सांसद-विधायकों को वकालत करने से रोकने को सुप्रीम कोर्ट में याचिका

बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सासंदों, विधायकों को बतौर वक़ील कोर्ट में प्रैक्टिस करने से रोकने की गुहार लगाई है. याचिका के मुताबिक बार काउंसिल के विधान और नियमावली के मुताबिक कहीं से भी वेतन पाने वाला कोई भी व्यक्ति वकालत नहीं कर सकता, क्योंकि वकालत को पूर्णकालिक और एकनिष्ठ पेशा माना गया है.

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सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट

संजय शर्मा / राहुल विश्वकर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 07 फरवरी 2018,
  • अपडेटेड 5:10 AM IST

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक होने से पहले ही अब सांसद विधायकों के वकालत करने पर पाबन्दी की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो गई है. बार काउंसिल की तीन सदस्यीय कमेटी ने इस पर अपनी रिपोर्ट तो दे दी है पर वो सार्वजनिक नहीं की गई है. इस मामले की सुनवाई के दौरान अगर कोर्ट कहे तो रिपोर्ट सील कवर में या फिर सार्वजनिक तौर से रिकॉर्ड पर आ सकती है.

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बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सासंदों, विधायकों को बतौर वक़ील कोर्ट में प्रैक्टिस करने से रोकने की गुहार लगाई है. याचिका के मुताबिक बार काउंसिल के विधान और नियमावली के मुताबिक कहीं से भी वेतन पाने वाला कोई भी व्यक्ति वकालत नहीं कर सकता, क्योंकि वकालत को पूर्णकालिक और एकनिष्ठ पेशा माना गया है. ऐसे में बड़ा सवाल ये उठाया गया है कि सांसद और विधायक जब सरकारी खजाने से वेतन और भत्ते ले रहे हैं तो साथ-साथ कोर्ट में प्रैक्टिस कैसे कर रहे हैं?

इस याचिका की ज़द में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल, पी चिदम्बरम, विवेक तनखा, केटीएस तुलसी, एनसीपी के माजिद मेमन, टीएमसी के कल्याण बनर्जी सहित कई पार्टियों के कई नामचीन सांसद और वक़ील आ जाएंगे. ये वो नाम हैं जो संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों के गलियारों में अलग-अलग हैसियत से जाते हैं. जनप्रतिनिधि और मुवक्किल के प्रतिनिधि भी. एक जगह से वेतन भत्ते और दूसरी जगह से फीस. एक जगह खादी तो दूसरी जगह काला गाउन और गले में बैंड का जलवा.

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याचिका के मुताबिक देश का कोई भी नागरिक जब तक सांसद या विधायक जैसे पद पर है तब तक उसकी वकील के रूप में प्रैक्टिस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए. पद की शपथ लेते ही उसका लाइसेंस तब तक सस्पेंड कर देना चाहिए जब तक वो सांसद या विधायक है. पदमुक्त होने या इस्तीफा देने के बाद वो काउंसिल से फिर लाइसेंस वैध करने को कहे.

उपाध्याय ने इसी बाबत 1994 में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी नत्थी किया है. इसमें प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले एक एलएलबी पास डॉक्टर को कोर्ट ने ये कहते हुए पैरवी करने से रोक दिया था कि वो तब तक वकालत के योग्य नहीं माने जाएंगे जब तक कि वो डॉक्टर के पद से इस्तीफा ना दे दें. ऐसे में कानूनी और तकनीकी सवाल ये है कि जब डॉक्टर एक साथ दो जगह से वेतन और भत्ते लेकर वकालत नहीं कर सकता तो सांसद और विधायक कैसे?

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