वेदांती बोले- अगले साल तक नहीं बना मंदिर, तो हजारों रामभक्तों के साथ करूंगा आत्मदाह

वहीं अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है. 23 मार्च को सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अयोध्या विवादित जमीन के अधिग्रहण के संबंध में 1994 के समूचे फैसले या उसके कुछ हिस्से को पुनर्विचार के लिये बड़ी पीठ को भेजने के बारे में फैसला करेगा.

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राम विलास वेदांती राम विलास वेदांती

नंदलाल शर्मा

  • अयोध्या,
  • 28 मार्च 2018,
  • अपडेटेड 8:16 AM IST

राम जन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य राम विलास दास वेदांती ने अयोध्या में मंदिर निर्माण न होने पर आत्मदाह की धमकी दी है. वेदांती ने मंगलवार को कहा कि अगले वर्ष तक अयोध्या में भव्य राम मंदिर नहीं बना, तो वह अगले वर्ष की रामनवमी को हजारों राम भक्तों के साथ आत्मदाह करेंगे.

उन्होंने कहा कि पिछले कई सालों से राम भक्त पूछ रहे हैं कि कब बनेगा. देश और प्रदेश में बीजेपी की सरकार है. राष्ट्रपति हमारे हैं, लोकसभा अध्यक्ष हमारे हैं. विधानसभा अध्यक्ष हमारे हैं. ऐसे में सवाल उठता है मंदिर निर्माण कब होगा.

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बता दें कि अयोध्या मामले को कोर्ट के बाहर सुलझाने के लिए ऑर्ट ऑफ लिविंग के प्रमुख श्रीश्री रविशंकर की अगुवाई में विभिन्न संगठनों के बीच बातचीत चल रही है. इनमें मुस्लिम संगठन भी पूरे जोर-शोर से सहयोग कर रहे हैं. हालांकि इस मामले में 28 मार्च को होने वाली बैठक रद्द कर दी गई है. ये बैठक लखनऊ में होने वाली थी, जिसे रद्द कर दिया गया है.

श्रीश्री रविशंकर और मुस्लिम नेता सलमान नदवी की अयोध्या मसले पर होने वाली इस बैठक में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरु बड़ी तादाद में शामिल होने वाले थे. अयोध्या मसले पर होने वाली इस बैठक को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था.

दूसरी ओर कहा ये जा रहा है कि सलमान नदवी अयोध्या मसले से किनारा कर चुके हैं. इसी मसले को लेकर सलमान नदवी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बीच गहरे मतभेद उभर आए थे. बोर्ड ने सलमान नदवी को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से बाहर कर दिया था.

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खबरों की माने तो तमाम बड़े मौलानाओं ने श्रीश्री रविशंकर से दूरी बना ली है. मौलानाओं से बढ़ती दूरी के चलते श्रीश्री रविशंकर ने इस बैठक को रद्द कर दिया है.

वहीं अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है. 23 मार्च को सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अयोध्या विवादित जमीन के अधिग्रहण के संबंध में 1994 के समूचे फैसले या उसके कुछ हिस्से को पुनर्विचार के लिये बड़ी पीठ को भेजने के बारे में फैसला करेगा.

बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवाद में मूल वादकारों में से एक एम. सिद्दीकी की मौत हो चुकी है, लेकिन उनका प्रतिनिधित्व उनके कानूनी वारिस के जरिये हो रहा है. वह एम. इस्माइल फारूकी मामले में शीर्ष अदालत के 1994 के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को चुनौती दे रहे हैं.

मिसाल के तौर पर उस फैसले में कहा गया था कि इस्लाम के अनुयायियों के लिये नमाज पढ़ने की खातिर मस्जिद अभिन्न हिस्सा नहीं है. फारूकी मामले पर फैसले में अयोध्या में कुछ क्षेत्रों का अधिग्रहण अधिनियम 1993 की संवैधानिक वैधता पर विचार किया गया था. इस कानून के जरिये केंद्र ने विवादित स्थल और पास की कुछ जमीन का तब अधिग्रहण किया था.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर की विशेष पीठ ने कहा, ‘पहले हमें 1994 के फैसले पर इस विवाद को खत्म करना चाहिये. हम पूरे फैसले या उसके कुछ हिस्से को बड़ी पीठ के पास भेज सकते हैं.’

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