भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते इस्तेमाल के साथ नए तरह के ऑनलाइन खतरे भी लगातार सामने आ रहे हैं. किसी की निजी जानकारी लीक करना, डीपफेक बनाना, किसी को रेप और जान से मारने की धमकी देना अब सिर्फ ऑनलाइन परेशानी तक सीमित नहीं रह गया है.
आजकल ऐेसे मामले तेजी से फैल रहे हैं, जिसकी वजह से लोगों को शारीरिक, मानसिक, और सामाजिक रूप से इन खतरों का सामना करना पड़ रहा है.इसी चिंता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है. इस याचिका के जरिए गंभीर डिजिटल अपराध के मामलों में 24 से 48 घंटों के अंदर राहत देने वाली व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा गया है.सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मांग पर विचार करने का निर्देश दिया है.
याचिका में रखी गई मांगे
इस याचिका में कहा गया है कि डिजिटल अपराध के पीड़ित को अपने क्षेत्र की जिला अदालत, हाई कोर्ट या किसी नामित ड्यूटी कोर्ट में तुरंत राहत के लिए आवेदन करने की सुविधा होनी चाहिए.आवेदन में वेरिफाइड पहचान के साथ अगर संभव हो, तो रिलेटेड URL, स्क्रीनशॉट और घटना का समय यानी टाइमस्टैम्प दिया जा सके.
प्रस्ताव के मुताबिक ऐसे मामलों पर अदालत 24 से 48 घंटे के अंदर, प्राथमिकता के आधार पर विचार कर सकती है और अपने फैसले के कारण दर्ज कर सकती है.बता दें कि अभी पीड़ितों के पास राहत पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. यह केवल याचिका में सुझाई गई समयसीमा है.
किन मामलों में मिलेगी ऐसी राहत
शारीरिक या यौन हिंसा और हत्या की धमकी, ऐसे डॉक्सिंग मामले जिनसे वास्तविक खतरे की आशंका हो, बच्चों की निजी जानकारी, फोटो, स्कूल या लोकेशन सार्वजनिक करना, बिना सहमति के निजी या AI से बनाए गए कंटेंट और गंभीर नुकसान पहुंचाने वाले डीपफेक या डिजिटल impersonation को इस प्रस्ताव में शामिल किया गया है.
याचिकाकर्ता का तर्क है कि डिजिटल कंटेंट को कुछ ही सेकंड में कॉपी, सेव, मिरर और दोबारा अपलोड किया जा सकता है. ऐसे में कार्रवाई में देरी होने पर कंटेंट वायरल हो सकता है और पीड़ित की निजता, प्रतिष्ठा, सुरक्षा, रोजगार या मानसिक स्वास्थ्य को ऐसा नुकसान पहुंच सकता है जिसकी भरपाई बाद में मुश्किल हो.
इस याचिका में किसी कंटेंट को हटाने या ब्लॉक करने का आदेश पूरे प्लेटफॉर्म पर लागू करने के बजाय विशेष URL और संबंधित कंटेंट तक सीमित रखने की बात कही गई है.साथ ही URL, टाइमस्टैंप, अपलोडर की जानकारी, मेटाडेटा और दूसरे डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने का भी प्रस्ताव है,ताकि कंटेंट हटने या दोबारा अपलोड होने के
बावजूद जांच पर असर ना पड़े.
क्या यह सेंसरशिप होगी?
याचिका में साफ कहा गया है कि प्रस्ताव का इस्तेमाल राजनीतिक भाषण, पत्रकारिता, जनहित की रिपोर्टिंग, व्यंग्य, पैरोडी, आलोचना, राय या अकादमिक और कानूनी टिप्पणी के खिलाफ नहीं होना चाहिए. सामान्य मानहानि के मामलों के लिए मौजूदा कानूनी रास्ते ही जारी रहेंगे. सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने पेटिशनर को अपनी मांग संबंधित अधिकारियों के सामने रखने को कहा है.गृह मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को इस प्रतिनिधित्व की जांच करने को कहा गया है.
सृष्टि ओझा