नजूल जमीन पर बने 3500 मकान, मस्जिद-मदरसे और बुलडोजर का डर.... कहानी बनभूलपुरा की! सुप्रीम कोर्ट में आज अहम फैसला

हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे की 78 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण को लेकर सुप्रीम कोर्ट आज फैसला सुनाएगा. इस जमीन पर करीब 50 हजार की आबादी बसी है. इसी साल फरवरी में ही अदालत ने इस जमीन पर रेलवे का मालिकाना हक बताया था. लेकिन स्थानीय लोग नजूल जमीन होने का दावा कर रहे हैं.

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बनभूलपुरा में SC के फैसले से पहले सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. (Photo- ITGD) बनभूलपुरा में SC के फैसले से पहले सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. (Photo- ITGD)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:09 AM IST

उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट आज फैसला सुनाएगा. इस फैसले से ठीक पहले इलाके में सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई है और पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो गया है. इस बीच, आइए जानते हैं कि ये पूरा मामला क्या है.

ये विवाद रेलवे की करीब 30 हेक्टेयर (लगभग 78 एकड़) जमीन पर बने हजारों मकानों और वहां रहने वाले करीब 50 हजार लोगों से जुड़ा है. मुस्लिम बहुल इस इलाके में 3500 से ज्यादा मकान, मदरसे और मस्जिद बने हुए हैं.

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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गौला नदी में अवैध खनन से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यहां से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे. हाईकोर्ट के फैसले के बाद रेलवे ने इस जमीन पर अपना मालिकाना हक जताते हुए लोगों को जगह खाली करने का नोटिस दिया.

(Photo- ITGD)

रेलवे के नोटिस के खिलाफ स्थानीय लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां हजारों परिवारों के पुनर्वास, मालिकाना हक और जमीन को लेकर लंबी कानूनी सुनवाई चल रही है.

रेलवे के दस्तावेज बनाम नजूल जमीन की दलील

मामले में रेलवे और स्थानीय निवासियों के अपने-अपने दावे हैं. रेलवे का दावा है कि उनके पास 1959 का नोटिफिकेशन, 1971 का रेवेन्यू रिकॉर्ड और 2017 की सर्वे रिपोर्ट मौजूद है, जो ये साबित करती है कि ये पूरी 78 एकड़ जमीन रेलवे की है.

वहीं,स्थानीय निवासियों का कहना है कि शुरुआत में हाईकोर्ट में सिर्फ 29 एकड़ जमीन का विवाद था, लेकिन बाद में रेलवे ने पूरे 78 एकड़ क्षेत्र को अपना बताना शुरू कर दिया. लोगों की मांग है कि वो यहां 100 से ज्यादा सालों से रह रहे हैं. उनका दावा है कि ये जमीन राज्य सरकार की 'नजूल जमीन' है और सरकार को इसे फ्री-होल्ड कर उनकी रिहाइश को मंजूरी देनी चाहिए, न कि रेलवे की जमीन बताकर उन्हें बेघर करना चाहिए.

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क्या होती है नजूल जमीन?

जमीन की खरीदी-बिक्री के समय नजूल जमीन का मुद्दा अक्सर सामने आता है. नजूल जमीन असल में ऐसी सरकारी जमीन होती है, जिस पर सरकार की अनुमति के बिना न तो कोई पक्का निर्माण किया जा सकता है और न ही खेती. आम लोग इसे सीधे खरीद-बेच नहीं सकते.

अंग्रेजों के शासनकाल में जिन बागियों और स्वतंत्रता सेनानियों की जमीनों को ब्रिटिश सरकार ने जब्त किया था, वो आजादी के बाद उत्तराधिकारियों के न मिलने या सही कागजात न होने के कारण आजाद भारत की सरकार के पास आ गईं. राज्य सरकारें ऐसी जमीनों को खाली रखने के बजाय 15 से 99 साल तक की लीज पर देती हैं. लीज खत्म होने पर रेवेन्यू विभाग से इसे रिन्यू कराया जा सकता है.

नजूल लैंड्स (ट्रांसफर) रूल्स 1956 के तहत इन जमीनों का इस्तेमाल अस्पताल, स्कूल, पंचायत भवन या हाउसिंग सोसायटियों के लिए किया जाता है.

8 फरवरी 2024 की हिंसा और 2.45 करोड़ रुपये का रिकवरी नोटिस

बनभूलपुरा का ये विवाद सिर्फ अदालती कमरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे लेकर हिंसा भी हो चुकी है. 8 फरवरी 2024 को जब प्रशासन और नगर निगम की टीम अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाने गई थी, तब वहां जमकर पथराव, आगजनी और हिंसा हुई थी.

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इस उपद्रव में नगर निगम और सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा था. जांच के बाद नगर निगम ने हिंसा के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को 2.45 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई का रिकवरी नोटिस जारी किया और 15 फरवरी तक जुर्माने की जमा करने का अल्टीमेटम दिया था.

कर्फ्यू और मुस्लिम परिवारों का पलायन

हिंसा के बाद बनभूलपुरा में हालात काफी तनावपूर्ण हो गए थे. हिंसा के डर से इलाके से 500 से ज्यादा मुस्लिम परिवारों ने यहां से पलायन करना शुरू कर दिया था. कई परिवार अपने घर का सामान लेकर पैदल ही सड़कों पर जाते देखे गए थे.

इस मामले पर 24 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था. शीर्ष अदालत ने कहा था कि ये विवादित जमीन रेलवे की ही है और वो अपने हिसाब से इसका इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह आजाद है. अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता या स्थानीय निवासी उसी जगह पर बसे रहने का दावा नहीं कर सकते.

प्रभावित परिवारों को 6 महीने तक आर्थिक मदद

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि सबसे पहले रेलवे और स्थानीय प्रशासन मिलकर उन परिवारों की पहचान करें, जो इस निष्कासन की कार्रवाई से सीधे प्रभावित होंगे. अदालत ने राहत का ऐलान करते हुए कहा था कि अगर पात्र परिवारों को वहां से हटाया जाता है, तो रेलवे और उत्तराखंड सरकार मिलकर उन्हें आर्थिक सहारा देगी.

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इसके तहत पात्र विस्थापित परिवारों को छह महीने की तक हर माह 2,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी, ताकि वो अस्थायी तौर पर अपने रहने का इंतजाम कर सकें. कोर्ट को आदेश के मुताबिक, प्रभावित परिवारों के स्थायी पुनर्वास के लिए नैनीताल के राजस्व प्राधिकरण, जिला प्रशासन और रेलवे को मिलकर शिविर आयोजित करने के लिए कहा गया था. अदालत ने प्रशासन को निर्देश दिया था कि बनभूलपुरा में ही 'पुनर्वास केंद्र' बनाए जाएं. 

यह भी पढ़ें: छावनी में बदला बनभूलपुरा! 30 हेक्टेयर रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में SC की सुनवाई आज, सड़कों पर उतरी पुलिस

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सबकी नजर

आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि इस निर्णय से एक तरफ जहां रेलवे के विस्तार की योजना जुड़ी है, वहीं दूसरी तरफ हजारों परिवारों के सिर से छत छीनने या बचने का फैसला होना है. 

(Photo- ITGD)

फैसले के बाद के संभावित हालात को भांपते हुए बनभूलपुरा इलाके में सुरक्षा के सख्त इंतजाम किए गए हैं. एसपी क्राइम और एसपी सिटी के नेतृत्व में पुलिस की संयुक्त टीमों ने संवेदनशील इलाकों में फ्लैग मार्च किया. पूरे बनभूलपुरा इलाके पर ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों के जरिए चप्पे-चप्पे से निगरानी भी रखी जा रही है.

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