की योजनाओं में शामिल होने या यह साबित करने की जरूरत महसूस नहीं होती कि वे त्योहार का पूरा आनंद ले रहे हैं. कई बार इंसान को खुशी के लिए किसी बड़ी योजना की नहीं, बल्कि थोड़े आराम और मन की शांति की जरूरत होती है.

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अकेले रहना और अकेलापन महसूस करना अलग बातें हैं
यह इस विषय का सबसे अहम पहलू है. अपनी मर्जी से अकेले समय बिताना और मन से अकेला महसूस करना एक जैसी बातें नहीं हैं. साल 2022 में  PLOS ONE जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में रिसर्चर्स ने पाया कि अकेले समय बिताने का आनंद लेने और अकेले रहने की पसंद को एक ही चीज नहीं माना जा सकता. अध्ययन में यह भी सामने आया कि अकेले समय बिताने के अनुभव का संबंध व्यक्ति की अपनी पसंद और फैसले लेने की आजादी से हो सकता है. इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से घर पर रह रहा है और इससे खुश है, तो इसे परेशानी मानने की जरूरत नहीं है.

लेकिन अगर कोई व्यक्ति अंदर से अकेला महसूस करता है, लोगों से मिलना चाहता है और फिर भी किसी वजह से सबसे दूर रहता है, तो उसकी स्थिति अलग हो सकती है. इसलिए किसी की चुप्पी या घर पर रहने की आदत देखकर उसके मन की स्थिति का अंदाजा लगाना हमेशा आसान नहीं होता.

त्योहारों के दौरान सोशल मीडिया पर मेले की तस्वीरें, दोस्तों के वीडियो और परिवार के साथ घूमने की पोस्ट दिखाई देती हैं. इन्हें देखकर कुछ लोगों को लगता है कि हर कोई त्योहार का आनंद ले रहा है और वे ही घर पर बैठे हैं. लेकिन हर व्यक्ति का खुशी मनाने का तरीका अलग होता है. किसी को झूले पसंद हैं, किसी को खरीदारी करना अच्छा लगता है, तो किसी को घर पर परिवार के साथ बैठना. दूसरों की पसंद को अपनी खुशी का पैमाना बनाना जरूरी नहीं है. अगर कोई व्यक्ति घर पर रहकर खुश है, तो उसे सिर्फ इसलिए बाहर जाने की जरूरत नहीं कि बाकी लोग ऐसा कर रहे हैं. अपनी पसंद के हिसाब से फैसला लेना भी जरूरी है.

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कब घर पर रहने की आदत पर ध्यान देना चाहिए?
अगर कोई व्यक्ति कभी-कभी बाहर जाने के बजाय घर पर रहना पसंद करता है, तो यह सामान्य बात हो सकती है. लेकिन अगर वह पहले दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना पसंद करता था और अब लंबे समय तक हर किसी से दूरी बनाने लगा है, पहले पसंद आने वाली चीजों में भी दिलचस्पी नहीं लेता या लगातार उदास महसूस करता है, तो उसकी भावनाओं पर ध्यान देना जरूरी है.

ऐसी स्थिति में उससे यह पूछना ज्यादा मददगार हो सकता है कि वह कैसा महसूस कर रहा है, बजाय इसके कि उसे आलसी या लोगों से कटकर रहने वाला कह दिया जाए. जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना भी मददगार हो सकता है.

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