वंदे मातरम् की अनिवार्यता के खिलाफ कोर्ट जाएगी जमीयत उलेमा-ए-हिंद, अधिसूचना को बताया संविधान के विपरीत

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाए जाने का विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया है. उन्होंने कहा कि संगठन इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेगा.

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मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने के फैसले पर उठाए सवाल (Photo: ITG) मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने के फैसले पर उठाए सवाल (Photo: ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 17 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:40 PM IST

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने एक बार फिर वंदे मातरम् को विवादित गीत बताते हुए सरकार की अधिसूचना पर सवाल उठाए हैं. संगठन के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कार्यसमिति की बैठक के बाद कहा कि एक अधिसूचना के जरिए वंदे मातरम् जैसे विवादित गीत को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया है और भाजपा शासित राज्यों में इसका रोजाना गायन अनिवार्य किया जा रहा है.

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मौलाना मदनी ने आरोप लगाया कि दूसरी ओर मस्जिदों, मकबरों और मदरसों को अवैध बताकर गिराया जा रहा है और मदरसों के खिलाफ लगातार नए आदेश जारी किए जा रहे हैं, मानो वे शैक्षणिक संस्थान नहीं बल्कि गैरकानूनी गतिविधियों के केंद्र हों. उन्होंने कहा कि मुसलमान न कभी झुका है और न कभी झुकेगा. पहले मुसलमान निशाने पर थे, लेकिन अब इस्लाम को निशाना बनाया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि संविधान की शपथ लेकर सत्ता में आने वालों की जिम्मेदारी है कि वे हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करें. मौलाना मदनी ने आरोप लगाया कि पहले की सरकारों ने मुसलमानों को नुकसान पहुंचाया, जबकि मौजूदा सरकार इस्लाम को नुकसान पहुंचाना चाहती है.

मौलाना मदनी ने कहा कि देश में नफरत की राजनीति अब डर और धमकी की राजनीति में बदल गई है. उनका आरोप था कि मुसलमानों को यह एहसास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि उन्हें शर्तों के साथ जीना होगा. उन्होंने कहा कि यह कानून और संविधान की सर्वोच्चता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.

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उन्होंने पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनावों का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आचार संहिता की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं और मुसलमानों को सार्वजनिक रूप से धमकियां दी गईं. उन्होंने कथित तौर पर कुछ नवनिर्वाचित मुख्यमंत्रियों के बयानों पर भी सवाल उठाए और कहा कि संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है.

मौलाना मदनी ने समान नागरिक संहिता (UCC) और वंदे मातरम् को अनिवार्य किए जाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखने का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद केंद्र सरकार के उस फैसले को पूरी तरह खारिज करती है, जिसमें वंदे मातरम् को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान दर्जा देने और सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों में इसे अनिवार्य करने की बात कही गई है.

उन्होंने कहा कि अगर यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो संगठन अदालत का दरवाजा खटखटाएगा. जमीयत ने इसे संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ बताया.

मौलाना मदनी ने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर भी चिंता जताई और आरोप लगाया कि इसके जरिए वास्तविक नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है. उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में 27 लाख मतदाताओं को संदिग्ध घोषित किया गया, जिनमें बड़ी संख्या मुसलमानों की है.

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उन्होंने मुसलमानों से सतर्क रहने और अपने दस्तावेज तैयार रखने की अपील की. साथ ही कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद के कार्यकर्ता लोगों की कानूनी मदद करेंगे.

अपने संबोधन के अंत में मौलाना मदनी ने कहा कि इस्लाम को मिटाने की कोशिश करने वाले खुद मिट गए, लेकिन इस्लाम कायम रहा. उन्होंने पूर्व सोवियत रूस का उदाहरण देते हुए कहा कि तमाम प्रतिबंधों और दमन के बावजूद इस्लाम और मुसलमान दोनों कायम रहे. साथ ही उन्होंने समाज में भाईचारा, सहिष्णुता और न्याय की स्थापना के लिए प्रयास जारी रखने की अपील की.

अग्निमित्रा पाल ने जताया विरोध

वंदे मातरम् विवाद को लेकर पश्चिम बंगाल की भाजपा नेता अग्निमित्रा पाल ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि जो लोग भारत माता को 'मां' मानने में झिझकते हैं, उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए. आसनसोल में मीडिया से बातचीत के दौरान अग्निमित्रा पाल ने कहा कि भारत देश सभी नागरिकों के लिए मां के समान है.

उन्होंने कहा, 'जिस मिट्टी ने हमें पाला-पोसा, उसे भी हम मां मानते हैं. जो लोग भारत को मां कहने में झिझकते हैं और अदालत जाने की बात करते हैं, उन्हें इस देश में रहने का कोई हक नहीं है. अगर भारत में रहना है तो भारत माता का सम्मान करना होगा.'

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