बोफोर्स घोटाला मामले में हिंदुजा बंधुओं को सभी आरोपों से बरी करने वाले 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल ने अदालत से चार हफ्ते का समय मांगा ताकि दोनों हिंदुजा बंधुओं के नाम हटाए जा सकें, जिनकी मृत्यु हो चुकी है.
इस पर जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने मामले की लंबी अवधि पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इस मामले में आखिर हिंदुजा बंधुओं और सीबीआई से जुड़ा क्या है और हाईकोर्ट ने 2005 में क्या आदेश दिया था?
दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने 31 मई 2005 को बोफोर्स मामले में हिंदुजा बंधुओं श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा और एबी बोफोर्स कंपनी के खिलाफ सभी आपराधिक आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें बरी कर दिया था.
इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे मुख्य कारण सबूतों में प्रामाणिकता की कमी थी. अदालत ने पाया कि स्वीडन के अधिकारियों से सीबीआई को जो भी दस्तावेजी सबूत मिले थे, वे न तो मूल यानी ओरिजिनल रूप में थे और न ही प्रमाणित प्रतियों यानी ऑथेन्टिकेटेड कॉपीज के रूप में थे.
ऐसे में अदालत ने टिप्पणी की थी कि ऐसे अप्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर आरोपियों को एक लंबे और कठिन पेचीदा मुकदमे में घसीटना अदालत और जनता का समय और पैसा बर्बाद करना है.
यह आरोपियों के साथ एक क्रूर मजाक होगा. अभियोजन पक्ष यानी CBI यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही कि हिंदुजा बंधुओं ने 1986 के तोप सौदे को सुरक्षित कराने में कोई सीधी भूमिका निभाई थी या उन्हें मिला पैसा इसी सौदे की रिश्वत यानी कमीशन था.
इस निर्णय के बाद तीनों हिंदुजा भाइयों को उनकी जमानत राशि वापस करने के आदेश दिए गए थे और उन्हें 14 साल लंबे चले इस कानूनी मामले से राहत मिल गई थी.
संजय शर्मा