कुछ साल पहले की ही बात है जब मुझे दिल्ली-NCR से छुट्टियों में अपने घर, अल्मोड़ा (मनान) जाने के लिए न तो कोई दिन देखना पड़ता था और न ही कोई समय. जब मन किया, टैक्सी ली या बस पकड़ी और निकल पड़े पहाड़ों की ठंडी छांव में. लेकिन वक्त बदला, स्थितियां बदलीं और अब हालात ये हैं कि गांव जाने से पहले मुझे एक प्रॉपर 'रणनीति' बनानी पड़ती है.
बीते दो दिनों से बाबा नीब करौली जी के आश्रम कैंची धाम से हल्द्वानी और ऊपर पहाड़ की तरफ जाने वाले मार्ग से जो तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं, वे वाकई डरावने हैं. हल्द्वानी से पहाड़ की तरफ बढ़ते ही भीमताल, भवाली, निगलाट से लेकर कैंची धाम तक गाड़ियां रेंग रही हैं. ऐसे ही हालात काठगोदाम से ज्योलिकोट होते हुए नैनीताल जाने वाले रूट पर भी हैं. वहीं, पहाड़ से मैदान की तरफ उतरने वाले लोग भी कैंची से पहले घंटों से फंसे हुए हैं. इस लंबे जाम में मरीज, एंबुलेंस से लेकर, बुजुर्ग और छात्र तक बेबस हैं.
हालात की भयावहता का अंदाजा सोशल मीडिया पर अमित नाम के एक शख्स के दर्द से लगाया जा सकता है. उन्होंने लिखा- "मेरी 72 वर्षीय मां और 80 वर्षीय ताईजी दोपहर 12 बजे हल्द्वानी से अल्मोड़ा के लिए निकली थीं, लेकिन वे रात करीब 11:30 बजे तक केवल गरमपानी ही पहुंच पाईं." यानी जिस सफर में बमुश्किल 2 घंटे लगते थे, उसमें 11.30 घंटे लग गए. यही हाल पहाड़ से शहर की तरफ आने वालों का भी है.
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और यह सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि पहाड़ आने-जाने वाले हर शख्स की पीड़ा है. अब जब भी मैं दिल्ली से अल्मोड़ा के लिए निकलता हूं, तो मेरी पहली कोशिश यही होती है कि वीकेंड में ना जाऊं और वीक डे में जाऊं तो किसी भी हाल में सुबह 5 बजे से पहले 'कैंची धाम' पार कर लूं. इसी तरह जब गांव से वापस शहर लौट रहा होता हूं, तो परिजन और दोस्त बस यही कहते हैं, 'वीकेंड, शनिवार या रविवार को मत निकलना' और सुबह जितनी जल्दी हो सके, घर छोड़ दो.
यकीन मानिए, यह सिर्फ मेरी अकेले की कहानी नहीं है. अल्मोड़ा, रानीखेत, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जैसे इलाकों और सुदूर जिलों के हर उस बाशिंदे की यही व्यथा है, जिसका रास्ता इस मार्ग से होकर गुजरता है. यह एक ऐसा रूट है जिसे आप पहाड़ की लाइफलाइन भी कह सकते हैं, क्योंकि हल्द्वानी से पहाड़ की सप्लाई चैन इसी रास्ते से होकर गुजरती है.
'ओवरटूरिज्म से बढ़ रही दिक्कत?
तस्वीर का दूसरा पहलू भी बेहद चिंताजनक है. कैंची धाम के जाम का असर सिर्फ सड़क पर फंसे वाहनों तक सीमित नहीं है. गरमपानी, खैरना, छड़ा से लेकर लोधिया और अल्मोड़ा तक सड़क किनारे छोटे-छोटे कारोबार करने वाले लोगों का काम भी प्रभावित हो रहा है. घंटों जाम में फंसे रहने की वजह से लोग अब इस रूट को छोड़कर रामगढ़ और मुक्तेश्वर होते हुए निकल रहे हैं. यानी जिस पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा होना चाहिए, उसकी अव्यवस्था कहीं न कहीं उसी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगी है.
कैंची धाम के आसपास आज इस कदर अंधाधुंध कंक्रीट का जाल बिछ गया है कि कभी कल-कल बहने वाली शिप्रा नदी मानो कहीं खो सी गई है. इतना ही नहीं, कैंची से गरमपानी की ओर जाने वाले हाईवे पर, कोसी नदी के ठीक मुहाने पर एक बहुत बड़े भूभाग पर धड़ल्ले से निर्माण कार्य चल रहा है. पहाड़ का भूगोल समझने वाले जानते हैं कि यह कितनी बड़ी लापरवाही है. कल को अगर कोसी नदी ने कभी अपना रौद्र रूप धारण कर लिया, तो क्या तबाही मचेगी, इसकी कल्पना परे से है.
साफ कहें तो, कैंची धाम आज 'ओवरटूरिज्म' और ट्रैफिक जाम का सबसे बड़ा शिकार बन चुका है. विज्ञान कहता है कि हर जमीन, हर सड़क की एक वहन क्षमता होती है. कैंची मार्ग की क्षमता कब की दम तोड़ चुकी है, अब तो यह क्षमता से कई गुना ज्यादा 'ओवरलोड' हो चुका है. इस बोझ को कम करने के लिए भवाली सैनिटोरियम से एक बाईपास का काम बड़े जोर-शोर से शुरू तो हुआ था, लेकिन सिस्टम की सुस्ती देखिए कि वो आज तक पूरा नहीं हो पाया.
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हकीकत यह है कि कुमाऊं के पर्वतीय इलाकों में जाने के लिए कैंची मार्ग ही मेन रूट है. पहाड़ की पूरी अर्थव्यवस्था हल्द्वानी से चलती है. रोजमर्रा के खान-पान का सामान हो, सब्जियां-दूध हों या दवाइयां- सब इन्हीं रास्तों से ट्रकों के जरिए ऊपर पहुंचती हैं. सबसे दुखद यह है कि इस जाम में कई बार जिंदगी और मौत से जूझती एंबुलेंस भी फंसी देखी गई हैं. घंटों-घंटों तक गाड़ियां एक ही जगह रेंगती रहती हैं. सैलानियों और श्रद्धालुओं का रेला इस कदर लगा हुआ है कि अब आम लोग ही नहीं बल्कि स्थानीय उद्यमी भी परेशान हैं.
हर वीकेंड पहाड़ पर पड़ रहा भारी
इसी साल होली के लंबे वीकेंड में यहां क्या हाल हो गया था, वो सबने देखा. शनिवार और रविवार को कैंची धाम में ऐसा तांता लगा कि भीमताल तक गाड़ियों की लंबी कतारें खिंच गईं. रविवार सुबह 8 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक पहिये पूरी तरह थमे रहे, गाड़ियां बस रेंगती रहीं. लोग आस्था के नाम पर आ रहे हैं और फिल्म 'हनुमान अंश' के बाद वो आस्था ऐसी बढ़ी है श्रद्धालुओं का यहां तांता लगा हुआ है, लेकिन जो अव्यवस्था पीछे छोड़ जा रहे हैं, वो डराने वाली है. यह अब केवल गर्मियों की बात नहीं है बल्कि हर मौसम, हर वीकेंड में यही हाल है.
इस बात को नजरदांज नहीं कर सकते हैं कि कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता ने कुमाऊं में पर्यटन को नई रफ्तार दी है, लेकिन दूसरी तरफ इसके साथ पैदा हो रही चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. यह सिर्फ जाम की समस्या नहीं, बल्कि पहाड़ की पर्यावरणीय संवेदनशीलता, स्थानीय जनजीवन और उसकी सीमित वहन क्षमता से जुड़ा सवाल है. अगर समय रहते ट्रैफिक प्रबंधन, वैकल्पिक मार्ग, पार्किंग और निर्माण को लेकर ठोस व दीर्घकालिक नीति नहीं बनी, तो आने वाले वर्षों में हालात और बिगड़ सकते हैं. आस्था और पर्यटन का विस्तार जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत पहाड़ के सुकून, पर्यावरण और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी देकर नहीं चुकाई जा सकती.
किशोर जोशी