मोदी-शाह संग चाय पार्टी में विपक्ष से सिर्फ DMK की कनिमोझी पहुंचीं, राहुल-अखिलेश गायब

संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया. इस बार संसद का सत्र काफी हंगामेदार रहा. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हमेशा की तरह इस बार भी संसद सत्र खत्म होने के बाद अपने चैंबर में फ्लोर लीडर्स के लिए चाय पार्टी रखी थी, जिसमें विपक्ष की तरफ से सिर्फ डीएमके की सांसद कनिमोझी शामिल हुईं.

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पीएम मोदी और कनिमोझी की मुलाकात (File Photo-PTI) पीएम मोदी और कनिमोझी की मुलाकात (File Photo-PTI)

हिमांशु मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 13 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 2:14 PM IST

संसद के मॉनसून सत्र के आखिरी दिन गुरुवार को लोकसभा की कार्यवाही चंद मिनट ही चली. विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी के बीच स्पीकर ओम बिरला ने वंदे मातरम का गान कराया और लोकसभा की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया. मॉनसून सत्र की समाप्ति के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ चाय पार्टी में विपक्ष की तरफ से सिर्फ डीएमके की सांसद एम के कनिमोझी पहुंचीं. 

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सत्र के स्थागित होने के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने हमेशा की तरह इस बार भी अपने चैंबर में फ्लोर लीडर्स के लिए चाय पार्टी रखी.सत्तापक्ष से पीएम मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह पहुंचे.

लोकसभा स्पीकर की चाय पार्टी का एक बार फिर से विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव सहित विपक्षी दलों की तरफ से कोई नेता नहीं पहुंचा. ऐसे में अकेले डीएमके की तरफ से कनिमोझी के चाय पार्टी में पहुंचने के सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं.

चाय पार्टी में मोदी-शाह संग कनिमोझी

हर बार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला संसद सत्र की समाप्ति के बाद अपने चैंबर में 'पारंपरिक चाय पार्टी' रखते हैं, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के फ्लोर लीडर्स पहुंचते हैं. विपक्ष ने स्पीकर की चाय पार्टी का बहिष्कार किया, लेकिन विपक्षी खेमे से केवल डीएमके की कनिमोझी का पहुंचना अहम माना जा रहा है.

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पिछले साल मॉनसून सत्र समाप्त होने के बाद जब विपक्ष ने स्पीकर की 'पारंपरिक चाय पार्टी' का बहिष्कार किया था, तब उसमें डीएमके भी शामिल थी. उस समय डीएमके का कोई भी नेता चाय पार्टी में शामिल नहीं हुआ था, लेकिन इस बार कनिमोझी पहुंचीं. ऐसे में डीएमके अब विपक्ष से दूरी बनाते हुए सत्ता पक्ष के करीब दिख रही है.

यदि मोदी सरकार डीएमके को साधे रखती है, तो आने वाले समय में परिसीमन विधेयक की राह आसान हो सकती है. डीएमके के पास 22 लोकसभा सांसद हैं, जो काफी अहम हैं. डीएमके के विरोध के चलते ही सरकार अप्रैल में हुए विशेष सत्र में इस विधेयक को पास नहीं करा सकी थी. अब जिस तरह कनिमोझी स्पीकर की चाय पार्टी में शामिल हुईं, उसके सियासी मायने काफी अहम हो जाते हैं.

क्या विपक्ष से दूरी बना रही है डीएमके?

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद डीएमके सत्ता से बाहर है और कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते खराब हो गए हैं. थलपति विजय की पार्टी TVK के साथ कांग्रेस के हाथ मिलाने के बाद डीएमके ने संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की थी. डीएमके ने कांग्रेस से दूरी बना रखी है और अब जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी में कनिमोझी पहुंची हैं, उससे एक नए समीकरण की संभावना देखी जा रही है.

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मोदी सरकार को परिसीमन विधेयक पास कराने के लिए डीएमके पर 'खास भरोसा' है. एनडीए के इस भरोसे के पीछे भी गहरी रणनीतिक बिसात, बदलती सियासी परिस्थितियां और कुछ व्यावहारिक समीकरण हैं. मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले मोदी सरकार ने डीएमके नेतृत्व से संपर्क किया था और परिसीमन के मुद्दे पर समर्थन का अनुरोध किया था, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण सरकार यह विधेयक पेश नहीं कर सकी.

दो-तिहाई बहुमत जुटाने का नया गेम

संविधान के संसोधन के जरिए ही मोदी सरकार परिसीमन बिल को पास करा सकती है. अप्रैल के विशेष सत्र में मौजूद 528 सदस्यों में से 298 ने बिल के पक्ष में और 230 ने इसके खिलाफ वोट पड़े थे. कांग्रेस से लेकर सपा और डीएमके ने बिल के खिलाफ वोट किया था.

बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास लोकसभा में फिलहाल 293 सदस्य हैं. टीएमसी के 20 और शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के साथ आने के बाद यह आंकड़ा 319 पहुंच गया है. शरद पवार की पार्टी 8 सांसदों को जोड़ देते हैं तो फिर नंबर 327 हो रहा है. इसके अलावा अप्रैल में एनडीए से अतरिक्त 5 लोकसभा सांसदों ने सरकार के समर्थन में वोट किया था, उसे जोड़ देते हैं फिर ये नंबर 332 हो जाता है.

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लोकसभा के कुल 543 सांसद के लिहाज से दो-तिहाई बहुमत के लिए ज़रूरी 360 की संख्या चाहिए. इस लिहाज से 28 सांसदों के समर्थन की सरकार को और जरूरत होगी. ऐसे में डीएमके के बिना दो-तिहाई का नंबर जुटाना आसान नहीं है. डीएमके के पास 22 लोकसभा सांसद है, जिसे अपने साथ डायरेक्ट या इन डायरेक्ट समर्थन हासिल कर सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को आसानी से पास करा सकती है. 

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