एक रिपोर्टर के तौर पर बीते कई सालों में मैंने बहुत से आंदोलनों की कवरेज की है...लेकिन इनमें से दो आंदोलन मेरे दिल-दिमाग में हमेशा के लिए छप गए हैं. पहला था नेपाल का 'जेन जी' आंदोलन जिसे मैंने काठमांडू और बीरगंज की सड़कों पर देखा.
वहीं दूसरा है नीट पेपर लीक को लेकर भारत में छात्रों का गुस्सा, जिसे मैंने पटना से रिपोर्ट किया. दोनों ही जगह कमान युवाओं के हाथ में थी. दोनों का गुस्सा सत्ता के खिलाफ था, लेकिन एक पत्रकार के तौर पर मैंने जो देखा, उसमें समानता बस यहीं खत्म हो गई.
सितंबर 2025 में जब मैं काठमांडू पहुंचा तो पूरा शहर सुलग रहा था. चारों तरफ धुआं था, गाड़ियां जल रही थीं. संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के घरों तक पर हमले हो रहे थे. नेपाल का यह आंदोलन पूरी तरह सड़कों पर लड़ा जा रहा था. वजह साफ थी इंटरनेट पर पाबंदी की वजह से वहां सोशल मीडिया का कोई सहारा नहीं था. हिंसा इतनी तेजी से जगह बदल रही थी कि एक रिपोर्टर के तौर पर कवरेज के दौरान मुझे लगातार भागना पड़ रहा था. इस चौतरफा हिंसक दबाव का नतीजा यह हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी. इस आंदोलन के दौरान कई लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी.
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वहीं कई महीनों बाद जुलाई में जब मैं पटना की सड़कों पर नीट पेपर लीक प्रोटेस्ट कवर करने उतरा, तो नजारा बिल्कुल अलग था. यहां भी छात्रों और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुईं, लाठीचार्ज हुआ. आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पत्थरबाजी में दोनों तरफ के लोग जख्मी हुए, लेकिन नेपाल जैसी तबाही और सरकारी इमारतों में आगजनी यहां देखने को नहीं मिली. पटना में यह आंदोलन सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के समानांतर मंच पर भी लड़ा जा रहा था. इंटरनेट चालू था, इसलिए छात्र तुरंत रील्स और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर कर रहे थे.
सबसे हैरान करने वाली बात...पटना का माहौल था, जहां गुस्से के बीच भी प्रोटेस्टर्स में युवापन जिंदा था. छात्र बैरिकेड्स के पास खड़े होकर सेल्फी ले रहे थे, रील्स बना रहे थे और पुलिसवालों से हंसकर पूछ रहे थे कि आज आंसू गैस के गोले पूरे लाए हो या नहीं. जब उन पर वाटर कैनन से पानी की बौछारें की गईं, तो कुछ छात्र उसमें नाचने लगे और बाकी उनके वीडियो बनाने लगे. नेपाल के खौफनाक माहौल में हुए प्रोटेस्ट के बाद मैंने ऐसी उम्मीद कभी नहीं की थी.
पटना में यह प्रदर्शन गांधी मैदान और डाकबंगला चौराहा जैसे तय इलाकों तक ही सीमित रहा. हालांकि, इस शांतिपूर्ण और डिजिटल आंदोलन की ताकत भी कम नहीं थी; इसने सरकार पर ऐसा तगड़ा दबाव बनाया कि आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा.
जब मैं काठमांडू, बीरगंज और पटना की सड़कों पर माइक थामे कवरेज के लिए खड़ा था, तो देखने में दोनों भीड़ और दोनों का गुस्सा एक जैसा ही लग रहा था, लेकिन एक रिपोर्टर की नजर से दोनों आंदोलनों की हकीकत, उनके रास्ते और उनकी कहानियां एक-दूसरे से पूरी तरह अलग थीं.
रोहित कुमार सिंह