मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज को चुनौती देने वाली करीब तीन दर्जन याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी. इन याचिकाओं में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR की प्रक्रिया, चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर सवाल उठाए गए हैं. याचिकाकर्ताओं ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने और SIR पर रोक लगाने की मांग की है. दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त हलफनामा दाखिल कर आरोपों को खारिज किया है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इन मामलों की सुनवाई करेगी. याचिकाओं में दो बड़े मुद्दे उठाए गए हैं. पहला, ज्ञानेश कुमार के फैसलों और मतदाता सूची में किए जा रहे बदलावों को लेकर. दूसरा, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए 2023 के कानून की वैधता को लेकर.
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ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर क्यों उठे सवाल?
चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों की खबरें सामने आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर विवाद बढ़ा. इसके बाद राकेश कुमार सिंह, अरुण आनंद गिरी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और INDIA ब्लॉक के 12 विपक्षी नेताओं ने याचिकाएं दाखिल कीं.
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सहमति के बिना कई अहम फैसले लिए. याचिकाओं में मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से कहा गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के प्रबंधन और डेटा को एक जगह केंद्रीकृत करने जैसे मुद्दों पर कम से कम 14 फैसलों को लेकर लिखित आपत्ति जताई थी.
याचिकाकर्ताओं ने मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में बदलाव और महाराष्ट्र समेत दूसरे राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर भी सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि नाम हटाने की प्रक्रिया में जरूरी नियमों का पालन नहीं किया गया.
याचिकाकर्ताओं की निष्पक्ष जांच और SIR पर रोक की मांग
याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया जाए या विशेष जांच दल यानी SIT से मामले की जांच कराई जाए. उन्होंने देशभर में चल रहे SIR को अवैध घोषित करने और इस पर तत्काल रोक लगाने की भी मांग की है.
हालांकि, चुनाव आयोग ने अपने संयुक्त हलफनामे में इन आरोपों को गलत बताया है. आयोग का कहना है कि जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में SIR से जुड़े सभी आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे. आयोग ने यह भी कहा है कि किसी फाइल पर दर्ज टिप्पणी या किसी मुद्दे पर उठाई गई आपत्ति को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता.
फॉर्म 6 में बदलाव के आरोप पर भी चुनाव आयोग ने सफाई दी है. आयोग के मुताबिक, इस फॉर्म में कोई बदलाव नहीं किया गया है. इस तरह SIR की प्रक्रिया और आयोग के भीतर फैसले लेने के तरीके को लेकर याचिकाकर्ताओं के आरोपों और चुनाव आयोग के जवाब में साफ मतभेद है.
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के कानून को भी चुनौती
कुछ याचिकाएं मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की वैधता से जुड़ी हैं. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), एनजीओ लोक प्रहरी और कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने इस कानून को चुनौती दी है.
विवाद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति की संरचना को लेकर है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले निर्देश दिया था कि इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों. लेकिन 2023 में बने कानून के तहत मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटा दिया गया और उनकी जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे चयन समिति में सरकार का बहुमत हो जाता है और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं. उनकी मांग है कि नए कानून को असंवैधानिक घोषित किया जाए और चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने वाला पुराना निर्देश बहाल किया जाए.
चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं ने 2023 के कानून की धारा 16 को भी चुनौती दी है. यह प्रावधान चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़े कुछ मामलों में कानूनी कार्रवाई से संरक्षण देता है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इससे चुनाव आयोग की जवाबदेही प्रभावित हो सकती है.
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उनका कहना है कि नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें सरकार का दबदबा न हो और पारदर्शिता बनी रहे. इसी वजह से उन्होंने चयन समिति की संरचना बदलने और चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण देने वाले प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट से विचार करने की मांग की है.
नियुक्ति कानून पर पहले भी बंटी थी जजों की राय
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी सुनवाई कर चुका है. इस मामले में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ का फैसला बंटा हुआ था. दोनों जजों की राय अलग-अलग होने के बाद मामले को अंतिम फैसले के लिए पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने की सिफारिश की गई.
अब सुप्रीम कोर्ट में SIR की प्रक्रिया, चुनाव आयोग के कामकाज और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर उठाए गए सवालों पर सुनवाई होगी. अदालत के सामने याचिकाकर्ताओं की मांगों के साथ चुनाव आयोग का जवाब भी है.
संजय शर्मा